Saturday, 26 June 2021

राष्ट्रगीत वन्दे मातरम् पर निबंध / Essay on Vande Matram in Hindi Language

राष्ट्रगीत वन्दे मातरम् पर निबंध लिखिए। Write Essay on Vande Matram in Hindi Language.

राष्ट्रगीत वन्दे मातरम् पर निबंध / Essay on Vande Matram in Hindi Language

भूमिका : वन्दे 'मातरम्' भारत का गीत है। प्रत्येक राष्ट्र में अनेक गीत लिखे जाते हैं, स्मरण किये जाते हैं, और भुलाये जाते हैं। कुछ ही गीत ऐसे होते हैं जो राष्ट्र के जन जीवन पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं । कुछ ही गीत ऐसे होते हैं जो सदैव अमर हो जाते हैं और किसी राष्ट्र का इतिहास बना देते हैं। 'वन्दे मातरम्' गीत उन गीतों में से एक है जिसने स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व लाखों भारतवासियों में अपनी मातृ-भूमि के प्रति भर मिटने की भावना उत्पन्न की। यह वह गीत है जिसे गाते हुए हजारों देश-प्रेमियों ने मातृ-भूमि पर अपना जीवन न्यौछावर कर दिया। यह वह गीत है जिसने राष्ट्र की मृत जनता में जान फूंक दी। आज स्वतंत्रता प्राप्ति के लगभग 72 वर्ष उपरान्त भले ही इस गीत को सुनकर या गाकर हमारी भुजाओं का रक्त गरम न हो उठता हो परन्तु स्वतंत्रता के पूर्व जब यह गीत गाया जाता था तो देश के नौजवानों के रक्त का प्रवाह बढ़ जाता था । देश पर मर-मिटने की अभिलाषा सुदृढ़ हो जाती थी। आज भी यह गीत हमारे लिये प्रेरणा-स्रोत बना हुआ है।

राष्ट्रगीत वन्दे मातरम् पर निबंध / Essay on Vande Matram in Hindi Language

गीत के रचयिता और उनका संक्षिप्त जीवन परिचय-'बन्दे मातरम्' के प्रसिद्ध गीत के रचयिता बंगला कवि एवं लेखक श्री बंकिमचन्द्र चटर्जी थे। बंकिम बाबू का जन्म बंगाल में १८३८ ई० में हुआ था। उनका स्थायी निवास बंगाल के काटनपारा ग्राम में था। उनके परिवार में सभी लोग शिक्षित थे तथा उनमें अनेक प्रकाण्ड पंडित माने जाते थे। बंकिम बाबू प्रथम भारतीय स्नातक थे। यद्यपि वह सरकारी नौकरी में थे परन्तु उसके बाद भी उन्हें साहित्य-सेवा करने का पर्याप्त समय उपलब्ध हो जाता था। साहित्य में उनकी विशेष अभिरुचि थी और जब भी अपने कार्य से समय मिलता, वह इस क्षेत्र में लग जाते । 'आनन्दमठ' बंकिम बाबू का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास है।

'बन्दे मातरम्' गीत लिखने की प्रेरणा-यहाँ यह प्रश्न बरबस उठता है कि बंकिम बाबू को 'बन्दे-मातरम्' गीत लिखने की प्रेरणा कब और किस प्रकार प्राप्त हुई । इस सम्बन्ध में विभिन्न लोगों के विभिन्न मत हैं। कुछ लोगों का कथन है कि एक बार वह रेल से यात्रा कर रहे थे और अपनी मातृभूमि के प्राकृतिक सौन्दर्य को देखकर उनके मुंह से इस गीत की पंक्तियाँ निकल गई थीं। अन्य लोगों का मत है कि उन्होंने यह गीत अपनी पुत्री की जिद पर लिखा था। उनकी पुत्री ने उनसे मातृ-भूमि के विषय में कुछ बतलाने को कहा था और उसी समय बंकिम बाबू के मुखारबिन्द से 'बन्दे-मातरम्' की पंक्तियां निकली थीं। एक अन्य मत यह है कि इस गीत के बोल बंकिम बाबू के मुँह से तब निकले जब वह सो रहे थे और उनके भतीजे ने उन बोलों को लिपि-बद्ध कर लिया। 

