Saturday, 10 July 2021

महिला सशक्तिकरण पर निबंध। Essay on Women Empowerment in Hindi

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महिला सशक्तिकरण पर निबंध। Essay on Women Empowerment in Hindi

महिला सशक्तिकरण से आशय महिलाओं की शिक्षा और स्वतंत्रता को समाहित करते हुए सामाजिक सेवाओं में समान अवसर प्रदान करना, समान कार्य के लिए समान वेतन, कार्य-स्थल में उत्पीड़न के खिलाफ अधिकार, कानून के तहत सुरक्षा देने का अधिकार आदि प्रदान करने से है। वास्तव में महिला सशक्तिकरण समाज में महिलाओं की भूमिका को सशक्त करने का एक उपकरण है। 

"महिलाओं का पारिवारिक बंधनों से मुक्त होकर अपने और अपने देश के बारे में सोचने की क्षमता का विकास होना ही महिला सशक्तीकरण कहलाता है।"

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में महिला सशक्तिकरण

आज महिला सशक्तिकरण भारत के सबसे ज्वलंत मुद्दों में से एक है। यद्यपि भारत के संविधान में स्त्र- पुरुष को समान बताया गया है, कुछ प्राथमिकताएँ भी तय की गई परन्तु इसकी हकीकत सिर्फ कागजो तक ही सीमित है। महिलाएं आज भी न तो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है और न ही स्वतंत्र। कैसा भी निर्णय चाहे वह स्वयं के भविष्य के निर्माण के लिए ही, उसे लेने की आजादी नहीं है। उसके प्रत्येक निर्णय में परिवार और समाज का काफ़ी दबाव साफ़ स्पष्ट होता है। महिलाएं हिंसा का शिकार होती थीं और आज भी। दैनिक समाचार पत्र बलात्कार, अपहरण, दहेज मृत्यु, यौन उत्पीड़न जैसी खबरों से भरे रहते हैं जो की महिलाओं के प्रति हमारी विकृत मानसिकता को दर्शाता है । 

महिला सशक्तिकरण का महत्व पर निबंध। Essay on Women Empowerment in Hindi

जब तक महिलाओं को पुरुषों के समान शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य, सामाजिक, राजनैतिक एवं लैंगिक समानता के अवसर नहीं प्राप्त होंगे तब तक हम किसी प्रगतिशील समाज और देश की कल्पना भी नहीं पाएंगे। वैसे तो 21 वीं सदी के भारत में महिलाओं ने प्रत्येक क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। भले ही वह सरकारी, अर्ध सरकारी, निजी क्षेत्र हो या फिर खेल जगत परन्तु सवाल ये है कि ऐसी महिलायें कितनी है ? "क्या महिलाएं सचमुच में मजबूत बनी है ? यदि बनी हैं तो फिर अखबार महिलाओं के घरेलु हिंसा और उत्पीडन जैसी खबरों से क्यों भरे रहते हैं। 

भारत में महिला सशक्तिकरण कार्यक्रम 

इस देश की आबादी का आधा भाग महिलाएन हैं इसलिये देश को पूरी तरह से शक्तिशाली बनाने के लिये महिला सशक्तिकरण आवश्यक है। हमें महिलाओं को उनके मूलभूत अधिकारों से अवगत करना होगा। राष्ट्र के विकास में महिलाओं की सच्ची महत्ता और अधिकार के बारे में समाज में जागरूकता लाने के लिये "बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना", "महिला शक्ति केंद्र योजना", "सुकन्या समृद्धि योजना", "समर्थ योजना" इत्यादि कार्यक्रम चल रहे हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य महिलाओं को साक्षर तथा आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है। इसके अतिरिक्त मातृदिवस, अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस जैसे कई सारे कार्यक्रम भी चलाये जा रहे है। 

देश की तरक्की में साक्षर नारी का योगदान

भारत के विकास में महिला साक्षरता का बहुत बड़ा योगदान है। इस बात को इंकार नहीं किया कि जब-जब महिला साक्षरता में वृद्धि होती आई है, भारत विकास के पथ पर अग्रसर हुआ है । इसके कई कारण भी है - पुरुष तथा स्त्री समाज के दो पहियों के सामान हैं। यदि एक भी पहिया ठीक ढंग से काम न करे तो समाज गतिहीन हो जाता है। 

