गांधीवाद की प्रासंगिकता पर निबंध। Essay on Gandhism in Hindi

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गांधीवाद की प्रासंगिकता पर निबंध। Essay on Gandhism in Hindi

Essay on Gandhism in Hindi
महात्मा गांधी के विचार¸ दर्शन और संदेश वर्तमान के लिए बहुत सार्थक हैं। हमें कहना चाहिए कि वे ही तो एक धनात्मक तत्व हैं जो कि आधुनिक सभ्यता को सर्वनाश से बचा सकते हैं। स्थाई मान्यताएं जैसे स्व से पूर्व सेवा¸ संचय से पूर्व त्याग और दूसरों के लिए चिंता बहुत ही तेजी से समाप्त होती जा रही है और उनका स्थान स्वार्थपरता¸ लालच¸ अवसरवाद¸ धोखा¸ चालाकी और झूठ के द्वारा लिया जा रहा है। इन सब ने द्वन्दों और संघर्षों को जन्म दिया है और सहिष्णुता तथा मानव प्रेम के उच्च आदर्श कमजोर पड़ते जा रहे हैं। इस भयावह तस्वीर को पूर्ण करने के लिए शस्त्रीकरण के लिए अनंत होड़ लगी हुई है। युद्ध के विनाशकारी शस्त्र मानव जाति के अस्तित्व के लिए ही खतरा बने हुए हैं। बड़े पैमाने पर विनाश की गई और नई तकनीकियों का विकास किया जा रहा है। कानून की सभी प्रणालियों¸ करारों¸ संधियों एवं गठबंधनों को मानवीय मेलजोल और शांति स्थापित करने में सफलता नहीं मिली है।

इस प्रकार के वातावरण में गांधीवाद ही एक आशा की किरण प्रस्तुत करता है। गांधी जी के मूल्य एवं सिद्धांत¸ आदर्श और उपदेश मानवता को आंतरिक बाह्य अमर शांति की मंजिल तक पहुंचने के लिए दिशा प्रदान करते हैं। सत्य के साथ गांधी जी के प्रयोगों ने उनके इस विश्वास को पक्का कर दिया था कि सत्य की सदा विजय होती है और सही रास्ता सत्य का रास्ता ही है। आज मानवता की मुक्ति सत्य का रास्ता अपनाने से ही है। गांधी जी सत्य को ईश्वर का पर्याय मानते थे। उनका ईश्वर में पूरा विश्वास था जिसका वर्णन उन्होंने इस प्रकार किया कि ईश्वर एक अदृश्य शक्ति है जिसका अस्तित्व है ईश्वर में विश्वास और सत्य का अनुसरण मानवता को सर्वनाश से बचा सकते हैं।

ईश्वर और सत्य से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध गांधीजी का अहिंसा में विश्वास है। वास्तव में अहिंसा गांधी दर्शन का आधार स्तंभ है। अहिंसा का सत्य से बहुत गहरा संबंध है। हिंसा असत्य है क्योंकि यह जीवन की एकता की विनाशिनी है और हिंसा का रास्ता बड़े खतरों से भरा हुआ है। शांति दुनिया में तभी स्थापित की जा सकती है जब हम अहिंसा का अनुसरण करें। गांधीजी अहिंसक योद्धा थे। वे स्वयं दुख एवं बलिदान झेलकर विरोधी के विरुद्ध संघर्ष करते थे। उनका लक्ष्य विरोधी के हृदय परिवर्तन का होता था। उनके अहिंसक युद्ध में भय और कटुता के लिए कोई स्थान नहीं था बल्कि वह युद्धरत दलों में सद्भावना और मित्रता पैदा करता था। गांधीजी अंतरराष्ट्रीय संबंधों में ही नहीं अपितु व्यक्तिगत जीवन में भी अहिंसा का अनुसरण करने के पक्षधर थे। अहिंसा¸ अहिंसा तब ही है जबकि इसका पालन मन¸ वचन और कर्म से किया जाए जिसने इस सिद्धांत का थोड़ा बहुत भी पालन अपने निजी जीवन में कर लिया है उसे पता लगेगा कि वह कितनी शक्ति का हथियार है¸ बंदूक की बैरल से निकली गोली से अधिक शक्तिशाली। अहिंसा आध्यात्मिकता की पोशाक है बिल्कुल उसी प्रकार जैसे आध्यात्मिकता सच्चे धर्म की पोषक है। वर्तमान में भी व्यक्तिगत जीवन सार्वजनिक जीवन और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में इस शास्त्र की शक्ति से बड़ी बड़ी उपलब्धियां प्राप्त की जा सकती हैं।