इनमें से कौन सा मत सत्य है, इस सम्बन्ध में कुछ नहीं कहा जा सकता। मेरे विचार से इनमें से कोई भी मत पूर्णतया सत्य नहीं है। वास्तविकता यह है कि इस प्रकार का गीत तब तक नहीं लिखा जा सकता जब तक कि हृदय में मातृ-भूमि के प्रति अपार प्रेम और मर मिटने की भावना न हो । बंकिम बाबू ने १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम को स्वयं अपनी आँखों से देखा था और इस घटना ने अवश्य ही उनमें अपनी मातृ-भूमि के लिए कुछ करने की भावना उत्पन्न की होगी। इस क्षेत्र में उन्हें पंडित प्रवर जैराम जो एक महान विद्वान थे, से अत्यधिक प्रेरणा प्राप्त हुई। बंकिम बाबू जब सरकारी नौकरी में थे तो प्रत्येक रविवार को अपने ग्राम काटनपारा जाते थे जहाँ पंडित प्रवर जैराम ने उन्हें संस्कृत भाषा का ज्ञान कराया था। बंकिम बाबू बहुधा कहा करते थे 'जननी जन्म-भूमिश्च स्वर्गादिप गरीयसी' । कदाचित यही भावना थी जिसने उन्हें 'बन्दे-मातरम्' जैसे अमर गीत लिखने के हेतु प्रोत्साहित किया।

रचना काल-१९१४ ई० के पूर्व इस गीत की रचना काल के सम्बन्ध में विभिन्न मत थे परन्तु अब लगभग सभी विद्वान उससे सहमत हैं कि बंकिम बाबू ने इस गीत की रचना ३७ वर्ष की अवस्था में १८७५ ई० में की थी। यह गीत सबसे पहले 'बंग-दर्शन' में प्रकाशित हुआ था जो बंकिम बाबू के प्रसिद्ध उपन्यास 'आनन्द-मठ' को धारावाहिक रूप में प्रकाशित कर रहा था। गीत १८८० ई० में 'बंग दर्शन' में प्रकाशित हुआ था।

स्वतंत्रता संग्राम और 'बन्दे मातरम' गीत-जैसा कि हमने पहले उल्लेख किया है कि 'बन्दे मातरम्' गीत एक ऐसा गीत है जिसने लोगों को अपनी मातृभूति की बलिवेदी पर मर मिटने के लिए प्रोत्साहित किया। इस प्रसिद्ध गीत में कवि ने अपनी मातृभूमि की महिमा का गुणगान किया है। मातृ-भूमि से महान इस संसार में कुछ भी नहीं है। वह पूज्यनीय है, बन्दनीय है । स्वतंत्रता से पूर्व देशवासियों ने मातृभूमि के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के लिए इस गीत को अपना आदर्श बनाया और वास्तव में यह गीत भारतवर्ष का दूसरा राष्ट्रगीत बन गया।

