हँसो हँसो जल्दी हँसो निबन्ध - राजकिशोर

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हँसो हँसो, जल्दी हँसो हिंदी के प्रसिद्ध निबंधकार राजकिशोर द्वारा लिखा गया एक निबंध है। प्रस्तुत लेख में हँसो हँसो, जल्दी हँसो (Hanso Hanso Jaldi Hanso) निबंध के मुख्य बिंदु (Important Points) तथा प्रश्नोत्तर (Question & Answers) प्रकाशित किये जा रहे हैं।

    हँसो हँसो जल्दी हँसो निबन्ध के मुख्य विचार बिंदु

    • सम्पूर्ण प्रकृति में केवल मनुष्य ही हँस सकता है, लेकिन हँसी-हँसी में भेद होता है। आश्चर्यजनक दृश्य, मनोरंजक घटना और सहज विनोदपूर्ण प्रसंग सहज हँसी का कारण होते हैं।

    • व्यंग्य का इतिहास पुराना है। भर्तृहरि ने अपने नीतिशतकम् में दुर्जनों पर तीखे व्यंग्य किए हैं, जो समाज के सभ्य और गुणवान जनों को हेय दृष्टि से देखते हैं। राजनीतिज्ञों की अवसरवादिता को देखा। इसी प्रकार प्राचीन संस्कृत साहित्य में अनेक नाटककारों ने कृपण, पाखंडी और दुर्जनों पर भी व्यंग्य लिखे हैं।

    • यूँ प्राचीन साहित्य में हास्य को नवरसों में स्थान दिया गया था, लेकिन उसकी उपयोगिता सामित थी। अनेक कवियों ने तत्कालीन मूर्ख, पक्षपाती, विद्वानों का सम्मान करने में अक्षम राजाओं पर भी व्यंग्य लिखे हैं, लेकिन ये सभी व्यंग्य पाठक के मन को गुदगुदाने वाले हैं। व्यक्ति केन्द्रित होने के कारण इनमें रोचकता है जो किसी विरोध भावना को जगाने के बदले छुटपुट हास्य का भाव देता है।

    • आधुनिक युग में व्यक्ति के दृण्टिकोण में मूलतः बहुत अधिक परिवर्तन आ गया है। प्रेम का स्थान घृणा ने ले लिया है। प्रेम में किया गया व्यंग्य आत्मीयता से युक्त होने के कारण एक विशेष प्रकार की मिठास लिए होता है। इसके विपरीत आधुनिक व्यंग्य अपने लक्ष्य को शत्रु मानकर अमानवीयता से युक्त होता है। समाज की राजनतिक, आर्थिक, पारिवारिक और भावात्मक जटिलताओं के बढ़ने से शक्ति का केन्द्रीकरण होने लगा है। इस प्रवृत्ति के मुखारित रूप को साहित्य में व्यंग्य के माध्यम से व्यक्त किया जाने लगा। यहाँ व्यंग्य एक हथियार बन गया। ऐसा हथियार-जो चाशनी में लिपटे था।

    • प्रसिद्ध मनोविश्लेषक सिगमंड फ्रायड ने चुटकुलों के संदर्भ में यह स्पष्ट किया है कि उनका मूल प्रायः व्यक्ति की उन दमित इच्छाओं से संबंधित होता है जो किसी कारणवश अधूरी रह गई हैं। इस रूप में चुटकुले 'आनंददायक प्रतिशोध' हैं, जो कभी हँसाते हैं तो कभी दवा-ढका रुदन उनके माध्यम से फूट पड़ता है। ये मानसिक दुर्बलताग्रस्त व्यक्ति का ऐसा हथियार है जिसके द्वारा वह सहज ही अपने विरोधी से बदला ले सकता है।