कल तक जो महिलायें घरेलु कामकाज तक ही सीमित थीं, वे आज ऑफिस के कामकाज संभाल रही हैं। चिकित्सा, आईटी, सरकारी विभाग से लेकर देश की संसद तक महिलाओं ने अपना परचम लहराया है। महिलाओं के शिक्षित होने से न केवल बालिका शिक्षा को बढ़ावा मिला बल्कि शिशु मृत्यु दर में गिरावट आई है। कन्या भ्रूण हत्या जैसे जघन्य अपराधों में कमी देखी गयी है हालाँकि इसमें और प्रगति की गुजांइश है । 

क्या कहते हैं सरकारी आंकड़े ?

सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल आबादी 102.87 करोड है । इसमें से लगभग 62 करोड़ पुरुष एवं 58 करोड़ महिलाएँ हैं । यदि लिंगानुपात की बात की जाए तो भारत में  प्रत्येक 1,000 पुरुषों की तुलना में 944 महिलाएँ हैं । 

जनसंख्या

कुल

1,210,854,977

पुरुष

623,270,258

महिलायें

587,584,719

साक्षरता

कुल

74.04%

पुरुष

82.14%

महिलायें

65.46%

जनसंख्या घनत्व

प्रति वर्ग किमी

382

लिंगानुपात

प्रति 1000 पुरुषों पर

943 महिलायें

शिक्षा की बात करें तो सन् 2011 की जनगणना के अनुसार कुल 73% साक्षरों में पुरुष साक्षरता 80.9% और महिला साक्षरता 64.6% है । यदि इसकी तुलना सन् 2001 के आंकड़ों से की जाए तो पता चलता है कि महिलाओं की साक्षरता में सुधार हुआ तो है लेकिन वह सुधार प्राथमिक स्तर पर ही है । पिछले कई वर्षों से 10 वीं एवं 12 वीं की परीक्षाओं के परिणामों में बालिकाएँ, बालकों से बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं । लेकिन उच्च शिक्षा में अभी भी पुरुषों का ही वर्चस्व है। 

यदि सन् 2011 की जनगणना के अनुसार कुल श्रमिकों की संख्या 36.25 करोड़ है । इसमें से कुल पुरुष श्रमिकों की संख्या 36.25 करोड़ है और महिलाओं की संख्या 8.93 करोड़ है । हालाँकि वर्ष 2001 से तुलना करे तो पता चलता है कि रोज़गार का यह आँकड़ा बढ़ा है लेकिन कुल कमाई की हिस्सेदारी में उनका हिस्सा आज भी कम है। आज भी कई क्षेत्र जैसे की पुलिस, सेना, पायलट, चार्टर्ड अकाउंटेंट, कमांडो इत्यादि जो पहले पुरुषों के लिए ही थे लेकिन अब महिलाएं भी इनमें बेहतर प्रदर्शन कर रही है फिर भी उनकी क्षमता को पूरी तरह से उपयोग में लाया नहीं जा रहा है । 

निष्कर्ष 

महिला सशक्तिकरण की दिशा में विभिन्न सरकारों, गैर सरकारी संस्थाओं एवं निजी संस्थाओं ने कई प्रयास किये है और आज भी कर रहे हैं। परन्तु यह प्रयास तभी सफल होंगे जब एक महिला दूसरी महिला के लिए जागरूक होगी। समाज को भी अपनी विकृत मानसिकता को त्यागकर पुरुष प्रधान समाज से समन्वयवादी समाज की और अग्रसर होना पड़ेगा। जोकि मात्र किसी नीति, योजना, कागजी घोषणा एवं कार्यक्रमों से नही बदलेगा बल्कि उसके लिए आत्मचिंतन के साथ पारिवारिक एवं सामाजिक पहल की सख्त आवश्यकता है। 


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