नीली झील कहानी की मूल संवेदना - Neeli Jheel Kahani ka Mool Samvedna

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नीली झील कहानी की मूल संवेदना - Neeli Jheel Kahani ka Mool Samvedna

'नीली झील' पहले दौर में लिखी गई अन्तिम कहानी है । यह कहानी मानवीय संवेदना को व्यक्त करती है। प्रकृति और पर्यावरण का महत्व बताती हुई यह कहानी पक्षियों से जुड़े मानव मोह को व्यक्त करती है। इसलिए सारी कहानी पक्षियों के इर्द-गिर्द ही घूमती है। इस कहानी का नायक महेसा एक मज़दूर हैं। अशिक्षित है और कानपुर से मिल की नौकरी छोड़कर किसी शहर से थोड़ी दूरी पर स्थित 'नीली झील' की ओर जाने वाले रास्ते पर मज़दूरी करता है। सौंदर्य के प्रति उसकी अनाम सी भूख है। उसे नीला रंग प्रिय है इसलिए नीली झील, नीली साड़ी वाली मैम की ओर आकृष्ट हो जाता है। वह विधवा पंडिताइन से विवाह करवाता है और उसकी मृत्यु के बाद भी उसकी यादों में खोया रहता है। झील पर आए हुए अंग्रेज सैलानियों को पक्षियों का शिकार खेलता देख द्रवित हो जाता है वह पक्षियों को बचाने के लिए झील को ही खरीद लेता है।

इस कहानी की मूल संवेदना को निम्नलिखित बिन्दुओं में देखा जा सकता है-

  1. पक्षियों के प्रति संवेदना व्यक्त करना
  2. अकेलेपन की पीड़ा का वर्णन करना
  3. नारी स्वातन्त्र्य पर बल देना

पक्षियों के प्रति संवेदना व्यक्त करना

रचनाकार ने पक्षियों की प्रजातियों के प्रति चिंता व्यक्त की है। वातावरण में सामंजस्य को बनाये रखने के लिए मानव के साथ-साथ पक्षियों का होना भी आवश्यक है। पक्षी मानव के लिए कई हानिकारक जीवों को आहार बनाकर व्यक्ति को सुरक्षा प्रदान करते हैं इसलिए सम्पूर्ण मानव जाति की सुरक्षा के लिए पक्षी भी प्रकृति का एक अनिवार्य हिस्सा है। आधुनिक मानव अपनी प्रसन्नता और शौक के लिए पक्षियों का शिकार कर उनकी कई प्रजातियों को ही समाप्त कर रहा है। इस कहानी की मूल संवेदना पक्षियों का संरक्षण और पक्षी प्रेम पर आधारित है। 

कहानी नायक महेसा पांडे का पक्षियों के साथ विशेष प्रेम है। वह पक्षियों की आवाज़ से पक्षियों को पहचानता है और उनकी ध्वनि से वह उनके सुख-दुख को भी जान जाता है। सारा - सारा दिन वह नीली झील पर व्यतीत करता है क्योंकि विशेष ऋतु में विशेष पक्षी इस झील का मेहमान बनते हैं इसलिए पक्षियों का आकर्षण उसे हर समय उसकी ओर खींचता है पर यह झील अपने प्राकृतिक सौंदर्य और पक्षियों की आवास स्थली होने के कारण सैलानियों के लिए भी आकर्षण का केन्द्र बनी हुई है। वह इस स्थान पर आकर पक्षियों का शिकार करते हैं। अतः महेसा सैलानियों द्वारा पक्षियों का शिकार करने पर उदासीन हो जाता है। वह नहीं चाहता कि सैलानी इनका शिकार करें। वह पक्षियों को पालने का शौक रखता है इसलिए वह अपनी पत्नी पारबती से चोरी पक्षियों को पालता है। उनके अण्डे भी छुपा कर रखता है। पारबती को दिखाता हुआ कहता है- "देख पारबती, यह वाक का अण्डा है, यह सारस का और यह सोनापतारी का । महेसा एक-एक अण्डा उठाकर दिखाने लगा।" वह पक्षियों के संबंध में हर बात का ज्ञान रखता है। जैसे कि इन पंक्तियों से स्पष्ट होता है, "आजकल नई-नई चिड़ियां बहुत दिखाई पड़ती हैं, ये चिड़ियां मेहमान हैं... कार्तिक खत्म होते आती हैं और फागुन चैत तक चली जाती हैं।" पक्षियों का शोर सुनकर उसका मन बहक जाता है। वह एकदम उन्मत होकर उनकी ध्वनि की तरफ खींचा हुआ चला जाता है। वह सोचता है इन पक्षियों को मारने से क्या फायदा है। उसे तो बंद पिंजरे में पक्षियों का पालना भी अच्छा नहीं लगता। वह कितनी - कितनी देर इन पक्षियों को निहारता रहता। जब सैलानी शिकार करते हैं तो एकदम निराश हो जाता है उस पर इसका क्या प्रभाव होता है। निम्न पंक्तियों से स्पष्ट है- "...फिर एक भयंकर धड़ाके की आवाज़ से वह चौंक उठा। बाईं ओर दलदल से सारसनी की तुरही सी तेज़ चीख आई और गूंजती रही। वह बार-बार चीख रही थी और सारस अकुलाया-सा कुछ ऊपर चक्कर काट रहा था। कभी दलदल में उतर कर चीखता कभी लम्बे-लम्बे डग भरकर इधर-उधर लपकता और वैसी ही तेज आवाज़ में चीखने लगता।" सारसनी को गोली लगने पर सारस व्याकुल होकर शायद सहायता के लिए पुकारता है । महेश पांडे की आंखों में अश्रु आ जाते हैं जहां तक कि पक्षियों की आवाज़ दिनभर उसे विचलित करती रहती है। "रात भर उस अकेले घर में उसे बार- बार वही तेज़ आवाज़ सुनाई पड़ती रही।" 

