लोक की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।

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लोक की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।

लोक की अवधारणा

लोक की अवधारणा: भारतीय साहित्य में 'लोक' शब्द बहुत प्राचीन काल से प्रयुक्त होता आ रहा है। 'लोक' शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की 'लोकृ दर्शने' धातु में 'धञ्' प्रत्यय जोड़ने से हुई है। 'लोक दर्शने' धातु का अर्थ है 'देखना। अतः 'लोक' शब्द का मूल अर्थ हुआ - 'देखने वाला'। परंतु व्यवहार में 'लोक' शब्द का प्रयोग संपूर्ण जनमानस के लिए होता है। ऋग्वेद में 'लोक' शब्द का प्रयोग 'जन' के पर्यायवाची शब्द के रूप में किया गया है। पुरुष सूक्त में 'लोक' शब्द का प्रयोग 'स्थान' तथा 'जीव' शब्दों के अर्थ को व्यक्त करने के लिए किया गया है। अथर्ववेद में 'लोक' शब्द से दो लोकों की स्थिति का बोध कराया गया है। ये दो लोक हैं- 'पार्थिव' एवं 'दिव्य' । उपनिषदों में 'लोक' शब्द का प्रयोग अनेक स्थानों पर उपलब्ध होता है। जैसे 'जैमिनीय उपनिषद ब्राह्मण' में 'लोक' शब्द की व्याख्या विविध प्रकार से विस्तार लिए हुए, प्रत्येक वस्तु में निहित और प्रयास करने पर भी अनुपलब्ध' के रूप में की गई है। इसी परंपरा में लोक शब्द का प्रयोग 'महाभारत', 'श्रीमद्भागवत गीता' आदि में भी उपलब्ध होता है। पाणिनि, वररुचि और पतंजलि प्रभृत्ति वैयाकरणों ने भी 'लोक' शब्द का प्रयोग विविध अर्थों में किया है। भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में भी 'लोक' शब्द का प्रयोग सटीक रूप में किया गया है। भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में स्वयं लिखा है कि - इस शास्त्र की रचना लोक मनोरंजनार्थ की जा रही है। लोक शब्द का व्युत्पत्तिपरक अर्थ है- देखने वाला शब्दकोश में इस शब्द के सात अर्थ मिलते हैं - 1. स्थान बोधक 2. संसार 3. प्रदेश या क्षेत्र 4. जन या लोग 5. समाज 6. प्राणी 7. यश समग्र रूप में 'लोक' शब्द का प्रयोग उस जनसमूह के लिए किया जाता है, जो साज-सज्जा, ऊपरी दिखावा, सभ्यता एवं शिक्षा आदि से दूर आदिम मनोवृत्तियों से युक्त होता है। इस प्रकार वैदिक काल से लेकर आज तक 'लोक' शब्द का प्रयोग प्रायः समान अर्थों में अनवरत रूप में प्राप्त होता है। दृष्ट्व्य यह है कि 'लोक' शब्द का प्रयोग लोक-कल्याण अथवा लोक-संग्रह के संदर्भों में किया गया है। इसी को लक्ष्य करके परवर्ती संस्कृत साहित्य की भाषा को 'लौकिक संस्कृत कहा गया है। अतः संस्कृत साहित्य में 'लोक' शब्द का प्रयोग 'जन-सामान्य' के अर्थ में किया गया है । हिंदी साहित्य में भी परंपरागत रूप में, 'सामान्य जनता' के अर्थ में 'लोक' शब्द का प्रयोग किया जाता रहा है। हिंदी साहित्य के शोधार्थियों ने अपने शोध प्रबंधों में यह स्पष्टतः प्रमाणित किया है कि हिंदी साहित्य में वीरगाथा काल से ही इस शब्द का प्रयोग पाया जाता है। गोस्वामी तुलसीदास ने 'लोक' शब्द का प्रयोग सर्वथा सार्थक रूप में किया है। रामचरितमानस में 'लोक' और 'वेद' शब्दों का प्रयोग साभिप्राय रूप में करके महाकवि तुलसी ने लोक की सत्ता को स्वतंत्र रूप में स्थापित कर दिया है-

'लोकहु' वेद सुसाहिब रीती।

विनय सुनत पहिचानत प्रीती।

तथा -

भरत विनय सादर सुनिहु करेह विचारि बहोरि।

करब साधुमत 'लोकमत' नृपनय निगम निचोरि।

हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध समीक्षक स्वनामधन्य पं. रामचंद्र शुक्ल ने 'लोकमंगल' और 'लोकरंजन' को श्रेष्ठ काव्य की कसौटी निरूपित करते हुए 'लोक' शब्द का प्रयोग अनेक बार किया है।