गांधीजी का धर्म एवं नैतिकता में गहरा विश्वास था। धर्म से अर्थ¸ आडंबर एवं धार्मिक पाखंड आदि नहीं था। उनका धर्म नैतिकता का पर्यायवाची था। उन्होंने राजनीति में धर्म का प्रवेश किया एवं इस प्रकार राजनीति का आध्यात्मिक करण किया। गांधीजी उन लोगों से बिल्कुल सहमत नहीं थे जो यह कहते थे कि धर्म का राजनीति से कोई लेना देना नहीं है। धर्म विहीन राजनीति मृत्यु जाल है जो आत्मा का हनन करता है। वे उन लोगों की स्थिति की भर्त्सना करते थे। जो साध्य को साधन का औचित्य ठहराता है। यदि साधन अनैतिक है तो उसकी प्रवृत्ति सत्य को दूषित करने की है। साध्य और साधन में वही संबंध है जो कि बीज और पेड़ में है। जैसा साधन होगा वैसा ही साध्य होगा।

गांधी जी जीवन की सादगी का उपदेश देते थे। वे गौतम बुद्ध के साथ एक मत थे की इच्छाओं को बढ़ाने से दुख पैदा होता है। हमारा वास्तविक कल्याण इच्छाओं की छांव को कम करने में है। इच्छा की समाप्ति से दुख की समाप्ति होती है और इसलिए निर्वाण होता है। सच्ची संस्कृति और सभ्यता इच्छाओं को कम करने और सादा जीवन जीने में वास करती है। गांधी जी ने रोटी श्रम का विचार प्रतिपादित किया जो कि उनकी सादगी की धारणा पर आधारित है। इस विचार के अनुसार मनुष्य को अपनी रोटी शारीरिक श्रम के द्वारा कमानी चाहिए। यह सिद्धांत सर्वत्र प्रासंगिक है और सदैव के लिए सार्थक है। क्या ही अच्छा होता कि लोग इसका पालन करते तो बहुत सारे दुखों¸ अस्वस्थता¸ निराशा और जीवन के तनाव समाप्त हो जाते।

गांधीजी आर्थिक और राजनीतिक दोनों प्रकार के विकेंद्रीकरण के पक्षधर थे। अहिंसा में उनके विश्वास के कारण केंद्रीकरण में निहित हिंसा के विषय में उन्हें चेतना थी। गांधीजी आत्मनिर्भर और स्वायत्त पंचायतों की स्थापना के पक्षधर थे। गांव की समस्याओं का समाधान गांव वालों द्वारा ही होना चाहिए और इसके लिए संगठन वे स्वयं ही बनाएं। उनका विश्वास था कि सही वातावरण दिया जाए तो व्यक्ति में स्वयं पर शासन करने की सामर्थ्य है। आर्थिक क्षेत्र में भी गांधीजी केंद्रीकृत उद्योग के विरुद्ध थे। उन्होंने कुटीर उद्योग धंधों के सुधार एवं स्थापना पर काफी बल दिया। सामान्यतः गांधीजी भारी उद्योगों के खिलाफ थे अब जबकि भारी उद्योगों से निकलने वाली गैसों ने पर्यावरण की क्षति की समस्या को जन्म दिया है तब कुटीर उद्योग और लघु उद्योगों की ओर वापसी ही पर्यावरण प्रदूषण के हानिकारक प्रभाव से बचने के लिए मानवता के लिए एक आशा की किरण प्रदान करती है। इस संबंध में गांधी जी का दृष्टिकोण अब भी कितना सार्थक है।