    • पराधीनता की स्थिति में व्यक्ति अपनी भावनाएँ व्यंग्य के ही माध्यम से व्यक्त करके सुरक्षित रहता है। वह प्रत्यक्ष रूप से आक्रान्ता के प्रति कुछ नहीं कहता, लेकिन व्यंग्य के माध्यम से अपने मन की सारी प्रतिक्रियाएँ व्यक्त कर देता है। यही कारण है कि हिन्दी साहित्य के इतिहास में भारतेन्दु-युग में व्यंग्य का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया गया।

    • आज समाज की अव्यवस्था, विश्रृंखलता को व्यंग्य के माध्यम से जिस रूप में व्यक्त किया जा 'राष्ट्रीय यज्ञ' का विशेषण देता है। दैनिक पत्र बिना ‘कार्टून' के अधूरे हैं। यह एक ऐसी विधि है जो सामाजिक आक्रोश को भी हास्य का विषय बना देती है। निश्चय ही व्यंग्य समाज का ऐसा माध्यम है जो कहीं-न-कहीं उसे सशक्त बनने की प्रेरणा भी देता है। हास्य-व्यंग्य कठिनाई में व्यक्ति की मानसिक पीड़ा को कम करके उसे जीवन के संघर्ष के लिए प्रेरित करने में भी सक्षम है। इस रूप में वह दवा भी है और हथियार भी।

    Hanso Hanso Jaldi Hanso - Question & Answers

    आशय स्पष्ट कीजिए
    सभ्यता के तंतु जैसे-जैसे जटिल होते जाते हैं तथा मनुष्य का मन जैसे-जैसे उसकी प्रतिरोध करने की क्षमता होती जाती है इस सहज हँसी का स्थान वह कुटिल हँसी लेती जाती है, जिसका दूसरा नाम व्यंग्य है।
    आशय : सभ्यता व्यक्ति के सामाजिक सुविचारों से युक्त संस्कारों का पर्याय है, लेकिन जैसे-जैसे इसमें असभ्यता सम्मिलित होती जाती है, वैसे-वैसे व्यक्ति का दैनन्दिन जीवन कठिनाइयों से पूर्ण होता जाता है। सभ्यता के तंतु की जटिलता- अर्थात्, जीवन में व्यक्तिगत सामाजिक अथवा राजनैतिक विसंगतियों के कारण कठिनाइयों का आना। परिणामतः वह अपना विरोध अप्रत्यक्ष रूप से यानि व्यंग्य के माध्यम से व्यक्त करता है। इस रूप में उसकी व्यावहारिक सहजता कुटिलता में परिवर्तित हो जाती है।

    एक जीवन्त जाति सिर्फ हँसना-हँसाना नहीं जानती। वह जिन पर हँसती है, उन्हें दुरुस्त करना भी जानती है।
    आशय : जाति का ‘जीवन्त' होना, अर्थात् उसका प्रत्येक बाधा को पार करते हुए आगे बढ़ते जाने का प्रतीक है। हँसी जीवन की सहजता और निस्वार्थता का दूसरा नाम है। अतः अपने जीवन की खुशी को बनाए रखने के लिए समाज के विरोधियों को उनकी कमियों का आभास दिलाना अत्यंत आवश्यक है। ऐसे व्यंग्य का सार्थक हथियार न केवल उन्हें उनके दीपों से परिचित कराता है, बल्कि उन्हें सुधारने की चेतावनी भी देता है। 

    लघूत्तरीय प्रश्न
    'हास्य' और 'व्यंग्य' में अंतर स्पष्ट कीजिए।
    उत्तर : हास्य में जहाँ शुद्ध विनोद मनोरंजन गुदगुदाने का भाव प्रखर होता है। यूँ भी कहा जा सकता है कि हास्य में सहज भाव से हँसने हँसाने का भाव प्रमुख होता है। दूसरी ओर व्यंग्य अथवा कृत्रिम व्यक्तित्व-सम्पादन की भूमि पर खड़ा होता है। हास्य सुनने और सुनाने वाले दोनों का मनोरंजन करता है, जबकि व्यंग्य वाचक के मन की कटुता को उसके लक्ष्य तक पहुँचाने का साधन है जिसमें सुनने वाला 'दोषी' होने के कारण आहत भी हो सकता है।

