Thursday, 12 May 2022

नदी की आत्मकथा हिंदी निबंध - Nadi ki Atmakatha Essay in Hindi

नदी की आत्मकथा हिंदी निबंध - Nadi ki Atmakatha Essay in Hindi

नदी की आत्मकथा हिंदी निबंध

    नदी की आत्मकथा हिंदी निबंध 50 words

    नदी भूतल पर प्रवाहित एक जलधारा है, जिसका स्रोत प्रायः कोई झील, हिमनद, झरना होता है तथा जो किसी सागर अथवा झील में गिरती है। मैं भी एक नदी हूँ और मेरा जन्म पर्वतमालाओं की गोद से हुआ है। मैं प्राणियों की प्यास बुझती हूँ और उन्हें जीवन रूपी वरदान देती हूँ। मैं बचपन से ही बहुत चंचल थी। मैं अपने इस जीवन से बहुत खुश हूँ क्योंकि मैं हर एक प्राणी के काम आती हूँ , लोग मेरी पूजा करते हैं , मुझे माँ कहते हैं , मेरा सम्मान करते हैं।

    नदी की आत्मकथा हिंदी निबंध 100 words

    मैं नदी हूँ। मेरा जन्मस्थान हिमालय है। आज मैं आपको अपने जन्म की रोचक कथा सुनाऊँगी। जब पहाड़ों पर जमीं बर्फ पिघलती है तो विशाल जल धाराओं का निर्माण होता है जिससे एक नदी का जन्म होता है। मेरा जन्म भी ऐसी ही धारा से हुआ और आगे की यात्रा करते हुए मैं विशाल और विशाल होती गई। मुझे लोग गंगा के नाम से जानते हैं। मेरे बहुत से नाम जैसे भागीरथी, सुरसरिता, देवनदी आदि। लेकिन गंगा मेरा पवित्र नाम है। मेरा जन्म स्थान गोमुख कहलाता है।

    मैं 13,800 फीट की ऊंचाई पर गंगोत्री ग्लेशियर के पास, हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं में उत्पन्न हुई। भारत और बांग्लादेश के माध्यम से पार करने के बाद, मैं बंगाल की खाड़ी में गिरती हूं। मेरी मुख्य सहायक नदियाँ यमुना, गोमती, घाघरा, कोसी, और उत्तर में गंडक हैं। मेरी दक्षिणी सहायक नदियाँ चंबल, बेतवा और कोसी हैं। 

    नदी की आत्मकथा हिंदी निबंध 200 words

    मैं नदी बोल रही हूँ। मेरे जन्म की कहानी बड़ी ही विचित्र है। जब पहाड़ों से निकली कई छोटी-छोटी धाराएं आपस में मिलती हैं तो मेरा यानि नदी का जन्म होता है। मै कभी थकती नहीं, लगातार बहना ही मेरा धर्म है। शायद इसीलिए कवियों ने मुझे चंचल कहा है। 

    एक नदी का जीवनकाल हजारों या लाखों वर्ष का होता है। इसलिए मैंने अपने सामने न जाने कितनी सभ्यताओं को बनते और बिगड़ते देखा है। कितने ही युद्धों की मैं गवाह बनीं। कितने ही ऋषियों ने मेरे किनारे तपस्या की। इसलिए मेरी कहानी बहुत रोचक है। 

    प्रकृति में बहुत सी चीजें जैसे चट्टानें, पहाड़, पेड़, झाड़ियाँ, लताएँ मुझे रोकने की कोशिश करती हैं। फिर भी मैं अनवरत बहती रहती हूं। जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ती हूं, मुझमे परिवर्तन आते हैं। कहीं मैं पतली और संकरी हो जाती हूँ तो कहीं चौड़ी। इस धरती पर प्रत्येक जीव जीवन मुझ पर ही निर्भर है। मैं मीलों दूर जाकर गाँवों और नगरों में अपना शुद्ध जल देती हूँ। सभी पशु-पक्षी मेरा पानी पीकर अपनी प्यास बुझाते हैं।

    मैं जहां-जहाँ से गुजरती हूँ, वहां की मिटटी उपजाऊ बना देती हूँ। जब बारिश आती है तो कभी-कभी मै बाढ़ भी लाती हूँ। अपने सफर के अंत में मैं समुद्र में मिल जाती हूँ। 

