Tuesday, 12 March 2019

राष्ट्र के प्रति विद्यार्थियों के कर्तव्य पर निबंध

राष्ट्र के प्रति विद्यार्थियों के कर्तव्य पर निबंध

भारत की आंतरिक स्थिति वर्तमान में सोचनीय है। यहां कानून और व्यवस्था चौराहे पर औंधे मुंह पड़े सिसक रहे हैं। राष्ट्र की इन विषम परिस्थितियों में विद्यार्थी का कर्तव्य क्या हो सकता है? क्या उसका कर्तव्य केवल अध्ययन करना और देश की स्थिति में आंखें मूंद लेना हो? विद्यार्थी का कर्तव्य समाज द्रोही तत्वों और आतंकवादियों से निपटना हो? क्या विद्यार्थियों का कर्तव्य देश की महंगाई को रोक ना हो? कदापि नहीं। जिस दिन देश का विद्यार्थी विषमताओं के विरुद्ध कमर कस कर खड़ा हो गया तो समझ लीजिए भारत की अग्नि में जलकर भस्म हो जाएगा। सिर दर्द दूर करने के लिए सिर काटने का उपाय असंगत है। विद्यार्थी का यह कर्तव्य सूखे भूसे में दिया सलाई जलाने के समान होगा।

दूसरी ओर देश की विषम स्थिति की अवहेलना करके मात्र अध्ययन को ही कर्तव्य समझना भी छात्र की भूल है, यह राष्ट्रीय आचरण के विरुद्ध है। आंख मूंद लेने से कबूतर बिल्ली से तो बच नहीं पाएगा। बम के विस्फोट में आतंकवादियों की अंधाधुंध गोली वर्षा में मरने वाला स्वयं विद्यार्थी भी हो सकता है और उसके परिवारीजन भी। कीचड़ से बचकर यदि कोई चले भी तो तेज चलने वाले वाहन उसके वस्त्रों को मिला तो करेंगे ही। फिर विद्यार्थी राष्ट्र की समस्याओं के प्रभाव से अछूता कैसे रह सकता है।

तीसरी ओर क्या विद्यार्थी को विद्या मंदिरों को ताला लगाकर सक्रिय राजनीति में कूद पड़ना चाहिए? सरकार की इच्छा भी यही है क्योंकि मतदान की आयु 18 वर्ष करने की पृष्ठभूमि भी यही है। सरकार 18 वर्षीय युवक को विवाह का दायित्व संभालने की योग्य नहीं मानती पर देश के दायित्व निर्वाह करने योग्य समझती है। यह कैसी विडंबना और अंतर्विरोध है? ऐसा करना विद्यार्थी के ज्ञान द्वार को बंद कर देना होगा। इसलिए विद्यार्थियों द्वारा विद्या अध्ययन का काम अबाध गति से चलता रहे यही विद्यार्थी का प्रथम कर्तव्य है।

विद्यार्थी विद्या के निमित्त अपने को समर्पित समझे यह उसका दूसरा कर्तव्य है। नियमित रूप से कक्षा में जाए। एकाग्रचित होकर गुरुद्वारा पढ़ाए पाठ को सुनें घर से करके लाने को दिए कार्य की पूर्ति पर बल दें। पढ़ाए गए पाठ का चिंतन मनन करें। अधिकाधिक प्राप्ति के लिए निरंतर अध्यवसाय करना अपना कर्तव्य माने।

वर्तमान भारत में राजनीतिज्ञों, नव धनाढ्यों, तस्करो और असामाजिक तत्वों का बोलबाला है। यह सभी कानून की पकड़ से दूर है, पुलिस चौकी स्वयं इनकी रक्षक हैं। इसलिए यथासंभव इनसे बचना चाहिए यह तत्व शिकायतकर्ता विद्यार्थी को जीवनदान दे देंगे यह नामुमकिन है। ऐसी परिस्थिति में विद्यार्थी दूरभाष के सार्वजनिक केंद्र से या सक्षम अधिकारी को अनाम पत्र लिखकर इसकी सूचना तो दे ही सकता है। संपादक के नाम गलत नाम से पत्र लिखकर उस देखी घटना को सार्वजनिक तो कर ही सकता है।

विद्यार्थी भी समाज का वैसा ही अंग है जैसे अन्य नागरिक अपने समाज की उन्नति में ही उसकी भी उन्नति है। इसलिए वह समाज विरोधी तत्वों से सचेत रहें। 3 से 4 की टोली में घूमते हुए जेबकतरों को पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दे। आभूषण छीनते बटमार को पकड़ कर पुलिस को थमा दे। किसी स्थान पर कोई संदेहास्पद वस्तु को देखता है तो 100 नंबर को फोन कर दे। यहां तक तो विद्यार्थी को अपना कर्तव्य समझना चाहिए।

आज भारतीय समाज सांप्रदायिकता और जातीयता की आग की लपटों में झुलस रहा है। उस का एकमात्र हल है मानव मात्र में अपनी ही आत्मा के दर्शन। मानव की समानता का बोध। विद्यार्थी जीवन में यदि व्यक्ति में यह भाव जागृत हो जाए तो सांप्रदायिकता की जड़ ही उखड़ जाएगी। विद्यार्थी का कर्तव्य है कि वह अपने सहपाठियों में जातिवाद, वर्गवाद, प्रांतवाद, संप्रदायवाद की दुर्गंध को ना फैलने दे। भ्रातृत्व की सुगंध से अपने विद्यालय के वातावरण को सुरक्षित रखे।

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर ने देशवासियों का ध्यान तीन कर्तव्यों की ओर आकर्षित किया है। यही कर्तव्य विद्यार्थी के भी हो सकते हैं अपने देश की कमियों, खराबियों की सार्वजनिक चर्चा ना करें। अन्य राष्ट्रों की तुलना में उसे हीन न बताएं। इससे देशवासियों का मनोबल बढ़ेगा। उन्हें राष्ट्र की शक्ति का बोध होगा। दूसरी ओर देश के सार्वजनिक स्थानों को स्वच्छ रखने, वाणी से मधुर बोलने तथा व्यवहार में शुद्धता देश के अंतकरण को सुंदर बनाएगी। तीसरी ओर देश के हित में यह जरूरी है कि हम अपने वोट का प्रयोग अपने विवेक से करें न की जाति, संप्रदाय या लालच वश।

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