Friday, 29 November 2019

हिंदी साहित्य में महिला साहित्यकारों का योगदान

हिंदी साहित्य में महिला साहित्यकारों का योगदान - Hindi Sahitya Mein Nari ka Yogdan 

हिंदी साहित्य में महिला साहित्यकारों का योगदान Hindi Sahitya Mein Nari ka Yogdan: जीवन के सभी क्षेत्रों में स्त्री ने पुरुष का साथ दिया है। साहित्य के क्षेत्र में, जहाँ महाकवियों ने साहित्य को एक नवीन दिशा प्रदान की वहाँ महिलाओं ने भी अपनी अमूल्य कृतियों से हिंदी साहित्य के क्षेत्र में विशेष योगदान दिया, परन्तु वह भारत माँ का दुर्भाग्य था, कि यहाँ पुरुषों की भाँति स्त्रियों की शिक्षा-दीक्षा का अभाव रहा अन्यथा यहाँ जितने पुरुष साहित्यकार हए उनसे अधिक महिला साहित्यकार होतीं। हिंदी साहित्य में महिला साहित्यकारों का योगदान को निम्नलिखित शीर्षकों से समझा जा सकता है:

वीरगाथा काल

हिंदी साहित्य का आदिकाल वीरगाथा काल कहा जाता है। यह एक प्रकार से राजनैतिक आँधी और तुफान का युग था। राजपूत राजे-महाराजे अपने-अपने अस्तित्व की रक्षा में लगे हुए थे। यवनों के भयानक आक्रमण भारतवर्ष पर हो रहे थे। और वे शनैः शनैः अपना अधिकार जमाते आ रहे थे। वह समय महिलाओं की कोमल भावनाओं के अनुकूल भी नहीं था। अत: हिन्दी साहित्य के आदिकाल में तो कोई महिला साहित्यकार प्रकाश में नहीं आई। परन्तु उसके पश्चात् अन्य सभी कालों में महिलाओं ने साहित्य की वृद्धि में यथाशक्ति योगदान दिया है।

भक्तिकाल

भक्तिकाल की मधुर एवं कोमल साहित्यिक प्रवृत्तियाँ महिलाओं की रुचि के अनुकूल थीं। इस काल में कई उच्चकोटि की महिला कवियित्रियों के दर्शन होते हैं। इन्होंने निराकार ब्रह्म और साकार ब्रह्म श्रीकृष्ण को पति के रूप में स्वीकार करके अपने अन्तर्मन की भावनाओं को कोमलकान्त पदावली द्वारा व्यक्त किया। भक्तिकालीन महिला काव्यकारों में सहजोबाई, दयाबाई और मीराबाई का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। सहजोबाई चरणदास की शिष्या थी। उन्होंने निराकार प्रियतम के प्रति अनूठी उक्तियाँ कही है। प्रियतम की भक्ति-माधुरी में प्रेमोन्मत्त होकर सहजो कहने लगतीं-
बाबा नगरु बसाओ ।
ज्ञान दृष्टि सूं घट में देखौ, सुरति निरति लौ लावो ।।
पाँच मारि मन बसकर अपने, तीनों ताप नसावौ ।।
दयाबाई भी चरणदास की शिष्या थीं। उनका विषय वर्णन भी सहजोबाई निराकार प्रियतम का आह्वान और विरह निवेदन दी है। मृतपाय हिंदू जाति पर इन कवियित्रियों ने अपनी रसमयी काव्य धारा द्वारा ऐसी पीयूष वर्षा की कि वह आज तक सानन्द जीवित है।

मीराबाई

दयाबाई के पश्चात् मीरा का नाम आता है। मीरा भक्ति साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कवियित्री थीं। मीरा की कोमल वाणी ने भारतीय साहित्य में प्रेम और आशा से भरी हुई वह पावन सरिता प्रवाहित की जिसकी वेगवती धारा आज भी भारतीय अन्तरात्मा में ज्यों की त्यों अबाध गति से बह रही है। मीरा ने अपने अनुभूत प्रेम और विरह वेदना को साहित्य में स्थान दिया। कितना लालित्य और माधुर्य है, इनके पदों में, सभी जानते हैं। आज भारत के घर-घर में इनके पदों का आदर है। स्त्री-पुरुष सभी इन पदों को समान भाव से गाकर आज भी आनन्द-विभोर हो उठते हैं। श्रीकृष्ण के साथ मीरा का प्रेम दाम्पत्य-भाव का प्रेम था, श्रीकृष्ण उनके प्रियतम थे, जन्म-जन्म के साथी थे। और वह उनकी विरहिणी प्रेयसी थी। यह स्पष्ट घोषणा करते हुए मीरा को न कोई संकोच था और न कोई लोकलाज-
मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई,
जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई ।
सन्तन ढिंग बैठि-बैठि, लोक लाज खोई,
अब तो बेलि फैलि गई, अमृतफल होई।।
मीरा की-सी वेदना, टीस और कसक सम्भवतः हिन्दी की किसी अन्य कवियित्री में नहीं मिल सकती। मीरा के पद हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। एक दूसरा पद देखिए-
हे री मैं तो प्रेम दीवानी, मेरा दरद न जाने कोय,
दरद की मारी बन-बन डोले वैद मिला नहि कोय।
सली ऊपर सेज पिया की किस विधि मिलना होय,
मीरा की प्रभु पीर मिटै जब, वैद सँवरिया होय।