गांधी जी की अद्वितीय देन है कि उन्होंने पूंजीवाद और समाजवाद का समन्वय किया। उनके ट्रस्टीशिप के सिद्धांत का यह लक्ष्य है। गांधीजी अमीरों से धन छीनकर गरीबों में बांटने में विश्वास नहीं रखते थे। वे अमीरों के फालतू धन को अमीर द्वारा ही समाज के भले के लिए ट्रस्ट में रखना चाहते थे। गांधी जी का यह विचार आजकल बहुत सार्थक है क्योंकि मार्क्स के प्रकार के समाजवाद की स्थापना या पूंजीवाद को नष्ट करना संभव नहीं है। ट्रस्टीशिप के सिद्धांत द्वारा गांधी जी ने समाजवाद और पूंजीवाद के बीच का एक रास्ता निकाला।

गांधी जी के राष्ट्रवाद और अंतरराष्ट्रीयवाद पर विचार आज बहुत प्रबल और सार्थक है। आज की दुनिया में अंतर्राष्ट्रवाद की कीमत पर हम राष्ट्रवाद नहीं बन सकते। नाजियों और फासीवादियों का राष्ट्रवाद आज असंगत ही नहीं भयानक परिणामों से भरा है। आज उदार राष्ट्रवाद को अपनाने की आवश्यकता है। हमें राष्ट्रवादी इसलिए होना चाहिए कि जिससे कि अंतर्राष्ट्रवादी बन सके। गांधी जी भारत को स्वतंत्र इसलिए चाहते थे क्योंकि वह समस्त मानव जाति के कल्याण के लिए संसाधनों का विकास कर सकें। गांधी जी का विश्वास था कि मानवता की मुक्ति का रास्ता अध्यात्म से होकर गुजरता है और भौतिकवाद एक हानिकारक कारक है जो ना केवल अनेक तनावों को जन्म देता है अपितु आत्मा का हनन भी करता है। धन संग्रह की ओर पागलों की तरह भाग दौड़ और जीवन के प्रति उपभोक्तावादी दृष्टिकोण ने हमारे जीवन की शांति पर कुठाराघात किया है। भौतिकवाद और आध्यात्मवाद इन दोनों के मध्य सुखद एवं विवेकपूर्ण संतुलन निकलना ही एकमात्र हल है। आधुनिक युग में ही हमारी बहुत सी बुराइयों के लिए प्रभावी समाधान है।

गांधी जी के शिक्षा संबंधी विचार भी आज बहुत प्रासंगिक हैं। यह सही है कि कई विचारों का संपूर्ण रूप से क्रियान्वयन नहीं किया जा सकता किंतु शिक्षा के संबंध में बनने वाली नीतियों और कार्यक्रमों में उन विचारों की आत्मा को लागू किया जा सकता है। ‘अध्ययनशील रहते हुए जीविका कमाओ’ जो कि उनकी बुनियादी शिक्षा का केंद्रीय सिद्धांत है¸ आज भी हमारी शिक्षा को एक नई दिशा प्रदान कर सकता है। शिक्षा के पाठ्यक्रम में व्यावसायिक कोर्स का लागू किया जाना गांधी जी के शिक्षा संबंधी विचारों का ही विस्तृण है और शिक्षा की योजना बहुत ही सार्थक और लाभकारी सिद्ध हुई है। इस प्रकार हम देखते हैं कि गांधीवाद आज बहुत सार्थक है। हमें यह तथ्य स्वीकार करना है कि गांधीवाद का प्रचार एवं अभ्यास कि हमारी सभ्यता को बुराइयों एवं ऋणात्मक प्रवृतियों से मुक्त कर सकता है जो कि मानव जाति को इस्पात की एड़ियों से कुचलने की संभावना रखते हैं।

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