उस झील पर सवनहंस पक्षी कार्तिक के अंत में आते हैं और फाल्गुन मास तक फिर वे उड़कर पहाड़ों की ओर चले जाते हैं। महेसा उनके साथ अपना अजीब रिश्ता महसूस करता है उसे लगता है कि शायद ये भी शिकारियों की गोली का शिकार हो जाएंगे। उसे उनकी शिकार में पारबती का अन्त दिखाई देता है। वह मायूसी से सोचते हैं- "फिर सवनहंसों का एक झुंड अपने राग का स्वर मिलाता हुआ झील के दूसरे किनारे पर उतर पड़ा और दो-चार हंस गेहूं और चने के खेत में घुसकर अंकुर खाने लगे। गर्दन उठा-उठाकर वे ऐसे देख रहे थे, जैसे अजनबी हो, और सचमुच वे अजनबी ही है। महेस पांडे का मन न जाने क्यों भर आया! ये सवनहंस अब आए हैं, चार-पांच महीने रहकर पारबती की तरह चले जाएंगे, या फिर किसी शिकार का शिकार हो जाएंगे, जैसे पारबती हो गई। इनके धूसर पंख खून की लकीरों से टंक जाएंगे, और इनके परों को पकड़कर शिकारी ऐसे लटका ले जाएगा जैसे मुर्दा पारबती को अस्पताल के भंगी पलंग से उठाकर उस सूने बरामदे में ले आए थे।"

वह पक्षियों को बचाने के लिए कहानी के अंत में उस नीली झील को ही खरीद लेता है यहां पर सैलानी शिकार खेलने आते है और झील के बाहर बोर्ड लगवा देता है। जिस पर उसने लिखा था, "यहां शिकार करना मना है। 'और नीचे की पंक्ति थी, 'दस्तखत नीली झील का मालिक, महेस पांडे ।" इस प्रकार महेस पांडे द्वारा झील को ही खरीद लेना पक्षियों की सुरक्षा का आधुनिक प्रयास है।

अकेलेपन की पीड़ा का वर्णन करना

कमलेश्वर ने अपनी कहानियों में अकेलेपन को कई रूपों में चित्रित किया है। प्रस्तुत कहानी में पंडिताइन की मृत्यु के बाद महेसा अकेलेपन की एक विचित्र पीड़ा से गुज़रता है। अकेला तो वह विवाह से पहले भी था तब तो उसका अकेलापन फक्खड़ था उसे कोई चिंता नहीं थी। पर अब वह विधुर है और पारबती का पैसा भी उसके पास है। पर वह पारबती के बिना अपने आप को अधूरा मानता है। उसके अकेलेपन की पीड़ा को लेखक ने निम्नलिखित पंक्तियों में चित्रित किया है— “सूने घर में महेसा आठ-आठ आंसू रोता और उसे पारबती की एक-एक बात याद आती ... चीजें देखता तो आँखों में आंसू भर जाते... घर का सूनापन अब उसे काटने को दौड़ता । " घर का अकेलापन वह सहन नहीं कर पाता है। लोगों ने दूसरी शादी का सुझाव दिया पर वह पारबती की याद में ही जीवन जीना चाहता है। उसका सारा - सारा दिन झील के किनारे कटने लगा। उसे अब इस बात की फिक्र भी थी कि पारबती की अन्तिम इच्छा पूरी की जाए। इसके लिए वह क्रूरता से लोगों से पैसे वसूल करता। फिर वह पारबती के बाद इतना अकेला पड़ जाता है कि उसकी मृत्यु के तीन वर्षों बाद ही वह बूढ़ा लगने लग जाता है। कथाकार लिखता है - "आदमी बूढ़ा नहीं होता, वक्त उसे बूढ़ा बना जाता है।" वह इस उधेड़बुन में रहता है कि पारबती मंदिर बनाया जाए या पक्षियों को संरक्षण दिया जाए और अंत में जब वह मन्दिर के पैसों से दलदली नीली झील खरीद लेता है तो लोग कहते हैं इसका दिमाग खराब हो गया है। झील में पक्षियों की सुरक्षा में उसका अकेलापन कटने लगता है। 

