Wednesday, 27 February 2019

मेरी अविस्मरणीय रेल यात्रा पर निबंध Meri Avismarniya Rail Yatra

मेरी अविस्मरणीय रेल यात्रा पर निबंध Meri Avismarniya Rail Yatra

Meri Avismarniya Rail Yatra
अकस्मात संवेदनाओं की घड़ियां जब सुधियों की निधि बन जाती है तो वे अविस्मरणीय बन जाती हैं। समय का साबुन भी उन स्मृतियों को शीघ्र धोने में सफल नहीं हो पाता। मेरी जीवन की एक रेल यात्रा ऐसी ही अविस्मरणीय निधि है। रह-रहकर मेरे स्मृति पटल पर अंकित हो जाती है।

रात्रि का प्रथम प्रहर। गाड़ी अंबाला शहर के स्टेशन से चंडीगढ़ के लिए चली। चंडीगढ़ पहुंचने में एक घंटा शेष था। यात्री सुविधा अनुसार बच्चों को लिटा रहे थे ताकि थोड़ी नींद ले लें। कुछ लोग खाने की चीजें जो अंबाला शहर से खरीदी थी, खा रहे थे। कुछ गपशप कर रहे थे। शांत वातावरण में गाड़ी की कर्कश आवाज भी अप्रिय नहीं लग रही थी।

डेराबसी का स्टेशन आया। हमारे कंपार्टमेंट से एक पति-पत्नी उतरे। चढ़ा कोई नहीं। उनके खाली स्थान पर समीप बैठे व्यक्तियों ने कब्जा कर लिया। गाड़ी पुनः चली। गाड़ी अभी तेजी के मूड में थी कि एक आदमी चिल्लाया जिसके पास जो पैसे हैं गहने हैं वह हमारे हवाले कर दो। बस क्या थापूरे कंपार्टमेंट में सन्नाटा छा गया।

आवाज एक आदमी की थी पर उसके साथी तीन और थे। वे तीनों पहले से ही अलग कोने में बैठे थे। जैसे ही उनके नायक ने चेतावनी दी, खड़े हो गए और सभी को मारने पीटने और उनकी नकदी जेवर छीनने लगे। हाहाकार मच गया। रोने, चिल्लाने, गिड़गिड़ाने, आहें भरने की आवाजें कंपार्टमेंट में गूंजने लगी।

एक अधेड़ उम्र की औरत मर्द उनके पैर पकड़कर कह रहे थे हमारी लड़की की शादी है। भैया सामान उनके दहेज का है। इसे छोड़ दो। क्रूरता शैतान का पहला गुण है। दया, ममता, मोह उसे स्पर्श भी नहीं कर पाते। उग्रता के साथ निर्दयता के मेल से क्रूरता का आविर्भाव होता है। उसने आदमी को दो चपेट मारी और नारी के वक्ष पर जो घूंसा मारा वह वही अचेत हो गई।

मेरे सामने की सीट पर दो युवतियां बैठी थी। वे भी भय युक्त आंखों से यह दृश्य निहार रही थी, वे अकेली थी। दिल्ली से मेरे साथ चली थी। उसकी परस्पर बातचीत से मुझे ऐसा लगा था कि वे यूनिवर्सिटी स्टूडेंट हैं। 

चारों  लुटेरों का एक साथी जब उन युवतियों के पास पहुंचा तो कुछ क्षणों उनके सौंदर्य को निहारता रहा। फिर उनमें से एक के कपोलों पर हाथ फेरने के लिए जैसे ही उसने हाथ बढ़ाया, युवती ने साहस बटोरकर उसके मुंह पर चांटा जड़ दिया। चलचित्र की भांति चलते इस साहसिक अभियान ने मेरी आत्मा में निडरता की चिंगारी प्रज्वलित कर दी। उसकी पीठ मेरी ओर थी। मैंने पलक झपकते उसकी कोहली भर ली। उसने मुझसे छूट पाने की चेष्टा की। मुझे घूसा मारने की असफल चेष्टा की।
भय की भांति साहस भी संक्रामक होता है। युवती के चांटे और मेरे कोहली भरने ने फूस अग्नि की चिंगारी फूंक दी। लोग लुटेरे पर टूट पड़े। उसे दबोच लिया।