    नदी की आत्मकथा हिंदी निबंध 300 words

    मैं यानि नदी पहाड़ों में पैदा हुए जल का एक स्रोत हूं। मेरी उत्पत्ति पहाड़ों में बर्फ पिघलने से हुई है। प्रकृति ने मुझे प्राणियों के उद्धार के लिए बनाया है। मेरा कार्य सभी जीवों की प्यास बुझाना है। मैं बंजर भूमि को उपजाऊ बनाती हूँ। नदियों से केवल फसल ही नहीं उपजाई जाती है बल्कि वे सभ्यता को जन्म देती हैं अपितु उसका लालन-पालन भी करती हैं। इसलिए मनुष्य हमेशा नदी को देवी के रूप में देखता आया है।

    पहाड़ों से बाहर निकलते समय, मेरा रूप बहुत छोटा होता है, लेकिन जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ती हूं, मैं बड़ी होती जाती हूं और आखिरकार समुद्र में चली जाती हूं। लेकिन समुद्र में शामिल होने से पहले, मैं अपनी आसपास की जमीन को हरा-भरा कर देती हूं। इतना ही नहीं, इसके अलावा भी कई जीव मुझमें पनपते हैं और मुझमें रहते हैं और अपने जीवन का संचालन करते हैं।

    समुद्र में मिलने से पहले और पहाड़ों से निकलने के बाद मुझे काफी मशक्कत करनी पड़ती है। मेरे सामने कई बाधाएँ आती हैं, लेकिन मैं उन बाधाओं का साहसपूर्वक सामना करके अपना काम पूरा करती हूँ। मेरे अवरोधक पदार्थ छोटे और बड़े कंकड़, पत्थर और चट्टान हैं, लेकिन मैं आसानी से उन्हें पार कर लेती हूं और अपना रास्ता खोज लेती हूं।

    यदि मेरे उपयोग की गणना की जाती है, तो वह बहुत अधिक है। मेरे नीर का उपयोग बिजली पैदा करने और खेतों की सिंचाई जैसे कृषि कार्य करने के लिए किया जाता है। बिजली इंसानों के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण चीज है, जिसकी वजह से इंसान इतनी तरक्की कर पाया है। बिजली के कारण आधे से अधिक मानव के कार्य चल रहे हैं। अगर बिजली नहीं होगी तो मानव बहुत ज्यादा पिछड़ जाएगा।

    मेरे नीर का उपयोग खेतों की सिंचाई के लिए भी किया जाता है जिसके कारण फसलें उगती हैं और चारों तरफ हरियाली होती है। ये फसलें बाद में अनाज देती हैं, जिससे इस सृष्टि के लिए भोजन की व्यवस्था होती हैं।

    मेरे इतने उपयोगी होने के बावजूद, मानव अभी भी मुझे दूषित करने की कोशिश कर रहा है। कारखानों का दूषित पानी, कचरा और प्लास्टिक मुझमें मनुष्यों द्वारा फेंका जाता है, जो मेरे पानी को दूषित कर रहा है। इसलिए, मैं इंसानों से अनुरोध करना चाहती हूं कि वे मेरे साफ पानी को दूषित न करें और मुझे साफ रखने में अपनी भूमिका निभाएं।

    नदी की आत्मकथा हिंदी निबंध 400 words

    मै नदी हूँ। मेरे कितने ही नाम है जैसे नदी , नहर , सरिता , प्रवाहिनी , तटिनी, क्षिप्रा आदि। ये सभी नाम मेरी गति के आधार पर रखे गए है। सर- सर कर चलती रहने के कारण मुझे सरिता कहा जाता है। सतत प्रवाहमयी होने के कारण मुझे प्रवाहिनी कहा गया है। इसी प्रकार दो तटो के बीच में बहने के कारण तटिनी तथा तेज गति से बहने के कारण क्षिप्रा कहलाती हूँ। साधारण रूप में मै नहर या नदी हूँ। मेरा नित्यप्रति का काम है की मै जहाँ भी जाती हूँ वहाँ की धरती , पशु- पक्षी , मनुष्यों व खेत – खलिहानों आदि की प्यार की प्यास बुझा कर उनका ताप हरती हूँ तथा उन्हें हरा- भरा करती रहती हूँ। इसी मेरे जीवन की सार्थकता तथा सफलता है।

