Friday, 7 February 2020

स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता नहीं हिंदी निबंध Swatantrata Ka Artha Swachandata Nahi

स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता नहीं हिंदी निबंध Swatantrata Ka Artha Swachandata Nahi

स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता नहीं हिंदी निबंध swatantrata ka artha swachandata nahi : 'स्वतंत्रता' एक भाववाचक संज्ञा है। इस प्रकार 'स्वतंत्रता' शब्द स्व-अधीनता या अपनी इच्छाओं के अधीन रहकर मुक्त विचरण करने के अर्थ और भाव को प्रकट करने वाला शब्द है। इसी दृष्टि से कहा जाता है कि 'स्वतंत्रता स्वच्छन्दता नहीं है।’ आज वास्तव में 'स्वतंत्रता' का अर्थ 'स्वच्छन्दता' यानि 'निरंकुशता' मानकर ही सबप्रकार का व्यवहार किया जा रहा है। लगभग सौ वर्षों तक हमारे नेताओं ने स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए जो संघर्ष किया, उसका अर्थ और उद्देश्य स्वच्छन्द या निरंकुश हो जाना कतई नहीं था, जबकि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से यह देश और इसका प्रत्येक नागरिक उसकेवास्तविक अर्थ, आदर्श और प्रयोजन को भुलाकर क्रमशः स्वच्छन्द, बल्कि कहना चाहिए।

निबंध : 'स्वतंत्रता' एक भाववाचक संज्ञा है। इसका सामान्य अर्थ है सब कुछ अपने अधीनहोना, अपनी इच्छा से कर पाना, पर इस सबका अर्थ और प्रयोजन अनुशासनहीनता या प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष नियम-विधाओं को न मानना अथवा उनकी उपेक्षा करना नहीं है। यह शब्द या भाववाचक संज्ञा स्व+तंत्र+ ता= इन तीन शब्दांशों के मेल से बना है। 'स्व' का अर्थ होता है-अपना या हमारा, हम सब का। 'तंत्र' का अर्थ होता है-नियम या विधान । 'ता' प्रत्यय है, जिसका अपना कोई अलग अर्थ नहीं होता। प्रत्यय का काम शब्दांशों और शब्दों के अन्त में जुड़कर उनके रूप और अर्थ को पूरा करना, या फिर बदल देना। इस प्रकार 'स्वतंत्रता' शब्द स्व-अधीनता या अपनी इच्छाओं के अधीन रहकर मुक्त विचरण करने के अर्थ और भाव को प्रकट करने वाला शब्द है। इसका अर्थ सभी प्रकार के मानवीय नियमों,विधानों, रीति-नीतियों और आदर्शों से ऊपर उठकर, या फिर इस प्रकार की सभी बातों की उपेक्षा करके व्यवहार करना नहीं है। इसी दृष्टि से कहा जाता है कि 'स्वतंत्रता स्वच्छन्दता नहीं है।’ इस कहावत पर विचार करते समय ऊपर की गयी व्याख्या और की गयी बातों पर पूरी तरह ध्यान रखना भी आवश्यक है।

आज वास्तव में 'स्वतंत्रता' का अर्थ 'स्वच्छन्दता' यानि 'निरंकुशता' मानकर ही सबप्रकार का व्यवहार किया जा रहा है। लगभग सौ वर्षों तक हमारे नेताओं ने स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए जो संघर्ष किया, उसका अर्थ और उद्देश्य स्वच्छन्द या निरंकुश हो जाना कतई नहीं था, जबकि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से यह देश और इसका प्रत्येक नागरिक उसकेवास्तविक अर्थ, आदर्श और प्रयोजन को भुलाकर क्रमशः स्वच्छन्द, बल्कि कहना चाहिए।निरंकुश और उच्छंखल होता गया है। स्वतंत्रता अपने नागरिकों से स्वच्छ-व्यवहार, नियमो-विधानों का पालन, नैतिकता और नीतियों के उचित निर्वाह की अपेक्षा किया करती है,जबकि स्वच्छन्दता उच्छंखलता को बढ़ावा देकर उन सब बातों की उपेक्षा कर दिया करताहै। अपने आस-पास के जीवन-व्यवहारों पर दृष्टि डालने, गम्भीरता से देखने पर हम पातेहैं कि आज स्वतंत्रता का ग़लत अर्थ लगाकर सबसे अधिक स्वच्छन्द या उच्छखल औरनिरंकुश वही लोग हो गये है कि जिनके कन्धों पर देश और राष्ट्र को चलाने, इन्हें सम्हालनेऔर उन्नत बनाने की जिम्मेदारी है। उनके द्वारा स्वतंत्रता का गलत अर्थ लगाकर, ग़लत आचरण-व्यवहार करने का ही यह कुफल और कुपरिणाम है कि आज हमारे देश में चारोंतरफ निरंकश उच्छंखलता का नंगा नाच हो रहा है। जीवन-समाज के किसी भी क्षेत्र में अनुशासन नाम की कोई वस्तु नहीं रह गयी। चारों तरफ लूट-खसोट और आपाधापी मचीहुई। अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार, काला बाजार का बाजार गर्म है। मानवीयआटों और मूल्यों का कोई महत्त्व नहीं रह गया। अपने तुच्छ स्वार्थों को पूरा करनेके लिए जरूरत पड़ने पर लोग अपना धर्म-ईमान तो क्या देश-जाति और राष्ट्र तक को बेचडालने को तैयार दिखायी देते हैं। इसे स्वतंत्र राष्ट्र के स्वतंत्र जागरूक नागरिकों का व्यवहारनहीं कहा-माना जा सकता। यह तो सरासर स्वतंत्रता के अर्थ का अनर्थ करना ही है। 

