गुलकी बन्नो कहानी का चरित्र चित्रण

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गुलकी बन्नो कहानी का चरित्र चित्रण

गुलकी बन्नो कहानी का चरित्र चित्रण: कहानी के नाम से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि यह 'गुलकी' की कहानी है । गुलकी के चरित्र चित्रण में कहानीकार की कलात्मकता का परिचय मिलता है। गुलकी के माध्यम से कहानीकार ने परित्यक्ता स्त्री का जीवन चित्रित किया है। गुलकी अपने पिता की अकेली सन्तान है। पिता इसके विवाह में ही मटियामेट हो गए। जिससे विवाह हुआ वह कसाई निकला। जब गुलकी को शादी के पांच साल बाद मरा हुआ बच्चा पैदा हुआ, तो उसने गुलकी को सीढ़ी पर से नीचे ढकेल दिया, जिसके परिणामस्वरूप वह जिन्दगी भर के लिए कुबड़ी हो गयी। उसके बाद उसके पति ने रखैल रख ली और गुलकी को घर से निकाल दिया । पति द्वारा परित्यक्त स्त्री को समाज में सब लोग उपेक्षित दृष्टि से देखते हैं और उसकी मदद करने के स्थान पर उसका सब कुछ हड़पना चाहते हैं। ऐसी ही स्थिति का सामना गुलकी को भी करना पड़ता है। घर से निकाल दिये जाने के बाद जब गुलकी अपने मैके लौटी, तो निर्मल की माँ ने अपने पति ड्राईवर बाबू से कह दिया कि गुलकी को घर की चाभी न दे। क्योंकि उसका घर ड्राईवर के कब्ज़े में था । गुलकी पर थोड़ी-सी सहानुभूति दिखाते हुए द्येद्या उसे अपने चबूतरे पर दुकान खोलने देती है। गुलकी सब्जी की दुकान चलाकर अपना गुजर बसर करती है। परन्तु बाद में घेघा बुआ उसे चबूतरे पर दुकान लगाने से मना कर देती है "पांच महीने से किराया नाही दियो और हियाँ दुनिया भर के अन्धे–कोढ़ी बटुरे रहत है। चलौ उठाओ अपनी दुकान हियां से।" इस प्रकार उसकी रोजी-रोटी भी बन्द हो जाती है।

गुलकी अपनी स्थिति के कारण विवशता व आक्रोश से भर जाती है। वह अपना सारा गुस्सा मासूम मटकी पर निकाल देती है। पहले मटकी और मेवा को कुछ न कुछ देती परन्तु सबसे दुत्कार व कपट मिलने के पश्चात वह आक्रोश से भर जाती है। मटकी के उसकी दुकान से फ्रूट उठाने पर गुलकी उसे मारती, वह भला-बुरा कहती है। “वह उबल पड़ी और सड़ासड तीन-चार खपच्ची मारते हुए बोली, चोट्टी । कुतिया ! तोरे बदन में कीड़ा पड़े। क्योंकि वो फ्रूट 10 रूपये का था इसलिये वह मटकी को मारती है।

रोमाण्टिकता का रूप स्वयं गुलकी में दिखाई देता है। 'न दूध की न पूत की, हमारे कौन काम की” कहने वाले पति को गुलकी दोष नहीं देती। वह कहती है- "खोट तो हमीं में है।" इतना ही नहीं, एक बार कूबड़ निकाला, अगली बार परान निकलेगा' कहकर पहले से ही 'दासी बनकर रहे कहते हुए गुलकी को अपने साथ ले जानेवाले पति के नववधू के उल्लास के साथ गुलकी का विदा होना रोमाण्टिकता से युक्त है। वह नादान मेवा से कहती है – “कितना दुबरा गया है” वह पति के पास पान का बीड़ा पहुंचाने के लिए सलज्ज होकर मेवा को समझाती है - "तुझे कसम है, बताना मत किसने दिया है।" इस प्रसंग में लेखक ने गुलकी की 'बीभत्स' मुस्कान का उल्लेख किया है। गुलकी का पति-परमेश्वर के प्रति सर्वस्व रूप से समर्पित होने की भावना रोमांटिक प्रतीत होती है।

पति के गलत करने पर भी जब ड्राईवर बाबू और द्येद्या बुआ गुलकी को वापिस ससुराल जाने को कहते हैं तो वह चुपचाप चली जाती है। गुलकी पति का विरोध तथा उसे सजा देने के स्थान पर उसके पांव में गिरकर रोने लगती है। इससे गुलकी की असमर्थतता व पारम्परिक स्त्री का रूप स्पष्ट होता है। 

अतः कहानी में परित्यक्ता स्त्री का उपेक्षाभरा जीवन, मायके लौट आना, रिश्तेदारों एवं समाज में मिली हिकारत, खासतौर से द्येद्या बुआ द्वारा सताना, गुलकी की दुकान तहस-नहस होना, गुलकी को बच्चों द्वारा सताना, एक मात्र आसरा मकान का ढ़ह जाना, फाके पड़ना, सत्ती के घर में आश्रय और फिर पति के बुलावे पर उससे भी बदतर नरकमय जिंदगी बिताने के लिए चले जाना - मानो लगता है, एक करूण जिंदगी घिसट-घिसटकर चल रही है। गुलकी के माध्यम से कहानीकार ने परित्यक्ता स्त्री का जीवन चित्रित किया है। गुलकी के चरित्र चित्रण के अनेक पहलुओं से परित्यक्ता स्त्री की बेबसी, मजबूरी, असहायता, वेदना, दुख और जीवन संघर्ष चित्रित हुआ है। 

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