    आज मै जिस रूप में मैदानी भाग में दिखाई देती हूँ वैसी में सदैव से नही हूँ। प्रारम्भ में तो मै बर्फानी पर्वत शिला की कोख में चुपचाप, अनजान और निर्जीव सी पड़ी रहती थी। कुछ समय पश्चात मै एक शिलाखण्ड के अन्तराल से उत्पन्न होकर मधुर संगीत की स्वर लहरी पर थिरकती हुई आगे बढती गई। जब मै तेजी से आगे बढने पर आई तो रास्ते में मुझे इधर – उधर बिखरे पत्थरों ने, वनस्पतियों, पड़े – पौधों ने रोकना चाहा तो भी मै न रुकी। कई कोशिश करते परन्तु मै अपनी पूरी शक्ति की संचित करके उन्हें पार कर आगे बढ़ जाती।

    इस प्रकार पहाडो , जंगलो को पार करती हुई मैदानी इलाके में आ पहुँची। जहाँ – जहाँ से मै गुजरती मेरे आस-पास तट बना दिए गए, क्योकि मेरा विस्तार होता जा रहा था। मैदानी इलाके में मेरे तटो के आस-पास छोटी – बड़ी बस्तियाँ स्थापित होती गई | वही अनेको गाँव बसते गए। मेरे पानी की सहायता से खेती बाड़ी की जाने लगी। लोगो ने अपनी सुविधा की लिए मुझे पर छोटे – बड़े पुल बना लिए। वर्षा के दिनों में तो मेरा रूप बड़ा विकराल हो जाता है।

    इतनी सब बाधाओ को पार करते हुए चलते रहने से अब मै थक गई हूँ तथा अपने प्रियतम सागर से मिलकर उसमे समाने जा रही हूँ। मैंने अपने इस जीवन काल में अनेक घटनाएँ घटते हुए देखी है। सैनिको की टोलियाँ, सेनापतियो, राजा – महाराजाओ, राजनेताओं, डाकुओ, साधू-महात्माओं को इन पुलों से गुजरते हुए देखा है | पुरानी बस्तियाँ ढहती हुई तथा नई बस्तियाँ बनती हुई देखी है। यही है मेरी आत्मकथा।

    मैंने सभी कुछ धीरज से सुना और सहा है। मै आप सभी से यह कहना चाहती हूँ की आप भी हर कदम पर आने वाली विघ्न-बाधाओ को पार करते हुए मेरी तरह आगे बढ़ते जाओ जब तक अपना लक्ष्य न पा लो।

    नदी की आत्मकथा हिंदी निबंध 500 words

    भूमिका : नदी प्रकृति के जीवन का एक महत्व पूर्ण अंग है। इसकी गति के आधार पर इसके बहुत नाम जैसे – नहर, सरिता , प्रवाहिनी , तटिनी , क्षिप्रा आदि होते हैं। जब मैं सरक-सरक कर चलती थी तब सब मुझे सरिता कहते थे। जब मैं सतत प्रवाहमयी हो गई तो मुझे प्रवाहिनी कहने लगे।

    जब मैं दो तटों के बीच बह रही थी तो तटिनी कहने लगे और जब मैं तेज गति से बहने लगी तो लोग मुझे क्षिप्रा कहने लगे। साधारण रूप से तो मैं नदी या नहर ही हूँ। लोग चाहे मुझे किसी भी नाम से बुलाएँ लेकिन मेरा हमेशा एक ही काम होता है दुसरो के काम आना। मैं प्राणियों की प्यास बुझती हूँ और उन्हें जीवन रूपी वरदान देती हूँ।

    नदी का जन्म : मैं एक नदी हूँ और मेरा जन्म पर्वतमालाओं की गोद से हुआ है। मैं बचपन से ही बहुत चंचल थी। मैंने केवल आगे बढना सिखा है रुकना नहीं। मैं एक स्थान पर बैठने की तो दूर की बात है मुझे एक पल रुकना भी नहीं आता है। मेरा काम धीरे-धीरे या फिर तेज चलना है लेकिन मै निरंतर चलती ही रहती हूँ।

    मैं केवल कर्म में विश्वास रखती हूँ लेकिन फल की इच्छा कभी नहीं करती हूँ। मैं अपने इस जीवन से बहुत खुश हूँ क्योंकि मैं हर एक प्राणी के काम आती हूँ , लोग मेरी पूजा करते हैं , मुझे माँ कहते हैं , मेरा सम्मान करते हैं। मेरे बहुत से नाम एखे गये हैं जैसे :- गंगा , जमुना , सरस्वती , यमुना , ब्रह्मपुत्र , त्रिवेणी। ये सारी नदियाँ हिन्दू धर्म में पूजी जाती हैं।

