Thursday, 25 August 2022

पोंगल पर निबंध | Essay on Pongal Festival in Hindi

Essay on Pongal Festival in Hindi: हम यहां पर पोंगल पर निबंध शेयर कर रहे है। इस निबंध में पोंगल त्यौहार की सभी जानकारी दे गयी है। यह निबंध सभी कक्षाओं के विद्यार्थियों के लिए मददगार है।

पोंगल पर निबंध (100 शब्द)

पोंगल दक्षिण भारत में मनाया जाने वाला एक लोकप्रिय त्योहार है। यह प्रति वर्ष 14-15 जनवरी को मनाया जाता है। लोहड़ी की तरह पोंगल (Pongal) भी किसानों द्वारा फसल के पक जाने की खुशी में मनाया किया जाता है। इस त्यौहार का नाम पोंगल इसलिए है क्योंकि इस दिन सूर्य देव को जो प्रसाद अर्पित किया जाता है वह पोंगल कहलता है। पोंगल पर्व की शुरुआत भोगी पोंगल से होती है, जो देवराज इंद्र को समर्पित हैं। दूसरे दिन सूर्यदेव की पूजा की जाती है और खीर बनाई जाती है। तीसरे दिन मट्टू पोंगल को पशुधन की पूजा की जाती है। माना जाता है कि मट्टू पोंगल भगवान शिव का बैल है। चार दिनों के इस त्यौहार के अंतिम दिन कानुम पोंगल मनाया जाता है जिसे तिरूवल्लूर के नाम से भी लोग पुकारते हैं। इस दिन घर को सजाया जाता है। आम के पलल्व और नारियल के पत्ते से दरवाजे पर तोरण बनाया जाता है।

पोंगल पर निबंध | Essay on Pongal Festival in Hindi

पोंगल पर निबंध (500 शब्द)

पोंगल तमिलनाडु राज्य का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। पोंगल का तमिल में अर्थ उफान या विप्लव होता है। यह चार दिनों तक चलता है। पोंगल पर्व को भी फसल के पक जाने और नई फसल के आने की खुशी में मनाया जाता है। पोंगल का त्योहार (Pongal Festival) दक्षिण भारत के लोग नए साल के रूप में भी मनाते हैं। मान्यता के अनुसार इस दिन लोग पुराने सामान को घरों से निकाल देते हैं और घरों को खास रूप से रंगोली आदि से सजाते हैं।

भोगी पोंगल

पोंगल पर्व की शुरुआत भोगी पोंगल से होती है, जो देवराज इंद्र को समर्पित हैं। इसे भोगी पोंगल इसलिए कहते हैं क्योंकि देवराज इंद्र भोग-विलास में लिप्त रहनेवाले देवता माने जाते हैं। साथ ही वर्षा एवं अच्छी फसल के लिए इंद्रदेव की पूजा की जाती है। भोगी पोंगल से ही तमिल नववर्ष की शुरुआत मानी जाती है। भोगी पोंगल की संध्या समय में लोग अपने-अपने घर से पुराने वस्त्र, गैर जरूरी चीजें आदि लाकर एक जगह इकट्ठा कर लेते हैं और उन्हें जलाते हैं। युवा वर्ग इस अग्नि के इर्द गिर्द रातभर भोगी कोट्टम बजाते हुए लोकगीत गाते हैं। ‘भोगी कोट्टम’ भैस के सिंग का बना एक प्रकार का वाद्ययंत्र होता है। भोगी पोंगल की पूजा में पशुओं, फसलों और खेतों की भी पूजा की जाती है। यहां लोग अपने घरों को फूल और आम के पत्तों से सजाते हैं और मुख्य द्वार पर रंगोली बनाते हैं।  भोगी पोंगल के दिन से ही एक-दूसरे के घर बधाइयां और मिठाइयां भिजवाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। रात के समय लोग सामूहिक भोग का आयोजन करते हैं।

सूर्य पोंगल

दूसरे दिन के पोंगल पर्व को सूर्य पोंगल के नाम से जाना जाता है। दूसरे दिन का पोंगल भगवान सूर्य को समर्पित होता है। दूसरे दिन पोंगल नामक एक विशेष खीर बनाई जाती है जो कि नए धान से तैयार चावल, मूंगदाल और गुड से बनती है। इस खीर को खासतौर पर मिट्टी के बर्तन में बनाया जाता है। पोंगल खीर तैयार होने के बाद सूर्य देव की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और उन्हें प्रसाद रूप में ये पोंगल और साथ ही गन्ना अर्पण किया जाता है और फसल देने के लिए धन्यवाद दिया जाता है। 

मट्टू पोंगल

पोंगल के तीसरे दिन को मट्टू अर्थात बैल की पूजा की जाती है। बैल को नंदी स्वरूप मानकर पूजा की जाती है। इसके अलावा पशुओं के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। क्योंकि पशु जीविकोपार्जन में सहायक होते हैं। एक कथा के अनुसार, मट्टू भगवान शंकर का बैल है जिसे एक गलती की वजह से भगवान शंकर ने धरती पर रहकर इंसानों के लिए अन्न पैदा करने के लिए कहा और तब से ही बैल धरती पर रहकर कृषि कार्य में इंसान की सहायता कर रहा है। पोंगल के तीसरे दिन सभी किसान अभी बैलों को नहलाते हैं। उनके सिंगों में तेल लगाते हैं और अपने बैलों को सजाते हैं. इसके बाद इनकी पूजा की जाती है. बैलों के अलावा मट्टू पोंगल के दिन बछड़ों और गाय की भी पूजा की जाती है. इसके अलावा केनू पोंगल भाई-बहनों के त्यौहार के रूप में भी सेलिब्रेट किया जाता है

कन्नुम पोंगल

पोंगल त्योहार के चौथे और आखिरी दिन कन्नुम पोंगल को जोश और उल्लास के साथ मनाया जाता है। कन्नुम पोंगल को 'तिरुवल्लुवर दिवस' भी कहा जाता है। तमिल भाषा के शब्द 'कन्नुम पोंगल' का शाब्दिक अर्थ है यात्रा करना। इसीलिए कन्नुम पोंगल के दिन लोग अपने करीबियों और रिश्तेदारों के घर जाते हैं और एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं। यही वजह है कि पोंगल के आखिरी दिन कन्नुम पोंगल की काफी महिमा है। 

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