मधुर मधुर मेरे दीपक जल की प्रसंग सहित व्याख्या

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मधुर मधुर मेरे दीपक जल की प्रसंग सहित व्याख्या

मधुर मधुर मेरे दीपक जल की प्रसंग सहित व्याख्या

सन्दर्भ और प्रसंग : 'मधुर मधुर मेरे दीपक जल!' शीर्षक कविता महादेवी वर्मा के काव्य-संग्रह 'नीरजा' (1935) में संगृहीत है. महादेवी वर्मा की ज्यादातर कविताओं को गीत की कोटि में रखा जाता है । इस कविता / गीत में महादेवी वर्मा ने दीपक को साधक के प्रतीक के रूप में चित्रित किया है. उनकी कई कविताओं में दीपक को साधक के रूप में प्रतीक बनाया गया है। दीपक मानो महादेवी वर्मा की भी साधना का प्रतीक है. इस तरह यह दीपक व्यक्तिगत रूप से कवि की साधना का और सार्वजनिक रूप से किसी भी साधक की साधना का प्रतीक है। कवि ने दीपक को संबोधित करके यह बात कही है कि एक साधक को किस तरह का होना चाहिए ! एक तरह से वे दीपक को या अपनी साधना को या किसी भी साधक को समझा रही हैं कि एक साधक को कैसा होना चाहिए ? उसके सार्थक होने की कसौटी क्या है? उसे अपने व्यक्तित्व को कैसा बनाना चाहिए? 

मधुर मधुर मेरे दीपक जल की व्याख्या

व्याख्या : हे मेरे दीपक ! तुम्हें मधुरता के साथ अपने काम में लगे रहना चाहिए ! तुम मधुर भाव से प्रज्ज्वलित रहो! समय की छोटी-से-छोटी इकाई हो या बड़ी से बड़ी इकाई, तुम्हारा कर्तव्य यही है कि तुम अपने प्रियतम के पथ को प्रकाश से भर कर सुगम बनाए रखो ! यह काम एक पल का हो या एक क्षण का या युग-युग का इससे तुम पर कोई फर्क पड़ना चाहिए |

हे मेरे दीपक ! तुम प्रेम के वशीभूत होकर जलते रहो और हर क्षण पुलक से भरे रहो ! तुम्हारे जलने से जो सुगंध फैलेगी उसे धूप की तरह फैला दो! मैं जानती हूँ कि तुम कोमल हो! कोई बात नहीं, घबराने की कोई जरूरत नहीं! अपने कोमल तन को नर्म मोम की तरह पिघल जाने दो! इसी में इस शरीर की सार्थकता है। तुम अपने जीवन के कण-कण को गलाकर इतना प्रकाश फैला दो कि लगे कि रोशनी का अपार समुद्र फैला है।

इस दुनिया में जो भी शीतल है, कोमल है और नवीनता से भरा है। वे सब चाहते हैं कि तुम अपनी ज्वाला के कण उन्हें प्रदान करो! वे सब तुमसे साधना की ऊर्जा माँगते हैं । तुम्हारी साधना अब उस ऊँचाई पर पहुँच चुकी है कि तुम्हें चाहने वाले संसार के प्रेमीजन तुम्हें प्रेम भरी दृष्टि से देख रहे हैं और मानो पछता रहे हैं कि दीपक की लौ में मिलकर न्यौछावर हो जाने वाले शलभ की तरह मैं क्यों नहीं हो पाया? प्रेम की इस अलौकिक अनुभूति में हे मेरे दीपक तुम सिहर - सिहर कर जलो ! 

पूरा संसार जलन से भरा है। न जाने कितनी पीड़ा भरी हुई है! देखो, आकाश में असंख्य तारे हैं, वे रोज जलते हैं और निस्तेज होकर बुझ जाते हैं । अपार जलराशि से भरा हुआ समुद्र तारों के प्रतिबिम्ब के साथ ऐसा दिखता है मानो समुद्र का हृदय किसी ज्वाला में जल रहा है। बादलों को भी देखो! उनके भीतर भी बिजली की जलन कौंधती रहती है। जलन और पीड़ा से भरे हुए इस संसार को सुख पहुँचाने के लिए हे मेरे दीपक ! तुम एक साधक की तरह लगे रहो, मगर मुस्कुराते हुए ! साधना के मार्ग पर जलते रहना तुम्हारी नियति है, मगर मुस्कुराते रहना तुम्हारी कोशिश है ! 