लोक साहित्य के प्रसिद्ध विद्वान डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय ने लोक का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है कि जो लोग संस्कृत या परिष्कृत वर्ग से प्रभावित न होकर अपनी पुरातन स्थितियों में ही रहते हैं, वे 'लोक' होते हैं।

वास्तव में 'लोक' शब्द अंग्रेजी भाषा के शब्द 'फोक' का ही हिंदी रूपांतर है । अंग्रेजी के 'फोक' शब्द का प्रयोग अशिक्षित, अर्द्धशिक्षित, असभ्य, अर्द्धसभ्य वर्ग के लिए किया जाता है। अतः जो विद्वान व्यक्ति 'लोक' शब्द का प्रयोग सरल ग्रामीणों के लिए करते हैं, वे सामान्य दृष्टिकोण से 'लोक' शब्द तथा ग्रामीणों दोनों के प्रति अन्याय करते हैं। अतः निष्कर्ष रूप में प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा दिए हुए लोक के अर्थ को स्वीकार किया जा सकता है, यथा-

"लोक शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम्य नहीं है, बल्कि नगरों और ग्रामों में फैली हुई वह समूची जनता है, जिसके व्यावहारिक ज्ञान का आधार पोथियां नहीं है ।"

हिंदी के कुछ विद्वान 'जन' शब्द को 'लोक' शब्द के अर्थ में प्रयुक्त करते हैं। ये विद्वान 'लोक' और 'जन' को पर्यायवाची मानते हैं। अपने मत की पुष्टि में वे अन्यत्र दिए हुए एवं शब्दकोशों में उल्लेख किए हुए 'लोक' शब्द के विभिन्न अर्थों में 'जन' अर्थ को उद्धृत करते हैं। उदाहरणतः डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने 'जन' शब्द का प्रयोग ग्राम्य के अर्थ में किया है। डॉ. सत्येन्द्र ने 'लोक' शब्द को व्यापक तथा 'जन' शब्द को संकीर्णता का बोधक माना है। डॉ. त्रिलोचन पाण्डेय ने अपने शोध प्रबंध 'कुमायुंनी जन साहित्य का अध्ययन' में 'लोक' शब्द को भ्रामक बताते हुए 'जन' शब्द के उपयोग को ही उपयुक्त बताया है। विद्वानों और समीक्षकों की दृष्टि से डॉ. पाण्डेय 'लोक' शब्द के सतही अर्थ तक ही सीमित रह गए। यदि इस शब्द के अर्थ का गंभीरता से विश्लेषण किया जाए तो हम देखेंगे कि 'लोक' शब्द समाज की सूक्ष्म स्थिति यानी उसके अमूर्त भाव का बोधक है, जबकि 'जन' शब्द अपने अर्थ में स्थूलता वाचक है और जनता शब्द के अधिक निकट है। अतः 'जन' शब्द को 'जनता' शब्द के साथ संबंधित किया जा सकता है। परंतु इस संदर्भ में यह तथ्य भी दृष्ट्व्य है कि 'जनपद' शब्द का प्रयोग हमारे प्राचीनतम ग्रंथों में उपलब्ध होता है और उसका प्रयोग बहुलतापूर्वक किया गया है। आदि ग्रंथ वाल्मीकि रामायण में रामराज्य के वर्णन में उसका प्रयोग 'जनपद के संदर्भ में किया गया है। महाभारत में भी 'जनपद' शब्द का प्रयोग प्राप्त होता है। अतएव 'जन' शब्द की प्राचीनता और उसकी सार्थकता पर प्रश्न - चिह्न लगाने का कोई प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता है।

परवर्ती संस्कृत एवं पाली के साहित्यिक ग्रंथों में 'जन' शब्द का प्रयोग 'मानव समाज' के अर्थ में किया गया है। आधुनिक राजनीतिक शब्दावली में 'जनता' के अर्थ में 'जन' शब्द प्रयुक्त किया गया है। इस दृष्टि से 'जन' और 'लोक' शब्द प्रायः समानार्थी ठहरते हैं। दोनों में अंतर केवल यही है कि 'जन' मूर्त स्वरूप है और 'लोक' अमूर्त स्वरूप है।

उपर्युक्त संपूर्ण विवरण से निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि 'लोक' वस्तुतः अंग्रेजी भाषा के 'फोक' शब्द का हिंदी रूपांतर समझा जा सकता है और लोक साहित्य के संदर्भ में 'लोक' शब्द का प्रयोग ही सब दृष्टियों से उपयुक्त एवं उचित है। आज लोक साहित्य शब्द लोक प्रचलित एवं लोकमान्य हो गया है। लोक साहित्य को जन साहित्य कहना एक प्रकार से एक नये विवाद एवं भ्रांति को जन्म देना है।

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