जगपती का चरित्र चित्रण - Jagpati Ka Charitra Chitran

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जगपती का चरित्र चित्रण - Jagpati Ka Charitra Chitran

जगपती का चरित्र चित्रण - कमलेश्वर द्वारा रचित 'राजा निरबंसिया' का मुख्य पात्र एवं नायक है जगपती। वह पहले दसवीं पास है और कस्बे के वकील के पास मुहर्रिर की नौकरी करता था। जगपती गरीब परिवार से संबंध रखता है और परिश्रमी है। दुर्घटना से वह गोली का शिकार हो जाता है जिसके कारण उसे काफी समय तक अस्पताल और बिस्तर पर रहना पड़ा फलस्वरूप उसकी नौकरी छूट जाती है। आजीविका हेतु वह बचन सिंह कम्पाउडर से कर्ज़ लेकर टाल खोलता है। पत्नी चंदा जिसे पाकर वह बहुत प्रसन्न था। वह उसे भी दांव पर लगा देता है और उसके गर्भवती होने पर वह शक करता है और उसे भला-बुरा कहता है। चंदा उसे यह कहकर कि 'उसने उसे बेच दिया है' उसका घर छोड़कर मायके चली जाती है। उसका अकेलापन उसे इस प्रकार अंदर तक हिला देता है कि हर प्रकार से अपने को दोषी मानकर अंततः आत्महत्या कर लेता है। पूरी कहानी में उसका व्यक्तित्व कई पड़ावों से गुज़रता है जिससे उसके चरित्र एवं व्यक्तित्व की कई विशेषताएँ सामने आती हैं।

जगपती का चरित्र की विशेषताएं

परिश्रमी: जगपती एक परिश्रमी व्यक्ति है। जिस घर और परिवेश में उसने जन्म लिया है उसने उसे परिश्रम करना सिखा दिया है। ठीक होने बाद वह काम पाने के लिए मारा मारा फिरता है। वह हर घड़ी अपने को काम में खपा देना चाहता है ताकि वह कुछ और न सोच सके। इसलिए वह सोचता है कि उसे करने के लिए कुछ चाहिए । यही उसकी पहली और आखिरी मांग है। उसी के अनुसार, "वह उस घर में नहीं पैदा हुआ, जहाँ सिर्फ जबान हिलाकर शासन करने वाले होते हैं। वह उस घर में भी नहीं पैदा हुआ, जहां सिर्फ मांगकर जीने वाले होते हैं। वह उस घर का है जो सिर्फ काम करना जानते हैं, काम ही जिसकी आस है। सिर्फ वह काम चाहता है काम! और टाल खोल लेने पर उसे ऐसा लगता है कि काम मिल गया है। अतः कथाकार लिखता है, 'अब चौबीसों घंटे उसके सामने काम है... . उसके समय का उपयोग है। दिनभर में वह एक घण्टे के लिए किसी का मित्र हो सकता है, कुछ देर के लिए वह पति हो सकता है, पर बाकी समय ? दिन और रात के बाकी घण्टे .....उन घंटों के अभाव को केवल उसका काम ही भर सकता है......और अब वह कामदार था..... अतः टाल खोल लेने पर वह दिन-रात काम में इतना व्यस्त रहता है कि अपने सारे गम उसी में भुला देना चाहता है।

पत्नी प्रेमी: जगपती अपनी पत्नी चंदा से हृदय की गहराइयों से प्रेम करता है उससे विवाह करके जगपती को जैसे सब कुछ मिल गया हो पर चंदा जब घर छोड़कर मायके चली जाती है तो नितांत अकेला होकर केवल चंदा के विषय में ही सोचता है। मन ही मन कहता है, "वह ज़रूर औरत थी, पर स्वयं मैंने उसे नरक में डाल दिया! वह बच्चा मेरा कोई नहीं पर चंदा तो मेरी है। एक बार उसे ले आता, फिर यहां.... रात के मोहक अंधेरे में उसके फूल से अधरों को देखता.......निर्द्वन्द्व सोए पलकों को निहारता...... सांसों की दूध-सी अछूती महक को समेट लेता।" वह स्वयं इस बात को स्वीकार करता है कि वह चंदा को चाहता रहा, पर उसके दिल में चाहत न जगा पाया । अंततः उसके प्रेम में स्वयं को असफल जान वह आत्महत्या कर लेता है।

साहसी: जगपती वीर तथा साहसी है। जब वह अपने रिश्तेदार के यहाँ शादी में गया था तो वहां डाका पड़ने पर वह डटकर डाकुओं का सामना करता है। डाकुओं के विरुद्ध हिम्मत बढ़ाते हुए कहता है, "ये हवाई बन्दूकें इन तेल–पिलाई लाठियों का मुकाबला नहीं कर पाएंगी, जवानो।" अस्पताल में भर्ती होने पर भी वह अपने जख्मों का डटकर मुकाबला करता है। जहां तक कि जीवन में आए सारे संकटों का सामना भी हिम्मत से ही करता है ।