स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ होता है मन-मस्तिष्क और व्यवहार का स्वच्छ खुलापन!मानवीय आदर्शो, जीवन-समाज की आवश्यकताओं, इच्छा-आकांक्षाओं का ध्यान रखते हुएउचित कार्य करने की आजादी। स्वतंत्रता का अर्थ होता है व्यावहारिक अपनापन, यानिअपने देश-काल की सभी प्रकार की नैतिकताओं का ध्यान रखकर ऐसा आचरण-व्यवहारकरना कि जो सभी के लिए सुख-लाभ देने वाला हो। परन्तुं नहीं, हमारे लिए स्वतंत्रता काअर्थ है बिना किसी अनुशासन, बिना किसी डर-संकोच के अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिएऐसा व्यवहार करना कि यदि उससे दूसरों की राष्टीय और मानवीय मल्यों की भी हानिहोती है, तो बेशक हो। नहीं भाई, इस प्रकार की सोच और व्यवहार स्वतंत्रता नहीं स्वच्छन्दताहुआ करते हैं। स्वच्छन्दता भी अपने सहज स्वाभाविक रोमानियत के अर्थ और व्यवहार मेंनहीं, बल्कि अनुशासनहीनता, निरंकुशता और उच्छंखलता के घृणित अर्थ में। अर्थ का अनर्थकरने का ही यह परिणाम है कि आज राजनीतिक स्वतंत्रता पाकर भी हम तरह-तरह केस्वार्थों और मानसिक गुलामी के चक्कर से छुटकारा नहीं प्राप्त कर सके। स्वयं तो गलतअर्थ-प्रयोग और व्यवहार के कारण दुखी रहते ही हैं, औरों के लिए भी उसके कारण उपस्थितकरते रहते हैं। नहीं, स्वतंत्रता-प्राप्ति के चवालीस-पैतालीस वर्षों बाद भी हम स्वतंत्र राष्ट्र केनागरिकों जैसे स्वच्छ व्यवहार करना नहीं सीख पाये। हमने स्वेच्छाचार को स्वतंत्रता समझलिया है। स्वतंत्रता के नाम पर स्वच्छन्दता यानि स्वार्थ-साधना को अपना लक्ष्य बना लियाहै! इस दृष्टि से वास्तव में हम स्वतंत्रता के अधिकारी नहीं हैं।स्वतंत्रता का अर्थ अपना तंत्र होना तो होता ही है. अनुशासन और त्याग-बलिदान काभाव भी होता है। इनसे रहित स्थिति को चाहे स्वच्छन्दता कह लिया जाए, स्वतन्त्रता नहींकहा जा सकता। स्वतंत्रता का सम्बन्ध व्यक्ति की स्वस्थ मनोवृत्ति और सामूहिक चेतना केसाथ रहता है, जबकि स्वच्छन्दतावादी व्यक्ति समूह की बात भूलकर केवल अपने तक, अपनेस्वार्थों की सिद्धि तक ही केन्द्रित होकर रह जाता है। वास्तव में अपनी स्वार्थी मनोवृत्तियोंक कारण हमने अपनी स्वतंत्रता को भी स्वच्छन्दता का, एक प्रकार की कोरीऔर बाहरी रोमानियत का स्वरूप प्रदान कर दिया है। इसी कारण आज हर जाति, धर्म, वर्ग आदि की स्वतंत्रता के नारे तो हमारे पास अनेक है, पर व्यवहार के नाम पर अक्सर हमारी मानसिकता मध्यकालीन स्थितियों को उजागर करने वाली बनकर रह जाती है।

स्वतंत्रता का अर्थ है भीतर-बाहर से सभी प्रकार के व्यक्तिगत स्वार्थों से मुक्त होनेका अवस्था। अपना सब-कुछ देश-राष्ट्र और समाज के लिए त्याग और बलिदान कर देनेकी अवस्था, न कि केवल नारे लगा कर अपने स्वार्थों की पूर्ति में रम जाने का नाम स्वतंत्रताहै। वह मात्र स्वच्छन्दता है, स्वाधीनता नहीं। बिना स्वार्थ-त्याग किए स्वतंत्र या स्वाधीन बनपाना संभव नहीं हुआ करता, जबकि हम लिप्त तो रहते हैं अपने घृणित स्वार्थों को पूराकरने में और नाम लेते हैं स्वतंत्रता-स्वाधीनता का । अतः आवश्यकता उस संकुचित मानसिकतासे छुटकारा पाने की है, कि जो हमें स्वच्छन्द यानि अपने तक सीमित रोमानियत में निमग्नरखा करती है। उससे छुटकारा पाकर ही स्वतंत्रता या स्वाधीनता का वास्तविक अर्थ तोसमझा ही जा सकता है, उसका आनन्द भी लिया जा सकता है। खद आनन्द लेकर अपनेपूरे समाज, देश और राष्ट्र के लिए सुख-समृद्धि और आनन्द का वातावरण बनाया जा सकताहै। राजनीतिक स्वतंत्रता तो हमने लगभग चवालीस-पंतालीस वर्ष पहले पा ली थी, अबबौद्धिक-मानसिक स्वतंत्रता भी पानी है। तभी उस स्वच्छन्दता से छुटकारा संभव हो सकताहै कि जिसने हमें निरंकुश और उच्छृखल बना रखा है।

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