Wednesday, 2 March 2022

सामाजिक आंदोलन की परिभाषा, प्रकृति तथा प्रकार बताइये

सामाजिक आंदोलन की परिभाषा, प्रकृति तथा प्रकार बताइये 

    सामाजिक आंदोलन की परिभाषा

    सामाजिक आंदोलनों का आधुनिक लोकतांत्रिक राज्यों में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। सामाजिक आंदोलन एक प्रकार से वह प्रक्रिया है जिसमें बहुत सारे लोग कोई सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए या किसी सामाजिक प्रथा या प्रवृत्ति को रोकने के लिए एकजुट और सक्रिय हो जाते हैं या वे किसी सामाजिक लक्ष्य की सिद्धि के लिए एक ही दिशा में चल पड़ते हैं।

    इस प्रकार स्पष्ट है कि सामाजिक आंदोलन सकारात्मक परिवर्तनों के बहुत बड़े वाहक हैं। सामाजिक आंदोलनों को भलीभाँति समझने हेतु इनकी प्रकृति व प्रकारों का विश्लेषण अत्यन्त महत्वपूर्ण है। जोकि निम्नांकित शीर्षकों के अन्तर्गत उल्लिखित है

    सामाजिक आंदोलन की प्रकृति

    सामाजिक आंदोलन की प्रकृति व सुनिश्चित विश्लेषण तो नहीं किया जा सकता परन्तु काफी हद तक सटीक विश्लेषण अवश्य ही किया जा सकता है सामाजिक आंदोलन की प्रकृति के निम्नलिखित प्रमुख रूप परिलक्षित होते हैं -

    (1) सामाजिक हितों की व्यापकता -सामाजिक आंदोलन समाज के विस्तृत हित को ध्यान में रखकर किसी विशेष दिशा में सामाजिक परिवर्तन लाने के ध्येय से चलाए जाते हैं। इस प्रकार सामाजिक आंदोलनों में प्रकृति से सामाजिक हितों की व्यापकता का दिग्दर्शन होता है।

    (2) औपचारिक सदस्यता की अनिवार्यता का न होना - सामाजिक आंदोलनों की एक अन्य महत्वपूर्ण प्रकृति यह है कि इनमें सहभागिता हेतु इनकी औपचारिक सदस्यता ग्रहण करने की कोई अनिवार्यता नहीं होती। कोई भी व्यक्ति अथवा नागरिक जो किसी विशेष दिशा में सामाजिक परिवर्तन लाने को तत्पर हो वह स्वेच्छा से सामाजिक आंदोलन में सम्मिलित हो सकता है। इस प्रकार इसमें अनिवार्य व औपचारिक सदस्यता जैसे प्रावधान आम तौर पर नहीं पाये जाते हैं।

    (3) व्यवस्थित संगठन की अनिवार्यता का न होना - सामाजिक आंदोलन की प्रकृति का एक महत्वपूर्ण पहल यह है कि इनमें किसी सस्पष्ट व व्यवस्थित संगठन की आवश्यकता नहीं होती है। सामाजिक आंदोलनों हेतु अत्यन्त सरल, सामान्य व अनौपचारिक संगठन से भी काम चल जाता है। उदाहरण के लिये - यदि जुलूस में कोई व्यक्ति आगे बढ़कर नारे लगाने लगता है, और बाकी लोग समवेत स्वर से उसे पूरा करने लगते हैं। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि नारे लगाने वाले व्यक्ति और उसका साथ देने वाले लोग अनिवार्यतः किसी औपचारिक संगठन के सदस्य नहीं होते।

    (4) सत्ताधारियों के प्रति विरोधी दृष्टिकोण - सामाजिक आंदोलनों की प्रकृति का विश्लेषण करते हुए यह भी उल्लेखनीय तथ्य दृष्टिगोचर होता है कि सत्ताधारी दल अथवा नेताओं के प्रति अधिकांशतयः इनका दृष्टिकोण विरोधी प्रवृत्ति का ही होता है। सामाजिक आंदोलनों के अन्तर्गत या तो सत्ताधारितयों से सीधे शिकायत होती है, या फिर सामाजिक आंदोलनकारी यह तर्क देते हैं कि सत्ताधारियों की उदासीनता अथवा मिलीभगत के कारण ही समाज में वह बुराई पनप रही है जिस पर वे प्रहार करना चाहते हैं।

    (5) कार्यक्षेत्र की व्यापकता - सामाजिक आंदोलनों के कार्यक्षेत्र की कोई सुनिश्चित सीमा नहीं होती है। यह किसी स्थान पर प्रारम्भ होकर किसी भी क्षेत्र तक फैल सकते हैं। उदाहरणार्थ - समकालीन विश्व में अनेक सामाजिक आंदोलनों का कार्यक्षेत्र आज विश्वस्तरीय है, जैसे - नारीवाद आंदोलन, पर्यावरणवादी आंदोलन, शान्ति आंदोलन इत्यादि, इसी प्रकार के विश्व व्यापी आंदोलन हैं।

    सामाजिक आंदोलन के विविध रूप अथवा प्रकार

    सामाजिक आंदोलनों के विविध रूपों एवं प्रकारों को मुख्य रूप से दो आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है - (1) परिवर्तन के लक्ष्य के आधार पर तथा (2) परिवर्तन की प्रकति के आधार पर, इनका विस्तत उल्लेख निम्नलिखित हैं

    (1) परिवर्तन के लक्ष्य के आधार पर

    प्रमुख सामाजिक विचारक एवं लेखक रैल्फ टर्नर और ल्यूइस किलियन ओ अपनी कृति 'कलैक्टिव बिहेवियर' (1957 ई.) के अन्तर्गत मोटे तौर पर सामाजिक आंदोलनों को उनके लक्ष्य के आधार पर वर्गीकृत किया है। इस वर्गीकृत में उन्होंने सामाजिक आंदोलनों के निम्नलिखित तीन प्रकार बताये हैं -

    1. मूल्य केन्द्रित आंदोलन - ऐसे आंदोलन जिनके सदस्य किसी सिद्धान्त अथवा मूल्य के साथ प्रतिबद्ध होते हैं और अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उस सिद्धान्त एवं मूल्य को छोड़ने को कतई तत्पर नहीं होते हैं, 'मूल्य केन्द्रित आंदोलन' कहलाते हैं। उदाहरण के तौर पर भारत में गाँधी जी द्वारा चलाए गये आंदोलन 'अहिंसा' पर केन्द्रित थे और उन्होंने अन्त तक इससे समझौता नहीं किया।
    2. शक्ति केन्द्रित आंदोलन - यह ऐसे आंदोलन होते हैं, जिनका प्रधान लक्ष्य अपने सदस्यों के लिए शक्ति, रुतबा एवं मान्यता हासिल करना होता हैं। इन आंदोलनों के साथ यह विश्वास भी जुड़ा है कि केवल आर्थिक या राजनीतिक शक्ति के बल पर नही समाज की बुराइयों को दूर किया जा सकता है उदाहरण - जर्मनी का नाजी आंदोलन (1930 ई.)।
    3. सहभागिता- केन्द्रित आंदोलन- इस प्रकार के आंदोलनों में आंदोलन के सदस्य अपनी भागीदारी से ही व्यक्तिगत सन्तोष प्राप्त करते हैं। इन्हें इस बात की कोई फिक्र नहीं होती है कि आंदोलन में सहभागिता से उन्हें शक्ति प्राप्त होगी या नहीं, अथवा वे कोई सुधार ला पाएंगे या नहीं।

    (2) परिवर्तन की प्रकति के आधार पर

    प्रख्यात विचारक डेविड एबले ने 'पियोटे रिलिजन एमंग द नवोहो' (1966) के अन्तर्गत सामाजिक आंदोलनों का उनके द्वारा अपेक्षित परिवर्तनों की प्रकृति के आधार पर वर्गीकरण प्रस्तुत किया। इस आधार पर उन्होंने निम्नलिखित चार प्रकार के आंदोलनों का उल्लेख किया है - 

    1. पूर्ण परिवर्तनवादी आंदोलन- यह वे आंदोलन हैं जोकि व्यक्ति और समाज में पूर्णरूपेण परिवर्तन लाने हेतु तत्पर होते हैं। इनके समर्थक व्यक्ति और समाज के चरित्र में एकदम परिवर्तन लाने के लिए हिंसा और विप्लव का भी सहारा ले सकते हैं। कुछ लेखकों द्वारा इस प्रकार के आंदोलनों को 'क्रान्तिकारी आंदोलन' भी कहा गया है।
    2. उद्धारवादी आंदोलन - यह आंदोलन भी समग्र या सर्वागीण परिवर्तन में विश्वास करते हैं, परन्तु यह आंदोलन मुख्यतः व्यक्ति के चरित्र को बदलने की माँग करते हैं तथा सामाजिक संस्थाओं में आमूलचूल परिवर्तन पर उतना बल नहीं देते हैं। विश्व के महान् धार्मिक आंदोलनों में से अधिकांश इसी कोटि में आते हैं।
    3. सुधारवादी आंदोलन- यह आंदोलन सामान्य तौर पर प्रचलित समाज-व्यवस्था की किसी एक या अनेक त्रुटियों को दर करने के लिये कटिबद्ध होते हैं, परन्तु समाज के बुनियादी ढांचे को कायम रखना चाहते हैं। इन आंदोलनों के समर्थक वर्तमान संस्थाओं में से केवल उन्हीं संस्थाओं पर प्रहार करते हैं, जिन्हें वे अनुपयुक्त समझते हैं, अन्य संस्थाओं से उन्हें कोई विशेष शिकायत नहीं होती, उदाहरणार्थ 1950 व 1960 के दशक के अमेरिका के नागरिक अधिकार आंदोलन' सुधारवादी आंदोलन ही थे।
    4. अल्पपरिवर्तनकारी आंदोलन- यह ऐसे आंदोलन हैं, जो कि व्यक्तियों के व्यवहार में आंशिक परिवर्तन लाना चाहते हैं। इन आंदोलनों के समर्थक यह मानते हैं कि मनुष्य मूलतः उत्तम प्रकृति के प्राणी हैं, परन्तु उनमें कुछ कमियाँ हो सकती हैं। अतः स्वभाव या चरित्र में कुछ परिवर्तन लाकर उन्हें सर्वगुणसम्पन्न बना सकते हैं। धूम्रपान विरोधी आंदोलन' इसी प्रकार के आंदोलनों की श्रेणी में आते हैं।

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