थोथा आदर्शवादी: वह जगह-जगह चंदा को आदर्शों, नैतिकता की सीख देता है पर स्वयं उन पर चल नहीं सकता है। जब चंदा उसके लिए ताकत की दवाइयाँ मंगवाने की बात करती है तो वह कहता है, "देखो चंदा, चादर के बराबर ही पैर फैलाए जा सकते हैं। हमारी औकात इन दवाइयों की नहीं है।" जब वह कहती है कि वह कम्पाउण्डर साहब को इंतजाम करने के लिए बोलेगी तब वह कहता है, "नहीं चंदा, उधारखाते से मेरा इलाज़ नहीं होगा..... चाहे एक के चार दिन लग जाएं। तुम नहीं जानती, कर्ज कोढ़ का रोग होता है, एक बार लगने से तन तो गलता ही है मन भी रोगी हो जाता है।" वह चंदा को उधार लेने के लिए रोकता है पर स्वयं चंदा को ही दांव पर लगाकर बचन सिंह से उधार लेता है। इसलिए वह कहता है, जो कुछ सोचा, उस पर कभी विश्वास न कर पाया। उसे कहीं से एक पैसा मांगने पर डांटता रहा, पर खुद लेता रहा और आज ... वह दूसरे के घर बैठ रही है । उसे छोड़कर..... वह अकेला है..... हर तरफ बोझ है। अस्पताल में जब दवाइयाँ आ जाने पर वह व्यथित हो उठता है तो चंदा उसे बताती है कि ये दवाइयां उसने कड़ा बेचकर मंगवाई हैं तब जगपती की मानसिकता उसके खोखलेपन को सिद्ध कर देती है उदाहरणतः “कड़ा बेचने से तो अच्छा था कि बचन सिंह की दया ही ओढ़ ली जाती। और उसे हलका-सा पछतावा भी था कि नाहक वह रौ में बड़ी-बड़ी बातें कह जाता है, ज्ञानियों की तरह सीख दे देता है।" चंदा भी उसके आदर्शों की गहराई को पहचान जाती है पर वह परिस्थितिवश चुप रहती है।

कुंठाग्रस्त: विफलता के कारण होने वाली घोर निराशा कुंठा का रूप धारण कर लेती है। जगपती अपने घर की परिस्थितियों को संभाल नहीं पाता तो वह कुंठाग्रस्त हो जाता है। जब कम्पाउण्डर उसके घर आना शुरू करता है तो अपने लाभ के लिए ही शायद वह उसे मना तो नहीं कर पाता पर अपने घर में बचन सिंह की उपस्थिति उसे बहुत खलती थी जैसे कि इन पंक्तियों से स्पष्ट है- "उस दिन के बाद बचन सिंह लगभग रोज़ ही आने-जाने लगा। जगपती उसके साथ इधर-उधर घूमता भी रहता । बचन सिंह के साथ वह जब तक रहता, अजीब सी घुटन उसके दिल को बांध लेती, और तभी जीवन की तमाम विषमताएँ भी उसकी निगाहों के सामने उभरने लगती।" वह स्वयं से कई प्रकार के प्रश्न करता। जब उसे चंदा के गर्भवती होने का समाचार मिला तो वह तो एकदम पहले सकते में आ जाता है और जब चंदा उसे कहती है कि उसने उसे बेच दिया तो एकदम उस पर क्रोधित हो थप्पड़ जड़ देता है और फिर अपने-आप को कोठरी में बंद करके रातभर उसी कालिख में घुटता रहता है। उसका स्वाभिमान एक–एक करके ध्वस्त हो जाता है और वह अपने-आप को किसी गहरे कुएं में धंसा हुआ पाता है। यही कुंठा का भाव उसे अंततः जीवन दाह करने के लिए उकसाता है ।

