बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ कविता की व्याख्या

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बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ कविता की व्याख्या

बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ कविता - महादेवी वर्मा

बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ
नींद थी मेरी अचल निस्पन्द कण कण में,
प्रथम जागृति थी जगत के प्रथम स्पन्दन में;
प्रलय में मेरा पता पदचिह्न जीवन में,
शाप हूँ जो बन गया वरदान बन्धन में,
कूल भी हूँ कूलहीन प्रवाहिनी भी हूँ !

नयन में जिसके जलद वह तृषित चातक हूँ,
शलभ जिसके प्राण में वह ठिठुर दीपक हूँ,
फूल को उर में छिपाये विकल बुलबुल हूँ,
एक हो कर दूर तन से छाँह वह चल हूँ,
दूर तुमसे हूँ अखण्ड सुहागिनी भी हूँ!

आग हूँ जिससे ढुलकते बिन्दु हिमजल के,
शून्य हूँ जिसको बिछे हैं पाँवड़े पल के,
पुलक हूँ वह जो पला है कठिन प्रस्तर में;
हूँ वही प्रतिबिम्ब जो आधार के उर में हूँ;
नीलघन भी हूँ सुनहली दामिनी भी हूँ !

नाश भी हूँ मैं अनन्त विकास का क्रम भी,
त्याग का दिन भी चरम आसक्ति का तम भी
तार भी आघात भी झंकार की गति भी
पात्र भी मधु भी मधुप भी मधुर विस्मृत भीय
अधर भी हूँ और स्मित की चाँदनी भी हूँ ! 

बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ कविता का सन्दर्भ और प्रसंग

'बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ !' शीर्षक कविता महादेवी वर्मा के काव्य-संग्रह 'नीरजा' (1935) में संगृहीत है। इस कविता में महादेवी ने दार्शनिक मतों का सहारा लेकर भेद में अभेद की स्थापना की है । यह यात्रा द्वैत से अद्वैत की तरफ है। इस कविता की सुंदरता इस बात में है कि इसका एक अर्थ रहस्यवादी ढंग से ईश्वरीय प्रेम का अर्थ देता है तो दूसरी तरफ स्त्री जीवन की पूर्णता का अर्थ देता है। स्त्री के बारे में यह बात कई तरह से कही गयी है कि वह 'आधी' है या 'अधूरी है। वह पुरुष से जुड़कर पूर्ण होती है। इन भेदों को मिटाते हुए महादेवी स्त्री के व्यक्तित्व को अभेद और अद्वैत की तरह पूर्णता प्रदान करना चाहती हैं। महादेवी की अनेक कविताओं की तरह यह कविता भी 'मैं' शैली में लिखी गयी है, जो स्त्री की तरफ से कही गयी बात का बोध कराती है ।

बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ कविता की व्याख्या

बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ कविता में महादेवी कई उदाहरण देकर बताना चाहती हैं कि जिन पक्षों से मिलकर किसी 'पूर्णता' की अवधारणा बनती है, उन सारे पक्षों को मिलाकर मेरे (स्त्री के) व्यक्तित्व का निर्माण हुआ है। भेद को प्रकट करनेवाले जितने पक्ष हैं उन सबको मिलाकर मैं 'अभेद' के व्यक्तित्व को प्राप्त करती हूँ। मैं 'द्वैत' की संभावना किसी दूसरे के साथ नहीं रखती, बल्कि अपने आप में मैं 'अद्वैत' को धारण करती हूँ । मैं बीन भी हूँ और उससे निकलने वाली रागिनी भी हूँ। जिस वीणा को तुमने झंकृत किया है; वह वीणा तो मैं हूँ ही, उससे निकली हुई स्वर लहरी भी मैं ही हूँ। मेरे अखंड व्यक्तित्व को समझो! 