यूँ तो पेड़-पौधे हरे-भरे होते हैं। मगर काष्ठ में अग्नि का वास होता है। यह बात बहुत पहले ही बतायी गई थी कि लकड़ी में आग बसती है। आश्चर्य होता है कि हरे पौधे के हृदय में ज्वाला बसी होती है। यह धरती ऊपर से कितनी सुंदर, सजल और सुखद लगती है मगर इसके भीतर भी सुशुप्त अवस्था में आग बसी हुई होती है। वैसे तो तापों की यह हलचल बंद पड़ी रहती है, मगर न जाने कब ज्वालामुखी बनकर फूट पड़े ! इन सबके बीच हे मेरे दीपक तुम्हें पहुँचना है। तुम अपनी साधना को विस्तार देते हुए इन सबके बीच पहुँचो ! इन सबको तुम्हारे स्नेह-प्रेम की आवश्यकता है। 

अपने दीपक का मनोबल बढ़ाती हुई महादेवी वर्मा कहती हैं कि तुम अपने बुझ जाने के बारे में किसी प्रकार का डर मत पालो ! हालाँकि जीवन-पथ पर मेरी साँसें तेज चल रही है और तुम मेरी हथेली पर हो! मगर तुम अपने आप में सौभाग्य से भरे हुए हो, तुम बुझ जाने का डर मत पालो । मैं अपने आँचल से तुम्हारे लिए ओट किए हुए हूँ। मेरी आँखों में दीपक की तरह जो पुतली प्रकाशित रहती है उसे अपनी पलकों से सुरक्षा प्रदान करती रहती हूँ इसलिए हे मेरे दीपक ! तुम जरा भी मत डरो ! और सहज भाव से अपने साधना पथ पर अग्रसर रहो!

साधना अनादि काल से चली आ रही है। उस प्रियतम के लिए चलने वाली साधना का कोई ओर-छोर नहीं है। हे मेरे दीपक ! सीमाओं में बँध जाना ही लघुता है अन्यथा उस प्रियतम की तरह ही साधना भी असीम और अनंत है! तुम न जाने कब से साधना में लगे हो! जब तुम अनादि काल से अपनी साधना में लीन हो ही तब यह सोचने की जरूरत क्या कि कितनी घड़ियाँ बीत गयीं या कितनी अभी बितानी हैं? तुम यह मत सोचना कि अग्नि प्रज्ज्वलित रखने के लिए ईंधन कहाँ से मिलता रहेगा ? सुनो, मेरी आँखों में आँसुओं का अपार भंडार भरा हुआ है। मैं ईंधन के रूप में अपने आँसुओं को देती रहूँगी और तुम करुणा से आप्लावित होकर जलते रहना! तुम्हें कोई देखे तो समझ जाए तुम्हारी लौ में किसी की छलछलाती हुई आँखें बसी हैं ! 

दुनिया में असीमित अँधेरा है और तुममें न बुझनेवाला प्रकाश! इस अंधकार और प्रकाश के बीच न जाने कितने नए-नए खेल खेले जाएँगे। हे मेरे दीपक ! यह संघर्ष चलता रहेगा, तुम्हारी भूमिका यही है कि तू अंधकार के प्रत्येक अणु पर प्रकाश की अमिट चित्रकारी करता चल! इसके लिए बहुत धैर्य की जरूरत है। इसलिए तुम सहज के साथ-साथ सरल बनकर अपना काम करते चलो !

यह बात सही है कि तुम जितना जलते हो उतना ही घटते जाते हो। मगर यह भी सच है तुम्हारा प्रियतम भी उसी अनुपात में तुम्हारे करीब आ जाता है। हालाँकि वह प्रियतम स्वभावतः छलनामय है, उसकी उपस्थिति को वास्तविक रूप से परिभाषित नहीं किया जा सकता, मगर अनुभूति के स्तर पर उसके समीप होने को स्वीकारा जा सकता है। हे मेरे दीपक ! उस प्रियतम से जब तुम्हारा मधुर मिलन होगा तब तुम उस पर पूरी तरह

न्यौछावर हो जाना। उसकी निर्मल मुस्कान में पूरी प्रसन्नता के साथ घुल-मिल जाना। इसके लिए जरूरी है कि अपने प्रियतम की प्रतीक्षा का नशा अपने भीतर उत्पन्न करना होगा! इसके लिए तुम्हें मंदिर भाव से साधनारत रहना पड़ेगा और अपने अनंत प्रियतम के पथ को आलोकित रखने का संकल्प बनाए रखना होगा !

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