लोक कथा की परिभाषा और विशेषता बताइये।

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लोक कथा की परिभाषा और विशेषता बताइये। 

लोक कथा की परिभाषा

लोक कथा जन्म मानव जन्म के साथ हुआ है। यही कारण है कि कहानी कहने की कला सब कलाओं से पुरानी है। आदिम युग से ही मानव अपने सुख-दुख रीति रिवाज़, आस्था, विश्वास और परम्परा को कहानी के माध्यम से प्रस्तुत करता रहा है।

डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी लोककथा की परिभाषा देते हुए कहते हैं- लोककथा शब्द मोटे तौर लो प्रचलित उन कथानकों के लिए व्यहत होता रहा है जो मौखिक या लिखित परम्परा से क्रमशः एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को प्राप्त होते रहे हैं।

डॉ. सत्येन्द्र के अनुसार - लोक में प्रचलित और परम्परा से चली आने वाली मूलतः मौखिक रूप से प्रचलित कहानियाँ लोक - कहानियाँ कहलाती हैं।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि लोकमानस से जुड़ी और लोक में परम्परा से मौखिक रूप में कही जाने वाली कहानी लोक-कथा है।

लोक-कथाएँ लोक में प्रचलित वे कहानियाँ हैं जो मनुष्य की कथा - प्रवृत्ति के साथ चलकर विभिन्न परिवर्तनों एवं परिवर्धनों के साथ वर्तमान रूप में प्राप्त होती हैं। लोकगीत की भाँति लोक-कथाएँ भी हमें मानव की परम्परागत वसीयत के रूप में प्राप्त है। दादी अथवा नानी के पास बैठकर बचपन में जो कहानियाँ सुनी जाती हैं, चौपालों में इनका निर्माण कब कहाँ कैसे और किसके द्वारा हुआ, यह बताना असंभव है।

लोक गीतों की भाँति लोक-कथाएँ भी किसी सीमा को स्वीकार नहीं करती। कहानी कहने वाला व्यक्ति कथा के प्रमुख पात्र को पहले वाक्य में ही प्रस्तुत कर देता है।

वास्तव में लोककथा शब्द की परिभाषा देना अत्यंत कठिन है। अतः लोककथा संज्ञा को एक साधारण अर्थवाचक संज्ञा के रूप ही प्रयोग किया गया है ।

लोककथा की विशेषताएँ

लोक-कथा की अपनी कुछ विशेषताएँ हैं जो उसे शिष्ट साहित्यिक कहानी से अलग पहचान देती है। लोककथा की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं- 

आशावादी दृष्टिकोण :- लोककथाओं के पात्र परिश्रम और उत्साह के साथ कठिन से कठिन कार्यों को करते हैं । कोई भी शक्ति इन्हें उनके उद्देश्य से विलग नहीं कर सकती। वे परिश्रम से शेरनी का दूध प्राप्त करते हैं, भूत, प्रेत और राक्षसों से युद्ध करके उन्हें जीतते हैं, भयावह जंगल इन्हें हतोत्साहित नहीं कर पाते, वे कल्पवृक्ष को उखाड़ लाते हैं और क्रुद्ध हाथी को अपने वश में कर लेते हैं ।

अश्लीलता का अभाव :- लोककथाओं में कहीं भी अश्लील प्रेम का वर्णन नहीं है। उनमें वर्णित प्रेम दिव्य, अलौकिक और आदर्श है ।

मूल प्रवृतियों से निरन्तर साहचर्य :- लोककथाओं में वर्णित घटनाओं का साहचर्य हमारी शाश्वत मूल प्रवृतियों से है। सुख - दुःख आशा-निराशा, काम, क्रोध, मद लोभ आदि ऐसी ही मूल प्रवृतियां जो लोक कथाओं में अभिनन रूप में पाई जाती हैं।

प्रकृति चित्रण का बाहुल्य :- लोककथाओं का उद्भव प्रकृति के सुरम्य प्रागण में हुआ है और वे वहीं पर सुनी सुनायी जाती हैं। इन कहानियों में तोता बोलता है, मोर नाचता है, सिंह न्याय करता है और वृक्ष साक्ष्य देता है। मैना, कोयल, कबूतरी और पिंडकुलिया हूँका भरती हैं। कहानियों के श्रोता हैं- सियार, लोमड़ी, बकरी आदि। लोककथाओं में प्रकृति और मानव एकाकार हो गये हैं। वे आपस में हँसते बोलते हैं और एक-दूसरे के दुःख में हाथ बटाते हैं ।

उत्सुकता की भावना :- लोककथाओं में अद्भुत रस की प्रधानता के कारण श्रोताओं की जिज्ञासा आगे की कथा को निरन्तर सुनने के लिए बनी रहती है। जिस समय कथाकार कथा कहता है, उस समय श्रोताओं की भीड़, उनका बार - बार आगे की घटना को पुछना फिर क्या हुआ', 'अच्छा और हाँ शब्द कथा सुनने में उत्सुकता को प्रकट करते हैं। आगे की घटनाओं को जानने की जिज्ञासा कहानियों की मुख्य विशेषता है। 

भाग्यवाद एवं कर्मवाद का समन्वय :- लोककथाएँ भारतीय संस्कृति को प्रस्तुत करती है। उनमें भाग्यवाद तथा कर्मवाद का समन्वय है । भाग्य के समर्थन के साथ कर्म की उपेक्षा नहीं की गई है। भाग्य की पूर्णतः के लिए कर्म को आवश्यक माना गया है। भाग्यवाद के साथ कर्मवाद की भी प्रशंसा की गई है।

वर्णन की स्वाभाविकता :- लोककथाओं के वर्णन में स्वाभाविकता होती है। कथानक की घटनाएँ पात्र और कथन - शैली एक साथ इस प्रकार पिराये रहते हैं कि उनमें कुत्तिमता का अनुभव नहीं होता । कथक्कड़ कथानक का बहुत सजीव और स्वाभाविक वर्णन करता है । 

समानता की व्यापकता :- विश्व भर की लोक कथाओं में समानता है। जो कहानियाँ भारतवर्ष में सुनी - सुनायी जाती हैं, वही कहानियाँ पात्रों के नामों के अन्तर से दूसरे देशों में कही जाती हैं। 

संक्षेप में कह सकते हैं कि लोकगाथाएं लोक साहित्य का एक विशिष्ट प्रकार का काव्य रूप होती है जो प्रबंध तत्व का निर्वाह करते हुए रोचकतापूर्ण वातावरण में लोककवियों का वाणी विलास कही जा सकती है ।

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