सावित्री नम्बर दो की मूल संवेदना

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सावित्री नम्बर दो की मूल संवेदना

सावित्री नम्बर दो की मूल संवेदना :- धर्मवीर भारती द्वारा 'बन्द गली का आखिरी मकान' 1969 में प्रकाशित कहानी संग्रह है। 'सावित्री नम्बर दो' इसी संग्रह में प्रकाशित दूसरी कहानी है। इस कहानी में मृत्यु-शैया पर लेटी एक स्त्री की एक-दूसरे से टकराती, लहूलुहान अन्तर्विरोधी भावनाओं को अलग छोड़ हृदय-भेदी पारदर्शिता के साथ उघाड़े है। सावित्री का मोह और शारीरिक वासना, देह का आकर्षण झर जाने की मर्मान्तक पीड़ा, पति के प्रति प्रेम और आक्रोश जैसी एक-दूसरी से गुँथी भावनाओं को भारती जी ने आखिरी बूंद तक निचोड़ा है।

एक बीमार व्यक्ति का क्या जीवन का घटना चक्र वैसे ही चलता है, जैसा हम उसे देखते हैं। वह थोड़ा-सा बदल जाता है और भारती जी उसके इसी बदलाव को बड़ी ही सूक्ष्मता से इस कहानी में व्यक्त करते है: “लम्बी बीमारी में वक्त गुजारने का हिसाब भी अजब होता है। कुछ चीजों को लेकर वक्त जहाँ का तहाँ थम जाता है। जो घटना हुई, बस वही होती रहती है .... उस घटना का घटित होना अपने में मुकम्मिल हो गया है। कुछ चीजें ऐसी है जो मशीन की तरह अपने वक्त से होती जा रही हैं ... शाम होना, पार्क में बच्चों का इकट्ठा होना, पतंग उड़ाना, सामने की खिड़की से उस लड़की का जवान और चंचल होते चले जाना। सब अपनी जगह चक्के की तरह घूम रहे हैं। कुछ आगे नहीं बढ़ता।"

कहानी का शीर्षक ही हमारा ध्यान सावित्री की ओर आकृष्ट करता है। जो सती सावित्री से भिन्न एक सामान्य स्त्री है। लेखक ने इस कहानी में रोगग्रस्त व्यक्ति की मनोव्यथा का चित्रण किया है। सावित्री अपने पति व परिवार की बड़ी प्रिय थी। परन्तु उसे क्षय रोग लग गया। जिसके कारण उसे ऐसा लगने लगा कि अब वह किसी के लिए काम की नहीं रही। वह अपने पति को प्यार भी करती और आक्रोश में आकर कटु शब्द भी कहती। उसे लगने लगा की वह घर में पड़ी किसी बेकार वस्तु के अतिरिक्त कुछ नहीं है । अपनी इसी सोच के कारण वह अपनी बहन का संबंध अपने पति के साथ जोड़ती है और उन दोनों पर शक करती है। पूरे घर में सावित्री की शंका ने सन्नाटा बना दिया था। भारती जी ने सावित्री के माध्यम से रोग ग्रस्त व्यक्ति की कुंठित मनोवृतियों का चित्रण किया है।

सावित्री के माध्यम से लेखक ने पश्चाताप की भावाभिव्यक्ति भी करायी है। कहानी में मानवीय पश्चाताप की वृत्ति का चित्रण किया गया है। मानव आक्रोश में आकर गलत कदम उठा लेता है परन्तु समय निकलने के पश्चात पछताता है। ऐसी ही स्थिति सावित्री के साथ होती है। सावित्री अपने शरीर को असमर्थन पाते हुए पति को बुरा कहती और और बाद में पश्चाताप भी करती है कि जो व्यक्ति मेरे रोग को जानते हुए भी दिन-रात साथ है, वह मुझे कुछ नहीं कहता। सावित्री अपने आप को पति के आगे छोटा पाती है क्योंकि उसका पति निस्वार्थ भाव से उसके साथ है और अपनी माँ के कहने पर दूसरी शादी भी नहीं करता । इसी के चलते भी कुंठित सावित्री पति पर आरोप करती है।

इस कहानी में लेखक ने मानव में व्याप्त ईर्ष्या की भावना का चित्रण भी किया है। असाध्य बीमारी की अस्थिर मनःस्थिति के कारण सावित्री अपनी छोटी बहन सित्तों को अपने पति के कंधे से सटकर खड़ा देखकर ईर्ष्या से जल उठती है। वह अपनी माँ, ननद व सास के लिए भी अपशब्दों का इस्तेमाल करती है। अपने रोग के कारण दुखी हो वह सब को गलत कहती और अन्त में चुप होकर स्वयं कोने में पड़ी रहती ।

अतः इस कहानी के माध्यम से लेखक ने रोग ग्रस्त सावित्री की पीड़ा को नये कोण से दिखाया है। सावित्री शरीर की पीड़ा के साथ-साथ मन की पीड़ा से ग्रस्त है।

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