    नदी का घर त्यागना : मेरे लिए पर्वतमालाएं ही मेरा घर थी लेकिन मैं वहाँ पर सदा के लिए नहीं रह सकती हूँ। जिस तरह से एक लडकी हमेशा के लिए अपने माता-पिता के घर पर नहीं रह सकती उसे एक-न-एक दिन माता-पिता का घर छोड़ना पड़ता है उसी तरह से मैं इस सच्चाई को जानती थी और इसी वह से मैंने अपने माँ-बाप का घर छोड़ दिया।

    मैंने माता-पिता का घर छोड़ने के बाद आगे बढने का फैसला किया। जब मैंने अपने पिता का घर छोड़ा तो सभी ने मेरा पूरा साथ दिया मैं पत्थरों को तोडती और धकेलती हुई आगे बढती ही चली गई। मुझसे आकर्षित होकर पेड़ पत्ते भी मेरे सौन्दर्य का बखान करते रहते थे और मेरी तरफ आकर्षित होते थे।

    जो लोग प्र्वर्तीय देश के होते हैं उनकी सरलता और निश्चलता ने मुझे बहुत प्रभावित किया है। मैं भी उन्हं की तरह सरल और निश्चल बनी रहना चाहती हूँ। मेरे रास्ते में बड़े-बड़े पत्थरों और चट्टानों ने मुझे रोकने की पूरी कोशिश की लेकिन वो अपने इरादे में सफल नहीं हो पाए।

    मुझे रोकना उनके लिए बिलकुल असंभव हो गया और मैं उन्हें चीरती हुई आगे बढती चली गई। जब भी मैं तेजी से आगे बढने की कोशिश करती थी तो मेरे रास्ते में वनस्पति और पेड़-पौधे भी आते थे ताकि वो मुझे रोक सकें लेकिन मैं अपनी पूरी शक्ति को संचारित कर लेती थी जिससे मैं उन्हें पार करके आगे बढ़ सकूं।

    नदी का मैदानी भाग में प्रवेश : शुरू में मैं बर्फानी शिलाओं की गोद में बेजान , निर्जीव और चुपचाप पड़ी रहती थी। मुझे मैदानी इलाके तक पहुंचने के लिए पहाड़ और जंगल पर करने पड़े थे। जब मैं पहाड़ों को छोडकर मैदानी भाग में आई तो मुझे अपने बचपन की याद आने लगी।

    मैं बचपन में पहाड़ी प्रदेशों में घुटनों के बल सरक-सरक कर आगे बढती थी और अब मैदानी भाग में आकर सरपट से भाग रही हूँ। मैंने बहुत से नगरों को ख़ुशी और हरियाली दी है। जहाँ-जहाँ से होकर मैं गुजरती गई वहाँ पर तट बना दिए गये। तटों के आस-पास जो मैदानी इलाके थे वहाँ पर छोटी-छोटी बस्तियां स्थापित होती चली गयीं।

    नदी की आत्मकथा हिंदी निबंध 1000 words

    मै एक नदी हूँ। मेरे अनेक नाम हैं जैसे सरिता, प्रवाहिनी, तटिनी, वाहिनी, तरंगिणी, निर्झरिणी, शैलजा आदि। मेरा स्वाभाव अति चंचल है परन्तु कभी-कभी मद्धम भी हो जाती हूं।  कल-कल करके बहती ही रहती हूं, निरंतर – बिना रुके, बिना अटके, बस चलती ही रहती हूं। मेरा जन्म पर्वतों में हुआ और वहां से झरनों के रूप में मैं आगे बढ़ती हूं और फिर बहते बहते बस सागर में जा मिलती हूं।

    मेरा बहाव कभी तेज, तो कभी कभी धीमा होता है। मैं स्थान अनुसार कभी संक्री, तो कभी चौड़ी हो जाती हूं। मेरे रास्ते में बहुत अड़चनें, बहुत रुकावट आती है; कभी पत्थर, कभी कंकर, कभी चट्टान – पर मैं कभी ठहरती नहीं हूं अपना रास्ता बनाते चलती रहती हूं, झर झर बहती रहती हूं।

    मनुष्य मुझसे अनेकों प्रकार से जुड़ा हुआ है,  या यूं कहूँ के मैं मनुष्य के लिए अति उपयोगी हूँ। मनुष्य के लिए मेरे क्या क्या उपयोग हैं ? चूंकि मेरे भीतर जीव जंतु पाए जाते हैं इसलिए मैं मनुष्य के लिए भोजन का स्त्रोत हूं, मैं ना जाने कितने ही लोगों का पेट भरती हूं। मेरे ही कारण सभी के घरों में पीने के पानी की सुविधा उपलब्ध हो पाती है अथवा उस पानी से मनुष्य अपने अनगिनत कार्यों को निपटाता है।

