स्वर्ग और पृथ्वी कहानी का शिल्प - Swarg aur Prithvi Kahani ka Shilp

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स्वर्ग और पृथ्वी कहानी का शिल्प - Swarg aur Prithvi Kahani ka Shilp

स्वर्ग और पृथ्वी कहानी का शिल्प: 'स्वर्ग और पृथ्वी' कहानी संग्रह में कुल 14 कहानियाँ है। भाषा की रंगमंचीयता और उड़ान के कारण यह कहानियां परलोक की प्रतीत होती हैं। इस कहानी में लेखक ने मनुष्य जीवन के शाश्वत प्रश्नों को उठाया है। इस कहानी में लेखक ने स्वर्ग से बढ़कर पृथ्वी को बताया है। इस कहानी की मूल भावना मानव की महानता है। जीवन की सभी अच्छाईयों और बुराईयों के साथ भी मानव इतना महान् है, इतना ऊँचा है कि देवताओं तक को उसके भाग्य से ईर्ष्या होती है। इस कहानी का शिल्प इस प्रकार है।

कथानक :- कहानी के आरम्भ से ही इस कहानी के कथानक का आभास हो जाता है - "चाँदनी के सागर के तट पर, स्वर्ग के एक उजाड़ कोने में, हलके सुनहरे बादलों का एक प्रसाद था।" लेखक की यह कहानी स्वर्ग में घटित है। लेखक ने अपनी कल्पना के धरातल पर स्वर्ग और पृथ्वी पर प्रेम के महत्त्व को दिखाया है। कहानी के अंत में पृथ्वी का वर्णन हुआ है। पूरी कहानी स्वर्ग में चलती है। अंत में पृथ्वी की ओर प्रस्थान करती है। स्वर्ग के लोग पृथ्वी पर कभी निवास नहीं करते। परन्तु पृथ्वी के लोग स्वर्ग में रहने के सपने देखते हैं।

चरित्र :- स्वर्ग और पृथ्वी' कहानी में कल्पना, प्रेम और वेदना चरित्र रूप में चित्रित किये गये हैं। देवराज इन्द्र भी इस कहानी का गौण पात्र है।

कल्पना एक ऐसी पात्र है जो अपने सूनेपन की रानी थी। वह स्वर्ग में रहती हुई भी स्वर्ग से अलग रहती थी। कल्पना अपने ही महल की दुनिया में रहती थी। 'प्रेम' एक देवकुमार था जिसे स्वर्ग से निर्वासित कर दिया गया था। क्योंकि प्रेम किसी भी बंधन को स्वीकार नहीं करता । परन्तु 'प्रेम' कल्पना के देश की नीरवता और एकान्त को भंग करता है। कल्पना प्रेम के प्रति सहानुभूति रखती है। इस पात्र के माध्यम से लेखक ने प्रेम की शाश्वता को दिखाया है। प्रेम निस्वार्थ होता है और कल्पना का आश्रय पाकर स्वर्ग की प्राप्ति कर लेता है।

देशकाल :- 'स्वर्ग और पृथ्वी' कहानी में स्वर्ग और पृथ्वी का चित्रण हुआ है। एक ऐसा लोक जिसे व्यक्ति मरणोपरान्त पाने की कामना रखता है। हम सब लोग इस पृथ्वी पर वास करते है। स्वर्ग एक कल्पना जगत है। इसमें प्रेम के निर्वासन के उपरान्त कल्पना और प्रेम का स्वर्ग को त्याग कर पृथ्वी की ओर जाने का वर्णन किया गया है।

भाषा: इस कहानी में भाषा की प्रांजलता तथा निखार सराहनीय है। शब्द - योजना सुकुमार होते हुए भी भावों को वहन करने में पूर्ण समर्थ है। संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का प्रयोग इस कहानी में हुआ है। दृश्य - चित्रों की योजना में भारती की भाषा बहुत सफल है। दृश्य - चित्रों के विधान के अतिरिक्त कहीं-कहीं लेखक ने उपमाएं भी बहुत अनूठी दी है। "चंचल लहरों का मन्द स्वर हल्के-हल्के झकोरों के साथ थपकियां देता था। जलपक्षियों का मधुर सुकोमल संगीत उसे लोरी सुनाता था वह पलकें मूंद कर सो जाती थी।" भाषा में कहीं-कहीं लाक्षणिकता का स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होता है।

अतः कहा जा सकता है कि धर्मवीर भारती की कहानियों में अपूर्व संवेदनशीलता, सामाजिक दायित्व का निर्वाह करने का आग्रह, यथार्थपरक सामाजिक परिवेश के बहुविध पक्षों के सूक्ष्म उद्घाटन करने की प्रयत्नशीलता लक्षित होती है। इन तीनों कहानियों की विषय-वस्तु तत्काल जीवन की विविध परिस्थितियों तथा काल्पनिकता के सन्दर्भ में वर्णित की गयी है।

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