Tuesday, 22 January 2019

‘वर्षा सुंदरी के प्रति’ कविता का मूलभाव स्पष्ट कीजिए।

वर्षा सुंदरी के प्रति कविता का मूलभाव स्पष्ट कीजिए।

वर्षा सुंदरी के प्रति कविता में कवयित्री महादेवी जी ने वर्षारूपी सुंदरी का अलंकारिक वर्णन किया है। उन्होंने वर्षा का युवती के रूप में मानवीकरण करके उसके रूप सौंदर्य का अनुपम वर्णन किया है। महादेवी जी ने बादलों की उपमा इस रूपसी युवती के केशों से की है। उन्होंने वर्षा रूपी सुंदरी के शरीर को उस महिला के शरीर के समान बताया है जो अभी स्नान करके आई हो। कवयित्री ने बादलों को वर्षा रूपी सुंदरी का वस्त्र तथा जुगनु को उसके आँचल के सोने के फूल बताया है। महादेवी जी ने आकाश में उड़ते बादलों की पंक्ति को इस सुंदरी के गले के श्वेत कमल के फूलों के हार के समान बताया है। इस सुंदरी के आगमन पर प्रकृति मनोरम हो जाती है तथा वातावरण में मधुरता छा जाती है। कवयित्री का भाव इस सुंदरी से आग्रह करना है कि हे वर्षारूपी सुंदरी! तुम संसाररूपी अपने शिशु को अपनी गोद में समेट लो तथा इस पर अपना दुलार बरसाती रहो।


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