नारी स्वातन्त्र्य पर बल देना

रचनाकार ने इस कहानी के माध्यम से सामाजिक परंपराओं में बंधी हुई स्त्री को उन परंपराओं को त्याग कर स्वयं के लिए निर्णय लेते हुए दर्शाया है। इस कहानी की नायिका पारबती जो विधवा है वह किसी की परवाह किए बिना स्वतन्त्र रूप से यह फैसला करती है कि वह पुनर्विवाह करेगी और वह महेसा से विवाह करती है जो कि आयु में उससे दस वर्ष छोटा है। कहानी के प्रस्तुत उदाहरण से स्पष्ट है, "झील तक वह सड़क तो पूरी नहीं बन पाई, पर महेसा गैंग से बिछुड़ गया, विधवा पण्डिताइन ने उससे शादी कर ली थी। लोगों ने तरह-तरह की बातें काही....... किसी का कहना था कि जवान देखकर पण्डिताइन ने फांस लिया और कोई कहता था कि महेसा रूपया-पैसा देखक ढरक गया.....।" पंडिताइन न केवल विवाह करती है अपितु वह समाज में प्रचलित इस धारणा का भी खंडन करती है कि पुरुष की आयु स्त्री से बड़ी होनी चाहिए। भारतीय समाज में नारी की स्थिति विदेशी स्त्री के मुकाबले बहुत पिछड़ी हुई है। पिछली शताब्दी तक नारी अपने पति के साथ कंधा मिलाकर नहीं चल सकती थी। वह पुरुष से चार कदम पीछे ही रही। इस कहानी में सैलानी जब स्त्री पुरुष इकट्ठे आते हैं तो ग्रामीणों पर भी इसका प्रभाव पड़ता है और पुरुष भी अपनी स्त्री के साथ चलने में अपनी शान समझने लगा । महेसा भी पंडिताइन को साथ चलने के लिए कहता है जैसे कि उदाहरण से पता चलता है-

"राह में साथ चलते महेसा से पारबती पण्डिताइन कहती, तुम्हें तो ज़रा भी सऊर नहीं है ! मरद घरवाली के आगे-आगे चलता है, साथ नहीं ! लोग क्या कहेंगे? ....आगे चलो ! और सर पर साफा बांधे महेसा कहता, बड़ी सरम आय गई है! सहर में मेम लोग इसी माफिक चलती हैं, बल्कि बांह में हाथ फंसाके!”

इस प्रकार रचनाकार ने इस कहानी में नारी को सशक्त दिखाकर उसे प्रेरित किया है। 

निष्कर्षतः इस कहानी की मूल संवेदना पक्षियों के संरक्षण के साथ जुड़ी है। महेस पक्षियों से प्रेम के कारण मंदिर एवं धर्मशाला के लिए एकत्रित किए धन से नीली झील को खरीद लेता है। इसके साथ ही लेखक ग्रामीणों के प्रति भी विशेष श्रद्धा रखता है इसलिए कहानी में ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति पर प्रकाश डालते हुए बताया है कि गांव में गरीबी का राज था और ग्रामीण अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सूद पर पैसे लेते हैं। पारबती का समय-असमय पैसों से लोगों की सहायता करना इसी ओर संकेत करता है। दूसरी ओर रचनाकार ने पंडिताइन का महेसा के साथ विवाह करवाकर पुनर्विवाह को प्रोत्साहित किया है। इसके माध्यम से कथाकार ने एक स्वस्थ समाज की ओर भी संकेत किया है। पति-पत्नी के संबंधों की प्रगाढ़ता चित्रित करते हुए महेस पांडे की पत्नी विरह से भी अधिक उसका पक्षियों के लिए समर्पण बताया है।

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