सावित्री का चरित्र चित्रण - Savitri Ka Charitra Chitran

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सावित्री का चरित्र चित्रण - Savitri Ka Charitra Chitran

सावित्री का चरित्र चित्रण - सावित्री नम्बर दो कहानी की प्रधान पात्र सावित्री है। असाध्य रूग्ण सावित्री एक साधारण नारी है, जिसे कहानी में अपने जीवन की घटनाओं को आत्मकथा के रूप में प्रस्तुत किया है। प्रस्तुत कहानी में सावित्री के अतिरिक्त अन्य चरित्र गौण है। इस कहानी में सावित्री की पीड़ा एक नये कोण से उठती है शरीर की पीड़ा बनाम मन की पीड़ा। सावित्री दो प्रकार के क्षय रोग से लड़ है। एक शरीर के क्षय रोग से और दूसरा मानसिक क्षय रोग से जिसमें संस्कारों और परम्परित मूल्यों के रूप समाहित है। 

कहानी में सावित्री का पति आद्यन्त सम्बन्धित है। सावित्री पति को बांधे रखने में असमर्थतता का अनुभव करती है। वह क्षय रोग से ग्रस्त होने के कारण अपने पति को खुश रखने में अपने आप को असमर्थ समझती है। सावित्री को विवाह के बाद उसकी सास ने आर्शीवाद देते हुए कहा - "जैसा नाम वैसी बनो बहू।" सावित्री ने वैसा बनने का प्रयत्न भी सोत्साह किया था और इसी उत्साह के आवेश में उसने कैप्टन मुरारी के कंधे पर हाथ रखने के कारण तमाचा मारा था। किन्तु परिस्थितियों ने कुछ ऐसा मोड़ लिया कि सावित्री ने अपने पति की मौत तक की कामना की थी। इसीलिये तो आत्मविश्लेषण करते हुए इस दूसरी सावित्री ने सती सावित्री को संबोधित करते हुए कहा - "मृत्यु की दूसरी गाथा है सावित्री बहन, तुम्हारी गाथा से बिल्कुल पृथक।" सती सावित्री की मौत सत्यवान की मौत के समान आसान नहीं है, जिसने किसी प्रकार की जटिलता न हो और न ही सत्यवान के समान मृत्यु के द्वार से गौरव भरी वापसी ही है। यह तो एक हाडमॉस के व्यक्ति की मृत्यु गाथा है, जिसे मृत्यु की मर्मांतक प्रतीक्षा करनी पड़ रही है। इस प्रकार की पीड़ा से सत्यवान अछूता रहा था।

मृत्यु की चेतना सावित्री से तब उत्पन्न हुई, जब वह असाध्य रोग के चुंगल में फंस गई। रोग में फंसने से पूर्व उसने लाड़ला बचपन बिताया था। तब उसकी माँ उसे प्यार से 'सवित्तरा' कह कर पुकारती थी। शादी के बाद तो मैके की 'सवित्तरा' पति की 'सावी' बन गई थी। किन्तु हड्डी - हड्डी को गलाने वाले असाध्य रोग के कारण शादी के दूसरे साल में ही परिस्थिति में परिवर्तन प्रारम्भ हो गया ।

सावित्री को लगता है कि रोगग्रस्त होने के कारण अब वह अपने परिवार व पति पर भोज बनकर रह गई है। उसे ऐसे अनुभव होता है कि "वह उनके गले पड़ा एक अनावश्यक बोझ है जिसे न अब वह ढो पाती है, न उतार पाती है।" वह रोज देखती की धीरे-धीरे पति के मन से प्यार मरता जा रहा है। उसका पति उससे इसलिये स्नेह रखता है कि इस औरत को अब थोड़े दिन जीना है, तो इसका दिल क्यों दुखाया जाए। इसी आशंका के चलते वह अपने पति पर शक करती है। अपनी ही छोटी बहन का संबंध अपने पति से सोचती है। सावित्री में आत्मविश्वास और संतोष की मनःस्थिति क्षणिक बनकर रह जाती है। असाध्य बीमारी की अस्थिर मनःस्थिति के कारण सावित्री अपनी छोटी बहन सित्तो को पति के कंधे से सटकर देखकर ईर्ष्या से जल उठती है।

सावित्री उद्विग्नता और कड़वाहट से बरती जा रही थी। उसे अपनी बीमारी के कारण ऐसा लगता कि वह अब अपने पति के लिए बेकार वस्तु के समान है। "क्या इनका प्यार केवल मेरे शरीर का नहीं है ? पर और तो मुझमें कुछ है नहीं। तब तो जिस दिन ये जान जायेंगे कि मैं उस शरीर के अलावा कुछ नहीं, जो गल चुका है तो मैं कितनी छोटी लगूंगी इनके प्यार के आगे ।" इसी सोच के कारण सावित्री अपने पति व अपने ससुराल वालों के लिए अपशब्दों करती है। अपने आप को पति से श्रेष्ठ बनाये रखने के लिए पति पर ताने कसती है। 

सावित्री पूरी तरह पतिव्रता स्त्री भी नहीं है। अपनी बीमारी के समय वह 'राजाराम' नामक पुरूष पर आसक्त का इस्तेमाल हो जाती है । राजाराम सावित्री के पिता के दफ्तर के चपरासी का लड़का था। वह सावित्री की सेहत का ध्यान रखता और सावित्री को भी उसके साथ समय व्यतीत करना पसंद था। उनके आपसी संबंध को लेकर आस-पड़ोस व संबंधियों में बातें होती। माया मौसी सावित्री की माँ से शिकायत करती हुई कहती है कि "राजाराम से तो घुलमिलकर बातें होती हैं और अपना आदमी शाम को आता है तो मुँह लटकाकर बैठ जाती है।" वह राजाराम के आने का इंतजार करती तथा उसके आने पर प्रसन्नचित हो उठती है। एक मुहल्ले के लड़के सावित्री को 'राजाराम' के नाम से छोड़ते हैं तो वह आवेश में आकर उनसे झगड़ पड़ती है।

वह अपने आक्रोश में अपने माता-पिता, बहन, पति, सास, ननद के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल कर उनका अपमान करती है। वह अपनी बीमारी के कारण मानसिक तनाव से ग्रस्त थी।

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