    मैं पर्यावरण में पारितंत्र का संतुलन भी बनाए रखती हूं। मेरे ही पानी द्वारा मनुष्य अपने उपयोग के लिए बिजली उत्पन्न करता है और उस बिजली से मशीनरी के ढेरों काम होते हैं। मेरे नीर से ही खेतों की सिंचाई भी होती है, जिसके कारण फसलों में जान आती है एवं अनाज लहलहाने लगता है, बागों में लगे पेड़ फलों से लद जाते हैं।

    मैं किसी एक क्षेत्र, एक राज्य या किसी एक देश से बंधी हुई नहीं हूं। मुझे कोई सरहद रोक नहीं सकती है। मैं बस पाई जाती हूं, मैं बस हूं, मौजूद हूं – हर जगह, हर क्षेत्र, राज्य, देश में – अलग-अलग रूपों में, भिन्न-भिन्न प्रकार से, विभिन्न नामों के साथ।

    मेरे अस्तित्व को अगर देखा जाए, तो मेरे भीतर भी भावनाएं है, एहसास है; पर मैं कभी कह नहीं पाती, चुप हूं क्योंकि शायद प्रकृति, जो कि मेरी माँ है, का यही नियम है। प्रकृति बहुत कुछ, बहुत से भी ज्यादा कुछ देती है, परंतु मूक रहती है, उन चीजों का कभी हिसाब नहीं लेती। परंतु मुझे इस संदर्भ में तकलीफ महसूस होती है, मेरे भी एहसास है, मुझे भी दुख-सुख महसूस होता है।

    मनुष्य मुझे मुख्यतः प्रलोभी जान पड़ता है, बस अपना स्वार्थ पूरा करने हेतु किसी भी हद तक जा सकता है। मेरे इस मत का क्या कारण है, मैं आपको एक उदाहरण देकर बताती हूँ। मनुष्य द्वारा मुझे देवी के रूप में पूजा जाता है, मेरी पूजा अर्चना की जाती है, लोग मन्नत मांगते हैं, इच्छा पूरी करने के लिए व्रत रखते हैं, फूल चढ़ाते हैं; फिर वहीं दूसरी ओर मुझ में गंदगी डालते हैं, मुझे प्रदूषित करते हैं। अब बताइए भला देवी को कोई मैला करता है क्या ! बस यहीं पर मनुष्य के दोहरे मानक सामने आ जाते हैं, अगर मुझे सच्चे मन से देवी मानते, तो मुझ में कभी भी कूड़ा ना डालते।

    आज परिस्थितियां यह है कि नदियों का पानी अत्यंत दूषित हो चुका है। फैक्टरियों से निकला हुआ जहरीला पदार्थ, कचरा, मलबा, घरों के कूड़े से निकला हुआ प्लास्टिक, गंदगी, त्योहारों का जमा हुआ कचरा और ना जाने कितनी ही चीजें नदियों के पानी में मिलकर प्रदूषण फैला रही है।

    इन सब बिंदुओं के विपरीत कुछ अच्छे पल, कुछ अच्छे लम्हे भी हैं मेरी झोली में। एक सुनसान खूबसूरत जंगल में बहते हुए, जब मैंने एक थके हुए राहगीर की प्यास बुझाई थी, तब बहुत अच्छा महसूस हुआ था। बाग में खेलते हुए छोटे बच्चे ने जब मिट्टी में सने अपने छोटे-छोटे हाथ मुझमे धोए थे, छप-छप करके मेरे पानी के साथ खेल किया था, तब अत्यंत आनंद आया था।  

    त्योहारों के वक्त में, जब मेरे आसपास भीड़ उमड़ती है, मेले लगते हैं, खूब रौनक होती है, सभी चेहरों पर मुस्कान होती है, तब बहुत अच्छा लगता है। त्योहारों में अलग ही खुशी होती है, सभी लोग: बच्चे, बूढ़े, जवान, महिलाएं, छोटी बच्चियां, लड़के – एक ही जगह एकत्रित होते हैं, भिन्न भिन्न प्रकार के व्यंजन बनते हैं, हर्ष उल्लास का पर्व सा होता है, यह सभी बहुत खुशनुमा लगता है।


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