'बन्दे मातरम्' का नारा ७ अगस्त, १९०५ ई० को कलकत्ते की एक सभा में बुलन्द किया गया था। इस नारे के पूर्व कांग्रेस के पास अन्य कोई नारा न था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एक ऐसा राजनीतिक दल था जो देश की स्वतंत्रता के हेतु पूरी तरह से समर्पित था और जिसके प्रयासों से देश को स्वतंत्रता प्राप्त हुई, ने 'बन्दे मातरम्' के नारे को अपनाकर बंकिम बाबू को ही गौरवान्वित नहीं किया बल्कि देश की अपार जनसंख्या को एक ऐसा नारा दिया जिसमें कि उसमें प्रेरणा का संचार किया । १६०५ ई० के बाद 'बन्दे मातरम् के नारे के साथ ही 'बन्दे मातरम्' गीत स्वतंत्रता सेनानियों का मुख्य प्रेरणा स्रोत रहा। पता नहीं कितनी माताओं ने इस गीत का गाते-गाते अपने लालों को मातृभूमि पर मिटने के लिए भेज दिया। पता नहीं कितनी भारतीय नारियों ने इस गीत को गाते-गाते अपने माथे के सिन्दूर को पुछवा दिया। पता नहीं कितने भारतीय बच्चों ने इस गीत को गाते-गाते अपने माता-पिता को खो दिया और पता नहीं मातृ-भूमि के कितने सपूतों ने इस गीत को गाते-गाते अपने सीनों पर संगीनों और गोलियां सही तथा अपने प्राणों को उत्सर्ग कर दिया। 'बन्दे मातरम्' गीत की कहानी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की कहानी है। १९०५ ई० के बाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को 'बन्दे मातरम्' गीत से अलग नहीं किया जा मकता । हर राष्ट्र-प्रेमी की जिह्वा पर यह गीत निरन्तर गूंजता रहता था। कांग्रेस के हर अधिवेशन में यह गीत अत्यन्त उच्च-स्वर से गाया जाता था। जब यह गीत गाया जाता था तो जनता में अपार साहस का संचार हो जाता था। यह गीत हमारी राष्ट्रीय विचारधारा से पूरी तरह से घुल-मिल गया था। मातृ-भूमि की महिमा का जो गुणगान इस गीत में किया गया उसने देश के स्त्री-पुरुषों, बच्चों, वृद्धों सभी में नई उमंगों का संचार किया। हँसते-हँसते इस गीत को गाते हुए अपने प्राणों को उत्सर्ग करना भारतीय नौजवानों के प्रति एक आम बात बन गई। कारावास ने कठोर सीखचों के बीच भी यह गीत उच्च स्वर में गूंजता रहा। विदेशी शासक देश के रणबांकुरों से उनके प्राण माँग सकता था परन्तु उनके मुखारबिन्दु से गीत के बोल नहीं बन्द करवा सकता था।

आधुनिक युग में 'बन्दे-मातरम्' गीत का महत्व-'वन्दे-मातरम्' गीत हमारे राष्ट्रीय स्वतंत्रता का सूचक है । इस गीत का महत्व आज भी उतना हो अधिक है जितना कि स्वतंत्रता के पूर्व था। जब कोई भारतवासी इस गीत को गाता है तो उसके सामने स्वतंत्रता की बलिवेदी पर मर मिटने वालों का चित्र बन जाता था। इस गीत में उन लाखों लोगों को यादगारें छिपी हैं जो मातृ-भूमि के लिये उत्पन्न हुए, और मातृ-भूमि के लिए ही हँसते-हँसते मर गए। उन्हें यह गीत उतना ही प्रिय था जितनी कि अपनी मातृभूमि की स्वतन्त्रता प्रिय थी। यही कारण है कि आज भी भारतवासियों के हृदय में 'वन्दे मातरम्' गीत के प्रति अपार सम्मान और श्रद्धा है। राष्ट्र के जन-जीवन में कोई भी गीत इतना अधिक व्यापक प्रभाव नहीं डाल सका है जितना अधिक यह मधुर गीत । मातृ भूमि के प्रति कुछ कर देने की भावना जितनी अधिक इस गीत ने उत्पन्न की है उतनी अधिक किसी अन्य गीत ने नहीं। इस गीत का इतिहास हमारी स्वतन्त्रता का इतिहास है । इसमें हमारे मातृ-भूमि के प्रति अपार श्रद्धा छिपी हुई है और इसलिए यह गीत हमें आज भी प्रिय है। यह हमारे लिए आज भी उतना ही बन्दनीय है।

उपसंहार-अभी कुछ समय पूर्व 'बन्दे-मातरम्' गीत का शताब्दी महोत्सव मनाया गया। अनेक स्थानों पर विभिन्न उत्सवों का आयोजन किया गया तथा इस गीत और उसके रचयिता के प्रति भारतीय जनता ने श्रद्धा व्यक्त की। आवश्यकता इस बात की है कि इस गीत का पाठ भारत के प्रत्येक विद्यालय में प्रतिदिन किया ही न जाय बल्कि विद्यार्थियों को इस गीत के इतिहास से परिचित कराया जाय । इस गीत में अपनी मातृ-भूमि के प्रति जो अपार प्यार, आस्था और गौरव की गाथा है, उसे जानने और नवयुवकों में मातृभूमि के लिए मर मिटने की भावना उत्पन्न करना हम सभी का कर्तव्य


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