क्या पूजा क्या अर्चन रे कविता का अर्थ और उद्देश्य

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क्या पूजा क्या अर्चन रे कविता का अर्थ और उद्देश्य

कवि परिचय : सुश्री महादेवी वर्मा छायावाद की प्रसिद्ध कवयित्री है। वेदना का स्वर प्रमुख रहने के कारण महादेवी को आधुनिक 'मीरा' कहा जाता है। भारत सरकार की ओर से आपको पद्मभूषण और ज्ञानपीठ पुरस्कार से अलंकृत किया गया है। 

क्या पूजा क्या अर्चन रे कविता का अर्थ

कविता का अर्थ : क्या पूजा क्या अर्चन रे कविता में कवयित्री ईश्वर को अपना प्रियतम मानती है। उस अज्ञात की भक्ति महादेवी करती है। प्रिय का पूजन—–अर्चन करने के लिए बाहरी व्यंजनों की आवश्यकता नहीं है। अपनी साँसों से ही वह प्रियतम का जप करती है। आँखों के आँसुओं से उस अज्ञात के पैरों की धूल धोना चाहती है। भगवान के मस्तक पर चंदन का टीका लगाया जाता है। उसकी पीड़ा चंदन के समान शीतल है। अपनी पीड़ा से ही प्रिय का तिलक करना चाहती है।

कवयित्री ने मन को दीपक की उपमा दी है। उस अज्ञात के प्यार में दीपक की तरह मन जलता रहता है। महादेवी जी की नक्षत्र के समान आँखे प्रिय के प्रेम में कमल जैसी खिली हुई हैं। धूप के समान महादेवी के स्पंदन प्रतिपल उड़ते रहते हैं। अधरों पर अपने प्रिय का ही नाम रहता है। जब अधर प्रिय का नाम जपते तब पलकों का नर्तन उसे ताल देता है। उसके हृदय का स्पंदन अर्थात हृदय की धड़कन धूप के समान उड़ती रहती है। 

क्या पूजा क्या अर्चन रे कविता का उद्देश्य

कविता का उद्देश्य : महादेवी वर्मा इस कविता के द्वारा परमात्मा की महत्ता को व्यक्त करती है। उसे प्रेम से पाया जाता है। उसे पाने के लिए बाहय उपचारों की आवश्यकता नहीं है । तन-मन-धन से उसके प्रति समर्पित होता ही पूजा-अर्चा है ।

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