मीरा के उपरान्त

मीरा के उपरान्त हिन्दी साहित्य में छत्र वरि, विष्णु कुँवर, राय प्रवीण तथा ब्रजवासी अनेक महिला कवियित्रियों के दर्शन होते हैं। इन सभी महिलाओं ने अपनी पुनीत मधुर भावनाओं द्वारा हिन्दी साहित्य को समृद्धिशाली बनाने में पूर्ण योगदान दिया। विष्णु कुँवरि का सुन्दर पद उदाहरणार्थ प्रस्तुत किया जा रहा है। इस पद में वे अपने प्रियतम भगवान श्रीकृष्ण के विरह की व्याकुलता करती हैं
निरमोही कैसो हियौ तरसावै ।
पहिले झलक दिखाव कै हमकें, अब क्यों देगि न आवै ।।
कब सौं तड़फत तेरी सजनी, वाको दरद न जावै ।
विष्णु कुँवर उर में आ करके, ऐसी पीर मिटावै ।।
अकबर के शासनकाल में राय प्रवीण' एक वेश्या थी। नृत्य और गीत के साथ वह सुन्दर कविता भी करती थी। वह महाकवि केशव की शिष्या थी। केशवदास जी ने कविप्रिया' में इसका इन भी किया है। अकबर इसके रूप-लावण्य पर मुग्ध था। उसने एक दिन इनसे भरी सभा में गाने को कहा। पहले तो इसने मना किया, परन्तु बाद में विवश होकर इन्हें गाना पड़ा। इसके तत्काल निम्नलिखित दोहा बनाकर सुनाया, जिससे अकबर बहुत लज्जित हुआ-
विनती राव प्रवीण की सुनिए शाह सुजान ।
जूठी पातर चखत है, बारी बायस स्वान ।।

मुसलमान महिला साहित्यकारों का योगदान

इनके बाद ताज का नाम आता है। यद्यपि ये मुसलमान थीं फिर भी इन्हें श्रीकृष्ण से प्रेम हो गया था। इनकी कविता भक्ति रस से ओत-प्रोत है। ताज श्रीकृष्ण के चरणारविंद में अपना न मन, धन समर्पित करने को उत्सुक है
सुनो दिलजानी मेरे दिल की कहानी तुम
दस्त हौं बिकानी, बदनामी भी सहूँगी मैं ।
देव पूजा ठानी हों नमाज हैं भुलानी,
तज कलमा कुरान, सारे गुनन कहूँगी मैं।
साँवला सलोना सरताज सिर कुल्लेदार,
तेरे नेह दाग में निदाग है दहूँगी मैं।
नन्द के कुमार, कुरबान तेरी सूरत पै,
हों तो मुसलमानी, हिन्दुवानी है रहँगी मैं।
ताज के पश्चात् शेख का नाम आता है। ये रंगरेजिन महिला थीं, इन्होंने एक ब्राह्मण कवि से विवाह कर लिया था और उसका नाम आलम रखा था। दोनों पति-पत्नी आनन्द से कविता किया करते थे। शेख की कविता शृंगार रस में अद्वितीय हैं। निम्नलिखित उदाहरण पति-पत्नी के प्रश्नोत्तर के रूप में। प्रथम पंक्ति में पति प्रश्न करते हैं, दूसरी पंक्ति से शेख उसका उत्तर देती है-
कनक छरी सी कामिनी, काहे को कटि छीन ।
कटि को कंचन काटि कै, कुचन मध्य धरि दीन ।।
हिन्दी के प्रसिद्ध 'कुण्डलियाँ' लेखक गिरधर कविराय की पत्नी का नाम 'साँई' था। अपने पति की भाँति वे भी नीतिपूर्ण छन्दों में रचना किया करती थीं। उदाहरण देखिए-
साँई अवसर के परे, को न सहे दुःख द्वन्द्व ।
जाय बिकाने डोम घर, वे राजा हरिचन्द ।।

