लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों के कार्य का वर्णन कीजिए

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लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों के कार्य का वर्णन कीजिए

इस लेख में लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली में राजनीतिक दलों के कार्य का वर्णन किया गया है तथा राजनितिक दलों के महत्व को समझाया गया है। 

राजनीतिक दलों के कार्य

(1) लोकमत का निर्माण - लोकतंत्र के लिए राजनीतिक दल आवश्यक है जिसका सर्वप्रथम कार्य लोकमत का निर्माण करना है। जनता वर्तमान समय के कठिन राजनीतिक प्रश्नों को स्वयं नहीं समझ पाती है। राजनीतिक दल जनता का ध्यान इन समस्याओं की ओर आकर्षित करने के लिए इन्हें सरल बनाकर जनता के सामने रखते हैं। किसी भी विषय पर विभिन्न दृष्टिकोण जनता के सामने आते हैं। तब जो लोकमत का निर्माण सम्भव हो पाता है। ब्राइस के शब्दों में राजनीतिक दलों द्वारा लोकमत को प्रशिक्षित करने उसका निर्माण करने और अभिव्यक्त करने का महत्वपूर्ण कार्य किया जाता है।

(2) निर्वाचनों में भागीदारी - राजनीति दल ही चुनाव को सम्भव बनाते हैं। अब वर्तमान में मताधिकार बहुत बड़े रूप में स्थापित हो चुका है। ऐसे ही प्रकार के दल ही निर्वाचनों में उम्मीदवार खड़ा करते हैं और अपना प्रचार करते हैं एवं साधन इकट्ठा करते हैं और जनता के सामने अपना कार्यक्रम करते हैं। चुनाव का अधिकांश व्यय भी दलों द्वारा ही खर्च किया जाता है। डॉ० फाइनर का मत के अनुसार राजनीतिक दलों के बीच निर्वाचन जैसी हो जायेगी या उनके द्वारा असम्भव नीति को अपनाकर राजनीति तन्त्र को ही नष्ट कर दिया जायेगा।

(3) सरकार का निर्माण - राजनीतिक दल चुनाव के माध्यम से सरकार का निर्माण सम्भव बनाते हैं। यदि संसद पृथक्-पृथक् विचारों के व्यक्तियों का समूह रहे तो कोई सरकार न तो बन सकती है और न ही चल सकती है। अध्यक्षात्मक सरकार से भी राष्ट्रपति का चुनाव, मंत्रिपरिषद का निर्माण तथा शासन का संचालन कठिन हो जायेगा। दल के अभाव में संसदीय शासन एक दिन भी नहीं चल सकता है। मंत्रिमंडल की प्रतिदिन पराजय होगी। शासन अस्थिर, अनिश्चित तथा गतिहीन हो जायेगा। अध्यक्षात्मक शासन में दल के अभाव में शासन व्यवस्था गतिरोध और संघर्ष में परिवर्तित हो जायेगी। इस प्रकार संसदीय व अध्याक्षात्मक दोनों ही व्यवस्थाओं में सरकार का निर्माण तथा शासन का संचालन बिना राजनीतिक दलों के सम्भव नहीं है।

(4) शासन सत्ता को मर्यादित करना - लोकतंत्र में विरोधी दल शासन की आलोचना करके बहुमत प्राप्त करके दल के अत्याचारों को रोकते हैं। वे सरकार के प्रस्तावों, योजनाओं व कानूनों की आलोचना करते हैं और शासन दल दोषरहित होने का प्रयत्न करते हैं। संगठित विरोधी दल शासन की निरंकुशता, अंकुशलता तथा भ्रष्टाचार पर सबसे बड़े अंकुश हैं। दलों के द्वारा जनता को सरकार पर नियन्त्रण रखने का अवसर प्राप्त होता है। संगठित तथा सशक्त विरोधी दल की स्थायी उपस्थिति से निरंकुशता के मार्ग में बाँधा पड़ती है। ऐसे विरोधी दल का स्थायी अस्तित्व जिसके पास सम्भावित लोकमत पर आधारित एक कार्यक्रम है स्वेच्छाचारी शासक के विरुद्ध तथा अत्याचार के विरुद्ध ही नहीं बल्कि किसी व्यवहारिक राजनीतिक बहुमत के अत्याचार के विरुद्ध भी एक ढाल का काम करता है। 

(5) शासन विभागों के एकता तथा समन्वय - शासन एक इकाई है जिसके कुशल संचालन के लिए विभिन्न विभागों में एकता तथा सहयोग होना आवश्यक है। संसदीय शासन में व्यवस्थापिका में जिस दल का बहुमत होता है। वही सरकार का निर्माण करता है। कानून निर्माण व प्रशासन की शक्ति एक स्थान पर होने से तथा दलीय अनुशासन के कारण आवश्यक कानूनों का निर्माण सम्भव होता है। बहुमत प्राप्त दल की सरकार होने से विभिन्न विभागों में एकता समन्वय बना रहता है। अध्याक्षात्मक सरकार में राजनीतिक दल ही व्यवस्थापिका व कार्यपालिका को जोड़ते हैं तथा गतिरोध व संघर्ष का समाधान करते हैं। राजनीतिक दल कार्यपालिका व व्यवस्थापिका के समन्वय एक साधन हैं।

(6) राजनीतिक चेतना - राजनीतिक दल राजनीतिक चेतना का महत्वपूर्ण साधन है। ये जनता को राजनीतिक शिक्षा प्रदान करते हैं। सार्वजनिक सभा, प्रचार, वाद-विवाद, साहित्य वितरण तथा समाचारों के माध्यम से ये जनता को जाग्रत और शिक्षित करते हैं।

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