प्रकृति में बसी हुई खामोशी और नींद मेरी ही थी। सब कुछ ठहरा हुआ था । कण-कण में यह ठहराव बसा हुआ था। तभी संसार में पहली हलचल हुई और जागृति के लक्षण दिखाई पड़े। यह जागृति भी मैं ही थी। नींद और जागरण का द्वैत मेरे व्यक्तित्व का ही हिस्सा था। इस तरह मैं न केवल नींद थी और न केवल जागृति ! मैं इन दोनों के अद्वैत से निर्मित हुई हूँ। मुझे पूर्ण व्यक्तित्व के साथ समझो! न तो मैं 'आधी' हूँ और न ही 'अधूरी' । अगला उदाहरण देकर महादेवी बताती हैं कि मैं प्रलय भी हूँ और प्रलय में बची रहने वाली जीवन की निशानी भी ! स्त्री के जीवन को 'अभिशाप' की तरह भी बताया गया है और प्रणय सूत्र में बँधे हुए 'वरदान' की तरह भी! स्त्री उस नदी की तरह रही है जो अपने किनारों के बीच शांतिपूर्वक प्रवाहित होती है और प्रसंग आने पर तटों को तोड़कर बह जाने का साहस और रोष रखती है। ये सभी उदाहरण बताते हैं कि स्त्री का व्यक्तित्व एकांगी या एकतरफा नहीं है, बल्कि पूर्णता की सभी शर्तों का निर्वाह करने वाला है।

इसी ढंग से यह कविता आगे बढ़ती जाती है और अपनी बात को साबित करने के महादेवी कई तरह के उदाहरण देती जाती हैं। मैं उस व्याकुल चातक पक्षी की तरह हूँ जिसकी आँखों में जल से भरे हुए बादल बसते हैं। मतलब यह कि मैं प्यास भी हूँ और पानी भी ! मैं वह शलभ हूँ जिसके हृदय में दीपक बसा हुआ होता है। शलभ दीपक को प्रेम करता है, मगर वही निष्ठुर दीपक मिलन के समय उसकी मृत्यु का कारण बनता है। मतलब यह कि मैं प्रेमी भी हूँ और प्रेमास्पद को अपने व्यक्तित्व में शामिल किए हुए भी हूँ। मैं उस व्याकुल बुलबुल की तरह हूँ जिसके हृदय में उसका प्रिय फूल बसा होता है। हालाँकि मैं तुमसे दूर हूँ, मगर शरीर और चंचल छाया की तरह तुमसे सदा जुड़ी हुई हूँ। सुनने में भले असंगत लगे, मगर तुमसे दूर रहकर भी अपने को अखंड सौभाग्यवती मानती हूँ । महादेवी का आग्रह है कि स्त्री का सौभाग्य पुरुष पर आश्रित नहीं है, वह अपने आप में भाग्यशालिनी है। 

पुनः अपनी तर्क-पद्धति पर आते हुए वे कहती हैं कि मैं उस आग की तरह हूँ जिससे ओस की बूँदें ढुलकती रहती हैं। मैं उस शून्य की तरह हूँ जिसमें क्षण की गति मौजूद है। कहते हैं कि शून्य में समय की गति रुक जाती है। मगर मेरा व्यक्तित्व शून्य और समय के दोनों छोरों से मिलकर बना है। मैं उस सिहरन की तरह हूँ जिसका निवास पत्थर में हो ! पत्थर और सिहरन भिन्न छोर हैं, एक में जड़ता है और दूसरे में सूक्ष्मतम गति – मैं इन दोनों को समेटती हुई अपने व्यक्तित्व का निर्माण करती हूँ। मैं बिम्ब और प्रतिबिम्ब दोनों हूँ। मैं नीला बादल भी हूँ और उसमे चमकने वाली सुनहली बिजली भी !

नाश और विकास के बीच यह सृष्टि चलती रही है। इस क्रम को चलाने में मेरी महती भूमिका रही है। मैं त्याग-रूपी दिन भी हूँ और आसक्ति - रूपी रात भी । राग और विराग की सीमाओं के विस्तार के बीच मेरे व्यक्तित्व का निर्माण हुआ है। मैं वीणा में लगा हुआ तार भी हूँ, उस पर पड़नेवाला आघात भी हूँ और उससे उत्पन्न होने वाली झंकार एवं उसकी गति भी हूँ। मैं प्याला भी हूँ, मदिरा भी हूँ, मदिरा पीनेवाला / पीनेवाली भी हूँ और इन सबसे उत्पन्न होनेवाले नशे की बेसुधी भी हूँ। मैं होंठ भी हूँ और होंठों पर खेलनेवाली मुस्कुराहट की उज्ज्वल चाँदनी भी हूँ ।

इस तरह कई उदाहरणों की सहायता से महादेवी वर्मा इस बात पर जोर देती हैं कि स्त्री का व्यक्तित्व अपनी पूर्णता के लिए किसी पर आश्रित नहीं है !

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