राज्य की उत्पत्ति के दैवी सिद्धांत की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।

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दैवी सिद्धांत की आलोचना 

यद्यपि राज्य की उत्पत्ति का दैवी सिद्धांत एक लम्बे समय तक मान्य रहा, किन्तु वस्तुतः सैद्धान्तिक एवं व्यवहारिक दोनों ही आधारों पर यह सिद्धांत अत्यधिक त्रुटिपूर्ण है। इस सिद्धांत की प्रमुख रूप से निम्नलिखित आलोचनाएँ की जाती हैं

(1) राज्य एक मानवीय संस्था है, दैवी नहीं-आधुनिक खोजों ने यह सिद्ध कर दिया है कि राज्य एक दैवीय संस्था न होकर मानवीय संस्था है जिसका धीरे-धीरे विकास हुआ है। उपर्यक्त तथ्य इस बात से सिद्ध है कि मनुष्य स्वभाव से ही एक सामाजिक प्राणी है। एक समुदाय या संगठन के अन्तर्गत रहना उसकी प्रकृति में निहित है। राज्य उसकी इस प्रकृति का परिणाम है। अत: यह कहना कि राज्य की उत्पत्ति ईश्वरीय इच्छा से हुई, मानवीय प्रकृति के विरूद्ध है। इस सम्बन्ध में गिलक्राइस्ट ने ठीक ही लिखा है कि "यह धारणा कि परमात्मा इस या उस मनुष्य को राजा बनाता है, अनुभव एवं साधारण ज्ञान के सर्वथा प्रतिकूल है।"

(2) राजा स्वेच्छाचारी एवं निरंकुश हो जाएगा- राजा को ईश्वर की श्वांस लेती हुई प्रतिमा मानने का स्वाभाविक परिणाम यह होगा कि राजा स्वेच्छाचारी एवं निरंकुश हो जाएगा। इतिहास इस बात का साक्षी है कि अपने आपको ईश्वर का अंश कहने वाले शासकों ने जनता पर अनेक अत्याचार किये और उन्हें ईश्वरीय प्रकोप से डराकर उन पर निरंकुशता का व्यवहार किया।

(3) अतार्किक- हमारे धार्मिक ग्रन्थ और ईश्वर के सम्बन्ध में हमारी सामान्य धारणा यही बताती है कि ईश्वर 'सत्यं, शिवं और सुन्दरम्' की अभिव्यक्ति है। ऐसी स्थिति में यदि राजा ईश्वर का प्रतिनिधि होता है, तो ईश्वर में भी ये ही गुण लक्षित होने चाहिए किन्तु इतिहास में अनेक ऐसे राजाओं का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने प्रजा पर अमानुषिक अत्याचार किये थे। एक निर्दयी राजा होने का अर्थ यह है कि या 'तो ईश्वर सर्वज्ञानी नहीं हैं अथवा राजा ईश्वर का प्रतिनिधि नहीं है क्योंकि सर्वज्ञानी ईश्वर निर्दयी राजा का चुनाव नहीं कर सकता है।

(4) रूढ़िवादी धारणा- यह सिद्धान्त हमें रूढ़िवादी की ओर ले जाता है। यह प्रस्तुत राज्य को दैवी इच्छा का परिणाम बतलाकर उसे पवित्र बनाने का प्रयत्न करता है और इस प्रकार मानव व्यक्तित्व की विकासशील प्रवृत्ति के विरूद्ध है। जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि राज्य का निर्माण ईश्वर द्वारा हुआ है तो हमें उसमें परिवर्तन करने का कोई अवसर नहीं रह जाता और प्रगति के सभी मार्ग अवरूद्ध हो जाते

(5) अवैज्ञानिक- डार्विन ने विकासवादी सिद्धान्त के आधार पर यह सिद्ध कर दिया है कि विश्व की कोई भी वस्तु ईश्वर द्वारा निर्मित नहीं है, वरन् ऐतिहासिक विकास का ही परिणाम है इस दृष्टि से दैवी सिद्धान्त नितान्त अवैज्ञानिक हो जाता है। फिगिस के शब्दों में, "यह सिद्धान्त केवल आस्था के आधार पर स्वीकार किया जा सकता है, तर्क के आधार पर नहीं।"

(6) वर्तमान परिस्थितियों में लागू नहीं होता- इस सिद्धान्त का यह कथन कि राजा को ईश्वर नियुक्त करता है, वर्तमान समय के प्रजातन्त्रात्मक राज्यों पर लागू नहीं होता।

वर्तमान समय में राज्य के प्रधान का जनता द्वारा निर्वाचित करवाये जाने के कारण यह सिद्धान्त नितान्त अवास्तविक एवं काल्पनिक हो जाता है। गिलक्राइस्ट के अनुसार, "आधुनिक राष्ट्रपति के लिए, जो जनता द्वारा चुना जाता है. इस दावे की स्थापना करना कठिन हो जाता है कि उसे अपने अधिकार दैवी सत्ता से मिले हैं।"

(7) नास्तिकों के लिए महत्वहीन- बहुत से व्यक्ति नास्तिक होते हैं जो परमात्मा के अस्तित्व में ही विश्वास नहीं करते। ऐसे व्यक्ति राज्य की आज्ञा का पालन क्यों करें? उस सम्बन्ध में भी यह सिद्धान्त कोई आधार प्रस्तुत नहीं कर पाया है।

(8) दैवी सिद्धान्त राजनीतिक होने की अपेक्षा धार्मिक अधिक- उपर्युक्त सभी आलोचनाओं के अतिरिक्त एक महत्वपूर्ण बात यह है कि दैवी सिद्धान्त राजनीतिक होने की अपेक्षा धार्मिक ही अधिक है। ईश्वर क्या है? उसके क्या अधिकार हैं? आदि प्रश्न धार्मिक हैं,राजनीतिक नहीं, और ईश्वर का सम्बन्ध धर्म से है राजनीति से नहीं। रिचर्ड हकर (Richard Hooker) ने इस सम्बन्ध में ठीक ही लिखा है कि "धर्म का सम्बन्ध मनुष्य के विश्वास से होता है। राजनीतिक बातों के सम्बन्ध में मनुष्य को अपनी विवेक बुद्धि पर निर्भर करना चाहिए, विश्वास पर नहीं।"

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