गुल्की बन्नो कहानी का शिल्प - Gulki Banno Kahani ka Shilp

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गुल्की बन्नो कहानी का शिल्प - Gulki Banno Kahani ka Shilp

गुल्की बन्नो कहानी का शिल्प: गुल्की बन्नो कहानी के नाम से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि यह 'गुलकी' की कहानी है। गुलकी अपने पिता की अकेली संतान है। गुलकी का चरित्र ही इस कहानी का सर्वस्व है। गुलकी के पिता इसके विवाह में ही मटियामेट हो गये। किन्तु गुलकी का पति कसाई निकला, उसने रखैल रख ली और गुलकी को घर से बाहर निकाल दिया। उसके उपरान्त जब वह अपने घर लौटती है तो उसे अनेक मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और अन्तः गुलकी अपने पति की सभी गलतियों को नज़र अंदाज कर पुनः उसके साथ घर लौट जाती है। 'गुलकी बन्नो' कहानी का शिल्प इस प्रकार है।

कथानक :-प्रस्तुत कहानी का कथानक पांच कथांशों में विभक्त है। कहानी का प्रारम्भ नाटकीय प्रणाली से किया गया है। प्रारंभिक कथांशों के बाद गुलकी के पूर्ववृत्त को उपस्थित करते समय भी नाटकीय प्रस्तुतिकरण हुआ है। कथानक का अंत भावुकतापूर्ण प्रसंग के साथ हुआ है।

चरित्र :- इस कहानी का मुख्य चरित्र गुलकी का है, किन्तु उसके चरित्र को उजागर करने के लिए जिन अन्य पात्रों को कहानी में लाया गया है, उनका स्वरूप उभारने में लेखक को सफलता मिली है। द्येद्या बुआ, ड्राइवर बाबू, ड्राइवर बाबू की पत्नी, साबुनवाली सती तथा बच्चों को गुलकी के चरित्र को उजागर करने के लिए कहानी में लाया गया ।

घेघा बुआ अर्थलोलुप्त स्त्री है। यह बात गुलकी को सहायता देने की घटना में छिपी अर्थलोलुपता तब और भी अधिक स्पष्ट हो जाती है, जब वह गुलकी के मकान को मिट्टी के मोल खरीदने में सहायता देकर उसके बदले ड्राइवर बाबू से सौ रूपये लेती है। कहानी में साबुनवाली सत्ती ने अपने दबंग स्वभाव के द्वारा रंग भर दिया है। सत्ती ने गुलकी की निःस्वार्थ भाव से सहायता की है, जिसे स्वीकार करते हुए गुलकी बन्नो कहती है - "अपनी सगी बहन क्या करेगी जो सत्ती ने किया हमारे लिये ।" वह गुलकी के लिए धेघा बुआ, ड्राइवर बाबू से बहस भी करती है।

देशकाल :- कहानी का देशकाल जैसा चाहिए उसे वैसे ही रूप में उपस्थित किया गया है। यह कहानी प्रयाग के एक मुहल्ले में घटित है। इसमें मुख्य घटनास्थल धेघा बुआ का चौतरा है। इसमें गौण रूप से ड्राइवर बाबू का घर तथा द्येद्या बुआ का घर घटनास्थल है। यह कहानी लगभग पूरे वर्ष की कहानी है। पहले कथांश में गरमी का एक दिन है। दूसरे कथांश में बरसात के दो दिनों के प्रसंग है। तीसरे, चौथे और पांचवे कथांशों में जाड़े के चार दिनों की कहानी है।

भाषा : कहानी में यथार्थता लाने के लिए लेखक ने स्थानीय बोली का प्रयोग किया है। इस बोली के कारण चरित्रों को स्वभाविकता प्राप्त हुई है और वातावरण के निर्माण में सहायता भी मिली है। द्येद्या बुआ रास्ते पर पड़ी गुलकी को उठाते हुए बिगड़ कर कहती है- "औकात रत्ती भनै, और तेहा पौवा भर ।" छोटे बच्चों का अवधी बोली में सवाल-जवाब करते हुए बुढ़िया का खेल खेलना बड़े ही सरस रूप में उपस्थित किया गया है -

"कुबड़ी - कुबड़ी को हे राना ?"

सुई हिरानी

"सुई लैके का करबे ?”

"कथा सबै ।"

स्थानीय बोली के प्रयोग से इस प्रसंग में हमारा ध्यान द्येद्या बुआ के संवादों की ओर चला जाता है। कहानी की भाषा में स्थानीय भाषा के चिबिड्डी, बिलवोटी, झींसी आदि शब्द प्रयुक्त हुए हैं। भाषा में स्वभाविकता भी दिखाई पड़ती है। इस दृष्टि से मिरवा और मटकी तोतली भाषा बोलते है - 'छलाम गुलाकी' ।

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