    भर्तृहरि ने व्यंग्य-विधान को किस रूप में व्यक्त किया है?
    उत्तर : भर्तृहरि ने अपने 'नीतिशतकम्' में धनलोलुप व्यक्तियों पर तीक्ष्ण व्यंग्य किया है। उनके अनुसार धन के लालची व्यक्ति अपने लालच के सम्मुख सब कुछ हेय समझते हैं। उत्तम गुण, शीतलता, शूरता आदि सभी गुण भले ही नष्ट हो जायँ, उन्हें तो केवल उपने द्रव्य (धन) को ही बचाना है। इसी प्रकार वे (लालची जन) लज्जा दिखाने वाले परुष को मुर्ख मानते हैं। पवित्रता को ढोंग कहते हैं। शूरवीर उनके अनुसार दयाहीन व्यक्ति हैं। मीठा बोलने वाला लाचारी में इस गुण का वाहक है। तेजस्विता को मिथ्या गर्व और स्थिर चित्त वाले व्यक्ति को ये (लालची व्यक्ति) आलसी कहते हैं। इस रूप में अपने ‘लालच' को सर्वोपरि मानने वाले इस वर्ग के प्रति भर्तृहरि ने व्यंग्य को आधार बनाकर इसकी भर्त्सना की है।

    लेखक के अनुसार मनुष्य ओर पशु में क्या अंतर है?
    उत्तर : ‘रोना तो पशु भी जानते हैं लेकिन मनुष्य ही है, जो हँस सकता है'- के अनुसार प्रकृति ने केवल मनुष्य को ही हँसने का गुण प्रदान किया है। हँसने की प्रक्रिया मन में मनोरंजक भावों का परिणाम है। यह गुण केवल मात्र मनुष्य में है, पशु में नहीं। पशु दुःखी हो सकता है लेकिन हँसने की क्षमता उसमें नहीं है।

    प्राचीन व्यंग्य और वर्तमान व्यंग्य में आए मूलभूत अंतर को स्पष्ट कीजिए।
    उत्तर : प्राचीन समय में व्यंग्य न तो विधा के रूप में था और न ही रचनाकार की शैली का मुख्य अंग। हास्य को अवश्य ही नवरसों में स्थान प्राप्त था लेकिन उसका संबंध मानव स्वभाव मात्र से था। इस रूप में वह सीमित रूप मेंही प्रयुक्त होता था। वर्तमान युग में व्यंग्य व्यक्ति केन्द्रित ही न रहकर, व्यवस्था की विकृतियों और समूह की प्रवृत्तियों कोअपना लक्ष्य बना रहा है। समाज की निरन्तर जटिल होती जा रही परिस्थितियाँ इसका मूल कारण हैं। पहले हास्य में प्रेम, उदारता, साानुवृत्ति का प्राधान्य था, आज इन सबका स्थान द्वन्द्व, आक्रोश और घृणा ने ले लिया है। व्यंग्य साहित्य इसका ही मुखरित रूप है।

    फ्रॉयड ने चुटकुलों का मनोविश्लेषणात्मक विश्लेषण किस रूप में किया है?

    उत्तर : प्रसिद्ध पाश्चात्य मनोविश्लेषक सिगमंड फ्रॉयड का मानना है कि चुटकुलों के मूल में आत्मदमन की स्थिति विद्यमान रहती है। आज के संक्रमणशील समाज में व्यक्ति को अनेक पारिवारिक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ऐसी स्थितियों का सामना करता है जो उसके मनोनुकूल नहीं हैं। विवशता के कारण उसे अपनी भावनाओं का दमन करना पड़ता है। ये दमित भावनाएँ ही चुटकुलों के रूप में व्यक्त होती हैं। एक प्रकार से इन चुटकुलों का चरित्र आनंददायक प्रतिशोध का है।

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