आधुनिक काल

आधुनिक काल में नव-जागृति और नव-चेतना का उदय हुआ। महिलाओं की शिक्षा-दीक्षा प्राम्भ हुई उनके हृदय में नवीन भावनाओं ने जन्म लिया। साहित्य की सभी विधाओं पर महिलाओं ने लेखनी चलाई। आधनिक युग की महिला कवियित्रियों में प्रथम नाम श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान आता है। इन्होंने देश-भक्ति पूर्ण रचनायें की। झांसी की रानी' तथा 'वीरों का कैसा हो वसन्त इनकी अत्यन्त प्रसिद्ध रचनायें हैं। इनकी रचना का एक उदाहरण देखिए-
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने प्रकटी तानी थी।
बूढ़े भारत में भी आई, फिर से नई जवानी थी।।
गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी।
दूर फिरंगी को करने की, सबने मन में ठानी थी।
बुन्देले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
इसके अनन्तर छायावादी युग की प्रमुख कवियित्री महादेवी वर्मा का नाम आता है। महादेवी जी के गीत अपनी सहज सहनशीलता, भावविधता के कारण सजीव हैं। विरह की आग में अनजान कविता उनके हृदय से बह निकलती है। देखिए उनकी करुणातुर प्रार्थना कितनी नारी सुलभ है-
जो तुम आ जाते एक बार !
कितनी करुणा कितने सन्देश, पथ में बिछ जाते बन पराग।
गाता प्राणों का तार-तार, अनुराग भरा उन्माद राग।
आँसू लेते वे पद पखार, जो तुम आ जाते एक बार ।।
महादेवी जी के गीत लोकप्रिय एवं हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। उनकी अपनी शैली है, अपनी प्रवृत्ति है। इस करुणा के अनन्त, असीम सागर में वे केवल नीर भरी दुःख की क्षणिक बदली ही हैं-
मैं नीर भरी दुःख की बदली !
विस्तृत नभ का कोना-कोना मेरा न कभी अपना होना।
परिचय इतना इतिहास येही, उमड़ी कल थी मिट आज चली ।।
वे जीवन के शून्य क्षणों में विकल होकर गा उठती हैं
अलि ! कैसे उनको पाऊँ।
ये आँसू बनकर भी मेरे इस कारण ढल-ढले जाते,
इन पलकों के बन्धन में मैं बाँध-बाँध पछताऊँ ।।
आधुनिक युग में महिला साहित्यकारों ने साहित्य की सभी विधाओं पर लिखना प्रारम्भ किया। कोई भी विधाक्या कहानी, क्या उपन्यास, क्या आलोचना, ऐसी नहीं है, जिस पर महिला ने लेखनी न चलाई हो। इन महिला साहित्यकारों में श्रीमती विद्यावती कोकिला, तारा पाण्डेय, सुमित्रा कुमारी सिन्हा, राजेश्वरी देवी, रजनी पणिक्कर, कंचनलता, सब्बरवाल तथा शची रानी गुर्टू आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। कविता के क्षेत्र में श्रीमती सुमित्रा कुमारी सिन्हा ने अधिक ख्याति प्राप्त की है। इनकी रचना का एक उदाहरण देखिए-
क्या तुम अकेले मन !
देखो जल, रेती साथ रहे, हैं भिन्न, किन्तु कस हाथ गहे ।
वे तो जड़ हैं, पर तुम चेतन, क्या तुम्हीं अकेले हो, ओ मन ।।
आधुनिक युग में महिला साहित्यकारों की उत्तरोत्तर वृद्धि होती जा रही है। आशा है कि निकट भविष्य में हिन्दी साहित्य को इनकी नवीन साहित्य कृतियाँ और भी अधिक समृद्धिशाली बनायेंगी।
Read also : 
रीतिकाल की सामान्य प्रवृत्तियां और विशेषतायें
जीवन में हास्य रस का महत्व हिंदी निबंध
गीतिकाव्य परम्परा का उद्भव और विकास
हिन्दी साहित्य में उपन्यास का उद्भव और विकास
हिन्दी साहित्य का स्वर्ण युग भक्तिकाल पर निबंध

SHARE THIS

Author:

I am writing to express my concern over the Hindi Language. I have iven my views and thoughts about Hindi Language. Hindivyakran.com contains a large number of hindi litracy articles.

0 comments: