Monday, 24 February 2020

Hindi Essay on “Baap Bada na Bhaiya, Sabse bada Rupaiya ”, “बाप बड़ा ना भैया, सबसे बड़ा रुपैया”, for Class 10, Class 12 ,B.A Students and Competitive Examinations.

बाप बड़ा ना भैया, सबसे बड़ा रुपैया

Baap Bada na Bhaiya, Sabse bada Rupaiya

मनुष्य के जीवन में भावना का बड़ा ही उच्च स्थान और महत्त्व है। भावना ने ही एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य के साथ जोड़ रखा है। वह भावना ही है, जिसके रहते घर-परिवारऔर समाज में कोई हमारा दादा है, कोई भैया है, कोई बहन है, कोई माता-पिता आदि;अन्य कुछ। इस प्रकार के भावों, भावनात्मक सम्बन्धों और रिश्तों-नातों पर ही यह जीवन-समाज टिका हुआ है। जिस दिन वास्तव में इस भावना का मनुष्य के मन-जीवन से लोप हो जायेगा, उस दिन सारे रिश्ते-नाते अपने-आप समाप्त हो जायेंगे। समाज तो क्या, घर-परिवारतक बिखर कर अपनी हस्ती गंवा बैठेंगे । आज भावना के स्थान पर हमारी स्वार्थपूर्ण बुद्धि का महत्त्व बढ़ता जा रहा है। भावना के रिश्तों-नातों के स्थान पर रुपये-पैसे को अधिक मान और महत्त्व मिलने लगा है। इसी तरफ इशारा करते हुए ही किसी ने यह बात कही है कि:
“बाप बड़ा ना भैया, सबसे बड़ा रुपैया"
यहाँ 'दादा' और 'भैया' शब्द वास्तव में हमारे भावनात्मक मानवीय सम्बन्धों के प्रतीकहैं। दूसरी तरफ ‘रुपैया' शब्द हमारी स्वार्थमूलक बुद्धि का प्रतीक है। कहने वाले ने इसउक्ति में यही कहा है कि आज भावना के सम्बन्धों का स्थान स्वार्थपूर्ण व्यवहारों ने लेलिया है। आज का मनुष्य धन या रुपये-पैसे को ही अधिक महत्त्व देने लगा है। उसकेलिए बाप-दादा, बहन-भाई सभी कुछ रुपया-पैसा ही बनता जा रहा है। यही उसका धर्म-ईमानसब कुछ बनकर रह गया है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि मात्र हमारे जीवन औरसमाज से मानवतावादी आदर्शों और मूल्यों का महत्त्व निरन्तर गिरता जा रहा है। आज मनतथा आत्मा का कोई स्थान और महत्त्व नहीं रह गया। पास में अगर पैसा है, तो आदमीकुछ भी कर सकता है। वह दूसरों के मन और आत्मा को खरीद भी सकता है।

एक और प्रकार से भी इस कहावत या उक्ति की व्याख्या की जा सकती है। कहाजा सकता है कि आज भावनाओं से सम्बन्ध रखने वाली संस्कृति का मान नहीं रह गया।आज केवल उपभोक्ता-संस्कृति का महत्त्व बढ़ गया है। इसके प्रभाव से आज मनुष्य औरइसकी भावना को भी एक चीज, एक वस्तु मान लिया गया है, जिसे कुछ पैसे देकर कोईभी खरीद सकता है। इस प्रकार आज खरीदने-बेचने वाली मानसिकता ही निरन्तर बढ़तीजा रही है। ईमानदारी और कर्त्तव्यपरायणता का कतई कोई महत्त्व नहीं रह गया। यदि कोईव्यक्ति ईमानदार रहकर अपने कर्तव्य का पालन करना चाहता है, तो उसकी कीमत डालनेकी कोशिश की जाती है। कीमत डाल या लोभ-लालच देकर उसे भ्रष्ट कर दिया जाताहै। सरकारी विभागों में यदि कभी भूल से कोई नियमानुसार कार्य करने वाला व्यक्तिजाता है। तो भ्रष्टाचारी लोगों को कहते हए सुना जाता है कि उसकी कीमत जानने कीकोशिश करो' या 'उसकी अधिक से अधिक कीमत डालकर देखो, हर आदमी को खरीदाजा सकता है।' इस प्रकार कहा जा सकता है कि इस रुपयावादी या धनवादी दृष्टि ने व्यक्तिके धर्म-ईमान, कर्तव्यपरायणता आदि सब कुछ को निगल लिया है। सारी मानवता, मानवताकी सारी व्यवस्थाओं को भ्रष्ट करके भीतर से खोखला और खाली बना दिया है। मनुष्यता,उसकी भावना, उसकी कर्तव्यपरायणता और ईमानदारी आदि किसी का कोई महत्व नहीं,गया!