युद्ध स्थल का दृश्य पलट चुका था। बहादुर लुटेरों ने अपने साथी की ऐसी हालत देखी तो पलायन करना ही उचित समझा। सच भी है चोर के पैर नहीं होते विश्वास नहीं होता। उनमें से एक ने खतरे की जंजीर की खींच दी। गाड़ी डगमगाते हुए रूकी।

गाड़ी आहिस्ता होते ही उसके दो साथी तो डिब्बे से उतरने में सफल होकर रात्रि के अंधकार में खो गए पर खतरे की जंजीर खींचने वाला लुटेरा फंस गया। वह जंजीर खींचने के लिए सीट पर पैर रखकर खड़ा था जैसे ही वह उतरा यात्रियों ने उसे पकड़ लिया और पीटना शुरू कर दिया। पलक झपकते ही उसने चाकू निकाली और पीटने वालों पर वार करने लगा। दो से यात्री चाकू से घायल हो गए। लोगों का साहस गायब हो गया।उत्साह और साहस चाकू के सामने पानी भरने लगे। यात्री पीछे हट गए अपनी जान बचाने के लिए।लुटेरे का उद्देश्य लोगों को घायल करना नहीं था, वह तो भागने के लिए अपना मार्ग प्रशस्त कर रहा था।  यात्री पीछे हटे और वह गेट की ओर दौड़ा। भय से युक्त पलायन में असावधानी हो जाती है। गेट से उतरने में उसका पैर किसी सूटकेस से ठोकर खा गया और वह लड़खड़ाकर गेट के नीचे गिर गया। उसका लहूलुहान शरीर भागने का साहस जुटा रहा था।

गाड़ी के जंगल में रूकने और हमारे कंपार्टमेंट के शोर को सुनकर पड़ोसी डिब्बे के लोग उतरा आए। उन्होंने पहला काम उस घायल लुटेरों को पकड़ने का किया।

भीड़ इकट्ठा हुई। गाड़ी के साथ चल रहे रेल पुलिस के चार सिपाही आए। गार्ड आया। गार्ड ने परिस्थिति को संभाला। उसने दो लुटेरों को हमारे ही कंपार्टमेंट में बिठाया। पुलिस के चार सिपाही बैठे। गार्ड ने हरी झंडी दिखाकर पहली सिटी बजाकर गाड़ी चलने का संकेत दिया। सीटी की आवाज सुनकर यात्री अपने कंपार्टमेंट की ओर दौड़े। गार्ड ने देखा कि लोग गाड़ी में बैठ गए हैं तो उसने दूसरी सिटी बजाकर गाड़ी चलने का आदेश दे दिया।

हमारा कंपार्टमेंट अब एक तमाशखाना बन चुका था। पहले से अधिक भीड़, पहले से अधिक कानाफूसी चल रही थी। मजे की बात यह है कि लोग अपने साहस की डींगे मार रहे थे।

चंडीगढ़ का स्टेशन आया। लुटेरों को उतारा गया। उनको देखने के लिए भीड़ जमा हो रही थी। दोनों युवितयां शायद पुलिस गवाही के चक्कर से बचने के लिए भीड़ में कहीं खो गई थी। मैं तो पुलिस के हथकंडों का भुक्तभोगी था। इसलिए भीड़ में पुलिस को धोखा देकर प्लेटफार्म छोड़ चुका था।

ट्रेन की लूट-खसोट, यात्रियों का आहत-अपमान, भय युक्त चेहरे, कॉलेज छात्रा का साहसपूर्ण चांटा आज भी मेरे मन-मस्तिष्क के सामने आकर मुझे उस रेल यात्रा को स्मरण रखने को विवश करता है। वह रेलयात्रा मेरे जीवन की अविस्मरणीय रेल यात्रा बन गई।
गूँथ कर यादों के गीत।
मैं रचता हूं विराट् संगीत।।


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