जाति व्यवस्था से आप क्या समझते हैं ? जाति प्रथा की प्रमुख विशेषताओं को बताइए।

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जाति व्यवस्था से आप क्या समझते हैं ? जाति प्रथा की प्रमुख विशेषताओं को बताइए।

  1. जाति व्यवस्था से आप क्या समझते हैं ?
  2. अथवा जाति की अवधारणा को समझाइए।
  3. जाति प्रथा की प्रमुख विशेषताओं को बताइए।

जाति व्यवस्था का अर्थ एवं परिभाषा 

जाति का अध्ययन अनेक भारतीय तथा विदेशी विद्वानों ने किया है। इसकी जटिलता व विस्तार को दृष्टि में रखकर उसके समुचित अध्ययन के लिए हट्टन के अनुसार विशेषज्ञों की एक सेना चाहिए। जाति का अर्थ निम्न दृष्टियों से स्पष्ट किया जा सकता है - 

1. शाब्दिक दृष्टि से - Caste शब्द स्पैनिश भाषा के Casta से निर्मित है जिसका अर्थ होता है प्रजाति अथवा नस्त। इस अर्थ में जाति शब्द का प्रयोग नहीं होता। इससे तो संस्कृत भाषा का जाति शब्द ही इस अवधारणा को अधिक स्पष्ट करता है, क्योंकि जाति में जन्म पर बल है और हम जानते हैं कि जाति का निर्धारण भी जन्म से होता है।

2. पारिभाषिक दृष्टि से - पारिभाषिक दृष्टि से जाति की अनेक व्याख्यायें मिलती हैं। इनमें से कुछ जाति को वर्ग के सन्दर्भ में स्पष्ट करती हैं और दूसरी जाति को प्रमुख विशेषताओं के द्वारा।

कूले का कहना है -"जब कोई बहुत कुछ अनुवांशिक हो जाता है तो हम उसे जाति कहते हैं।

जाति की अवधारणा

अंग्रेजी का 'Caste' शब्द पुर्तगाली शब्द Casta से बना है जिसका अर्थ प्रजाति, जन्म या भेद होता है। इस अर्थ में जाति-प्रथा प्रजातीय या जन्मजात भेद के आधार पर एक व्यवस्था है परन्तु भारतीय जाति-प्रथा इस आधार पर नहीं समझी जा सकती।

अंग्रेजी का 'Caste' शब्द पुर्तगाली (Portuguese) शब्द 'Casta' से बना है जिसका अर्थ प्रजाति होता है। 'Caste' शब्द का लैटिन (Latin) शब्द 'Castus' से भी घनिष्ठ सम्बन्ध है और इसका अर्थ 'विशुद्ध' या 'अमिश्रित' या जाति है। इस प्रकार जाति का अर्थ वंशानुसंक्रमण (Heredity) पर आधारित एक विशेष सामाजिक समूह से लगाया जाता है, और भी स्पष्ट शब्दों में जाति-प्रथा जन्मगत भेद के आधार पर एक व्यवस्था का नाम है। कहने का तात्पर्य यह है कि जाति-प्रथा के अन्तर्गत ऊँच-नीन का जो संस्तरण होता है, उसका व्यवसाय, धन, शिक्षा या धर्म न होकर केवल जन्म होता है। 

जाति प्रथा की संरचनात्मक एवं सांस्कृतिक विशेषताएं

एन. के. दत्ता ने अपनी पुस्तक "ओरिजिन एण्ड ग्रोथ ऑफ कॉस्ट इन इण्डिया" में जाति प्रथा की संरचनात्मक एवं सांस्कृतिक विशेषताओं का वर्णन किया है जो इस प्रकार है .

1. कोई भी व्यक्ति अपनी जाति के बाहर विवाह नहीं कर सकते।

2. प्रत्येक जातियों में अन्य जातियों के साथ खान-पान के सम्बन्ध में सभी के अपने-अपने कुछ प्रतिबन्ध होते हैं।

3. प्रत्येक जाति के अधिकांशतः व्यवसाय निश्चित होते हैं।

4. जातियों में ऊंच-नीच का एक स्तरीकरण होता है, जिसमें ब्राह्मणों की स्थिति सबसे ऊंची होती है। 

5. सम्पूर्ण जाति व्यवस्था ब्राह्मणों की प्रतिष्ठा पर निर्भर है।

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