कोजर के सामाजिक संघर्ष सिद्धांत का वर्णन कीजिये।

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कोजर के सामाजिक संघर्ष सिद्धांत का वर्णन कीजिये।

    कोजर का संघर्ष सिद्धांत

    लुईस ए० कोजर ने अपनी पुस्तक दि फंकशन्स ऑफ सोशल कॉन्फलिक्ट में लिखा है कि "स्थिति शक्ति और सीमित साधनों के मूल्यों और अधिकारों के लिए होने वाले परिवर्तन को सामाजिक संघर्ष या सामाजिक परिवर्तन कहा जाता है। इसके अन्तर्गत जान-बूझकर दूसरों की इच्छाओं का विरोध किया जाता है।" इस प्रकार व्यक्तियों तथा स्थिति शक्ति व साधनों पर अधिकार करने का प्रयास ही नहीं है, अपितु इसी कार्य में लगे अन्य व्यक्तियों को हानि पहुँचाना भी है। कोजर ने इस प्रकार यह स्पष्ट करते हुए कहा कि सामाजिक संघर्ष के द्वारा ही सामाजिक परिवर्तन होता है।

    सामाजिक संघर्ष के रूप

    कोजर का संघर्ष द्वारा सामाजिक परिवर्तन सिद्धान्त इसके अध्ययन के द्वारा समाज में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है अर्थात् इन उद्देश्यों व लक्ष्यों को प्राप्त करने वाले समूहों के बीच पाए जाने वाले संघर्ष का अध्ययन किया जाता है। कोजर ने इस परिवर्तन हेतु दो रूप बतलाये हैं, जो इस प्रकार से है

    • संगठनात्मक - इसमें समूहों की समाज में मौलिक मूल्यों के प्रति समान आस्था होती है। 
    • विघटनात्मक - इसमें समूहों के प्रति कोई आस्था नहीं रह जाती है।

    कोजर ने इस बात पर बल दिया है कि दो रूपों के कारण संघर्ष होता है और सामाजिक परिवर्तन होता है। कोजर के अनुसार, संघर्ष सामाजिक परिवर्तन के विकास में सहायक प्रक्रिया है संघर्ष कुछ मात्रा में अनिवार्य रूप से आकार्यात्मक होने की अपेक्षा समूह के निर्माण व सामूहिक जीवन की निरन्तरता के लिए यह केवल विघटनकारी या अव्यवस्था उत्पन्न करने वाली प्रक्रिया नहीं है बल्कि समूह के निर्माण में संघर्ष एवं संगठन दोनों का महत्व होता है। उनके शब्दों में "संघर्ष केवल कुछ मात्रा में आवश्यक रूप से अवास्तविक हो सकता है।" 

    कोजर के सामाजिक संघर्ष के कारक

    1. विरोधी वस्तु अथवा व्यक्ति।
    2. विरोध का आवेग।

    कोजर यह बताना चाहते हैं कि सामाजिक अन्तर्किया का परिणाम यह होता है कि सहयोग व संघर्ष दोनों साथ-साथ चलते हैं। कई बार संघर्ष स्वयं सहयोग का भी परिणाम हो सकता है और इन्हीं के परिणामस्वरूप सामाजिक परिवर्तन होता है उदाहरणार्थ जहाँ घनिष्ठता होती है वहाँ सहयोग व विश्वास होता है वहाँ अपने तनावों व संघर्षों को प्रकट करने में कठिनाई नहीं होती।

    कोजर का संघर्ष सिद्धांत के कार्य

    1. बाह्य समूह से संघर्ष, समूह के आन्तरिक विघटन को रोकता है, इस वृद्धि से संघर्ष प्रकार्यात्मक भूमिका निभाते हैं।
    2. संघर्ष शक्ति व सन्तुलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।।
    3. अन्य समूहों से संघर्ष करने वाले समूह अपने अस्तित्व के लिए निरन्तर जागरुक हो जाते हैं।
    4. संघर्ष के माध्यम से विरोध व तनावपूर्ण भावनाओं को व्यक्त करने का अवसर प्राप्त होता है।
    5. संघर्ष समूह के संरक्षण में सहायक होता है।
    6. संघर्ष आचरण सम्बन्धी नियमों की स्थापना करने में सहायता देता है।
    7. बाह्य समूह से संघर्ष के कारण समूह की आन्तरिक एकता सुदृढ़ हो जाती है और सामाजिक परिवर्तन में सहायक होते हैं।

    कोजर संघर्ष द्वारा होने वाले परिवर्तन को भी सामाजिक परिवर्तन की श्रेणी में रखते हैं। वे कहते हैं कि जैसे-जैसे किसी सामाजिक संरचना की कठोरता में भी वृद्धि होने लगती है। वैसे-वैसे किसी सामाजिक संरचना में सुरक्षा तत्वों की आवश्यकता बढ़ती जाती है।

    अतः इस वृद्धि से संघर्ष नवीन परिस्थितियों के अनुकूल आदर्शों का सामंजस्य करने को एक तन्त्र है नवीन गतिशील समाज संघर्ष से लाभ उठाता है क्योंकि इस प्रकार का व्यवहार आदर्शों की उत्पत्ति व परिष्कार करने में सहायता करके परिवर्तित दशाओं में इसकी निरन्तरता को विश्वास दिलाता है।

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