'सबसे बडा रुपैया' की भावना ने धर्म और संस्कृति तक को भ्रष्ट कर दिया है। किसीमुहूर्त निकालने वाले के पास जाइये, वह पैसा देखकर उस दिन का मुहूर्त भी निकाल देगा।जो कि थोडी देर पहले जिस दिन कोई महर्त न होने की बात कर चुका होगा! मंदिर केपुजारी भी प्रसाद तभी देंगे, जब आपने प्रसाद चढ़ाया हो। उसकी मात्रा चढ़ावे की मात्राके अनुसार घट-बढ़ सकती है। किसी दफ्तर में पहले तो चपरासी को रुपया दिखाये बिनाघुस पाना ही सम्भव नहीं, फिर बिना कुछ दिये अपनी फाइल को आगे बढ़ा पाना तो एकदमअसंभव है। रुपये-पैसे का महत्व इतना बढ़ गया है कि बिना कुछ लिये अपना ही एकहाथ दूसरे हाथ का काम करने को तैयार नहीं हो पाता। इस बात को यों भी समझा जासकता है। एक ही दफ्तर में काम करने वाले का जब कोई काम साथ की कुर्सी पर बैठकर काम करने वाले के पास अटक जाता है, तो वह बिना कुछ लिए, और कुछ नहीं तो बिना एक प्याला चाय का पिये अपने उस साथी का काम करने को तैयार नहीं हो पाता।

इस प्रकार स्पष्ट है कि आज जो चारों ओर भ्रष्टाचार, व कालाबाजार का धन्धा निरन्तर पनप रहा है, उसका वास्तविक कारण रुपया ही है। रुपया पाने के लिए पुरुष अपने व्यक्तित्व और स्वाभिमान को बेचता है, तो नारी भी अपना तन बेचती हुई देखी जा सकती है। रुपयापाने के लिए आदमी अपने माँ-बाप, भाई-बहन तक को धोखा देने के लिए तत्पर रहता है।आज चारों तरफ जो हिंसा, चोरी, लूट-पाट, मार-काट, डकैती आदि का जोर है; इन सबकेमूल में रुपया पाने की इच्छा ही तो काम कर रही होती है। रुपया देकर किसी की हत्यातक करवायी जा सकती है, जबकि रुपया पाने के लिए अनेक हत्याएं होती रहती है।रुपया-पेसा पाने के लिए लोग देशद्रोह के काम तक करते हुए देखे जाते है। समृद्ध कहेजाने वाले घरों के लोग पैसा खाकर देश के रहस्य विदेशी दश्मनों के हाथों बेच देते हैं।देश के धन से दलाली खाकर विदेशियों को लाभ पहुँचाते और इस प्रकार अपनी मानवतातक को गिरवी रख दिया करते हैं। ऐसा कौन-सा कुकर्म और पाप है, पैसे के लाभ मेंआदमी जो नहीं कर रहा!वास्तव में रुपये-पैसे की महिमा अपरम्पार है। कभी रुपया-पैसा केवल आवश्यकतापूरी करने का साधन माना जाता था, मनुष्य उसे खाता-पीता था, पर आज रुपया मनुष्यउसकी मनुष्यता को खा-पीकर डकार भी नहीं ले रहा। आदमी का शरीर ही नहीं, मन और

आत्मा भी उसके दास बनकर रह गये हैं। वह मानवता के निरन्तर पतन का कारण बनताजा रहा है। कभी जिस रुपये-पैसे को हाथों का मैल समझा जाता था, आज वह सबकीआँखों का अंजन और तारा बन गया है। इसे मानवता के विकास के लिए शुभ नहीं मानाजाता। कारण स्पष्ट है। वह यह कि पैसा पाने के लिए पहले परिश्रम करना पड़ता था, परअब हेराफेरी करके ही, बिना काम और परिश्रम के, कम-से-कम समय में आदमी धन्नासेठबन जाना चाहता है। उसकी प्रवृत्तियाँ तक दूषित होकर रह गयी हैं। ऐसी स्थिति में मानवताके विकास की तो क्या इसके बचे रह पाने की आशा भी नहीं की जा सकती। जब मानवताका भाव मर जायेगा, तो अपने-आप ही अच्छी परम्पराएँ और सभ्यता-संस्कृति आदि काअन्त हो जायेगा।

स्पष्ट है कि भावना से बढ़कर रुपये-पैसे को महत्त्व देने के कारण आज मनुष्य जातिके सामने मानवता और मानव-संस्कृति की रक्षा का संकट अपने भयानक रूप में उपस्थितहै ! मानवता के शाश्वत भाव को जगाकर, स्वार्थों का चश्मा उतार कर, पैसा-रुपयावादीदृष्टि त्यागकर ही उस संकट से मुक्ति पायी जा सकती है। हम जितनी जल्दी विशुद्धमानवीय आत्मा और कर्त्तव्य-पालन की दृढ़ता को जगा पायेंगे, उतनी जल्दी ही उद्धार संभव हो पायेगा।

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