पश्चातापी: जगपती कथा में पश्चाताप की अग्नि में निरंतर जलता रहता है। उसे इस बात का अहसास हो जाता है कि अपने घर को बर्बाद करने वाला वह स्वयं है। चंदा के आकर्षण तथा कर्ज़ के लिए किए गये समझौते के आधार पर बचन सिंह जब हर दिन उसके घर आने लगा तो वह अपने आप को एक अजीब सी घुटन में घिरा हुआ पाता है और उस समय भी उसकी सोच उसके पश्चाताप का ही परिणाम है जैसे- "जीवन की तमाम विषमताएँ भी उसकी निगाहों के सामने उभरने लगती है, आखिर वह स्वयं एक आदमी है..... बेकार..... यह माना कि उसके सामने पेट पालने की कोई विकराल समस्या नहीं, वह भूखा नहीं मर रहा है, जाड़े में कांप नहीं रहा है, पर उसके दो हाथ-पैर हैं ..... शरीर का पिंजरा है, जो कुछ मांगता है .... कुछ ! और वह सोचता, यह कुछ क्या है ?" जब उसे इस बात का पता चलता है कि चंदा के घर लड़का हुआ है और वह दूसरे के घर बैठ रही है तब वह बहुत पश्चाताप करता है। उसकी मनःस्थिति निम्नलिखित पंक्तियों से स्पष्ट होती है, पर चंदा यह सब करने जा रही है ? उसके जीते जी वह दूसरे के घर बैठने जा रही है ? कितने बड़े पाप में धकेल दिया चंदा को...... पर उसे भी तो कुछ सोचना चाहिए। आखिर क्या ? पर मेरे जीते जी तो यह सब अच्छा नहीं। वह इतनी घृणा बर्दाश्त करके भी जीने के लिए तैयार है! या मुझे जलाने को! वह मुझे नीच समझती है, कायर ..... नहीं तो एक बार खबर तो लेती। इसी पश्चाताप की अग्नि में जलते हुए वह आत्महत्या कर लेता है और चंदा को लिखे पत्र में वह स्वीकार करता है - "आदमी को पाप नहीं पश्चाताप मारता है, मैं बहुत पहले मर चुका था।" अतः पश्चाताप जो उसके कर्ज से शुरू हुआ था उसके प्राण लेकर ही रहता है।

अपराध बोध से ग्रसित: जगपती अपने आप को निरंतर अपराधी समझता है। उसे चंदा के एक-एक शब्द में अपने गुनाहों के दर्शन होते हैं। जब चंदा ने उसे कहा कि 'तुमने उसे बेच दिया' वह एकदम क्रोध से भर उठता है उसकी आंखों के सामने सारी स्थिति स्पष्ट हो जाती है। रचनाकार ने उसके इस अपराध की स्वीकृति निम्नलिखित शब्दों में दी है, "करीब के खेत की मेड़ पर बैठे जगपती का शरीर भी जैसे कांप- कांप उठता। चंदा ने कहा था, "लेकिन जब तुमने मुझे बेच दिया क्या..." वह ठीक कहती थी! क्या बचन सिंह ने टाल के लिए जो रुपए दिए थे, उसका व्याज इधर चुकता हुआ? क्या सिर्फ वही रूपए आग बन गये, जिसकी आंच में उसकी सहनशीलता, विश्वास और आदर्श मोम से पिघल गए ? चंदा के चले जाने पर वह स्वयं भी इस बात को स्वीकार कर स्वयं को चंदा का अपराधी घोषित करता है जैसे कि इन शब्दों से स्पष्ट है- 'चन्दा के लिए ...... पर उसे तो उसने बेच दिया था। सिवा चंदा के कौन सी संपत्ति उसके पास थी, जिसके आधार पर कोई कर्ज देता। हर तरफ बोझ है, जिसमें उसकी नस नस कुचली जा रही है रग रग फट गई है।" जब मुंशी जगपती को अदालत से बच्चा लेने का उपाय बताता है तो भी उसका अपराध पाठकों के सम्मुख आता है। वह कहता है "अपना कहकर किस मुँह से मांगू, बाबा ? हर तरफ तो कर्ज से दबा हूँ, तन से, मन से, पैसे से, इज्जत से, किसके बल पर दुनिया संजोने की कोशिश करूँ ।" वह निरंतर अपराध और पश्चाताप में जलता रहता है। खाना खाकर जब वह टाल पर सोने चला जाता है। तब उसे नींद कहां आती है वह तो केवल अपने आप को अपने जुर्मों के आगे बौना महसूस करता है। उदाहरणार्थ - "छप्पर के नीचे तखत पर जब वह लेटता, तो अनायास ही उसका दिल भर-भर आता। पता नहीं, कौन कौन से दर्द एक-दूसरे से मिलकर तरह तरह की टीस, चटख और ऐंठन पैदा करने लगते। कोई एक रग दुखती तो वह सहलाता भी जब सभी नसें चटखती हों तो कहां-कहां राहत को अकेला हाथ सहलाए।" अंततः अपने अपराध को स्वीकार करते हुए वह ज़हर पीकर प्राणान्त कर लेता है और चंदा के नाम पत्र में लिखा था- "चंदा, मेरी अंतिम चाह यही है कि तुम बच्चे को लेकर चली आना।" और कानून के आगे बच्चे को स्वीकारते हुए लिखता है- "मेरी लाश तब तक न जलाई जाए, जब तक चंदा बच्चे को लेकर न आ जाए। आग बच्चे से दिलवाई जाए। बस।"

अतः जगपती एक पढ़ा-लिखा, साहसी तथा परिश्रमी होने पर भी नियति का शिकार हो जाता है और आर्थिक विवशता में मर्यादाओं का अतिक्रमण करते हुए न केवल अपने दाम्पत्य संबंधों की मधुरिमा को कड़वाहट में बदलता है अपितु अपने हाथों अपने परिवार को तहस-नहस कर मानसिक पीड़ा से गुजरते हुए स्वयं को भी समाप्त कर लेता है।

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