Saturday, 9 February 2019

दहेज प्रथा एक सामाजिक कुरीति पर निबंध - UPSC Essay

दहेज प्रथा एक सामाजिक कुरीति पर निबंध

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शाप और अभिशाप दोनों समानार्थक होते हुए भी अपने में थोड़ा अन्तर छिपाये हुए हैं। शाप वस्तु विशेष, समय विशेष और हानि विशेष के लिये होता है जबकि अभिशाप जीवन में, जीवन भर गेहूं के घुन की भाँति लगा रहता है। विधि की विडम्बना है कि एक ही वृक्ष पर लगे दो पुष्पों में से एक का जो स्वरूप सुरभित और सुरम्य होता है, उसे अभिशाप समझ लिया जाता है और दूसरे को कष्टमय होते हुये भी वरदान। एक के जन्म से घर पर मौत की छाया और माता-पिता के मुख पर मलीनता की छाया, मामा-मामियों के मन पर उदासीनता की काली घटा मंडराने लगती है और दूसरे के जन्म से तवे, ढोलक और नफीरी बजने लगती हैं। अजीब और आश्चर्यजनक वैषम्य है, दो जीवात्माओं के जन्म ग्रहण करने में। विभेद और विषमता भरे ये दोनों तत्व हैं-कन्या और पुत्र। 
माँ की जिस कोख में पुत्र जन्म लेता है उसी कोख में से पुत्री जन्म लेती है पर मां स्वयं भी पुत्री के जन्म पर दुखी हो उठती है। बृजभाषा के एक लोकगीत में मां की खिन्न अभिव्यक्ति और पति को सांत्वना भरा संदेश देखिये-
लल्ली जने को सोच मत करौ, राजा जी !
अबकै मैं लल्ला जनूंगी। 
जन्म से ही माँ लड़की को 'पराया धन कहना प्रारम्भ कर देती है। उसके लालन-पालन, शिक्षा-दीक्षा, आदि सभी क्षेत्रों में दृष्टि रखी जाती है। कन्या दबी और सहमी अनुभव करती है। जबकि पुत्र उभरा और उछला हुआ। परिवार में कन्या के जन्म से ही इन उमडते-घुमड़ते बादलों के तीन कारण हैं 
(1) पराया धन होने के कारण कन्या के भावी सुखमय जीवन की चिन्तापूर्ण कल्पनायें, 
(2) दहेज,  
(3) मानव की स्वार्थी मनोवृत्ति। 
प्रथम कारण के विषय में तो महाकवि कालिदास ही 'अभिज्ञान शाकुन्तलम्' में बोल उठे हैं और लिख दिया है कि कन्या का पिता होना है कष्टकारक होता है-
पुत्रीति जाती महतीह चिन्ता, कस्मै प्रदेयित महान वितर्कः। 
दत्वा सुखं प्राप्स्यति वा नवेत्ति, कन्यापितॄत्वं खुन नाम कष्टम् ॥ 
अन्य पुरातन विद्वानों ने लिखा है कि “दुरतिक्रमा दुहितरो विपदः" अर्थात् कन्या की विपत्तियों को पार करना अत्यन्त कठिन है।

दूसरा कारण है दहेज, जिसमें माता-पिता समाज में अपनी मान-प्रतिष्ठा को बचाने के लिये तथा अपनी लड़की की सास, ननद एवं देवरानी, जेठानी के तानों से बचाने के लिए अपना सर्वस्व झौंक देते हैं। तीसरा कारण है मानव की स्वार्थी मनोवृत्ति। माता-पिता कन्या को ‘पराया धन’ समझकर अर्थात् इसे तो दूसरों के घर जाना है, यह विचार करते हुए उसके साथ उपेक्षापूर्ण व्यवहार करते हैं और पुत्र को ‘बुढापे का सहारा' समझकर जन्म से ही मान-सम्मान और लाड़-प्यार देना आरम्भ कर देते हैं। माता-पिता यह समझते हैं कि लड़का तो जीवन भर हमें कमाकर खिलायेगा, हमारे दुखों के क्षणों में सहारा होगा और इससे हमारे वंश का नाम चलेगा। भले ही पुत्र इन भावनाओं के नितान्त प्रतिकूल निकले, किन्तु फिर भी वह माता-पिता का स्नेह भाजन होता है। यह सोचकर कि मरने के बाद मरघट तक तो पहुँचा ही देगा।

माता-पिता की प्यार भरी दृष्टि और स्नेह भरे हृदय पर सबसे भयंकर वज्रपात दहेज का होता है। वैसे दहेज शब्द अरबी भाषा के ‘जहेज' शब्द से रूपान्तरित होकर उर्दू और हिन्दी में आया है, जिसका अर्थ होता है सौगात' । इस भेंट या सौगात की परम्परा भारतीय रीति-नीति में कब से प्रचलित हुई, यह सृष्टि के आदि क्षणों एवं शनैः शनैः विकासवाद की खोज के साथ जुड़ी हुई है। प्राचीन आर्य ग्रन्थों के अनुसार अग्नि कुण्ड के समक्ष शास्त्रज्ञ विद्वान् विवाह सम्पन्न कराता था तथा कन्या का हाथ वर के हाथ में देता था। कन्या के माता-पिता अपनी सामर्थ्य और शक्ति के अनुरूप कन्या के प्रति अपने स्नेह और वात्सल्य के प्रतीक के रूप में कुछ उपहार भेंट कर दिया करते थे। मनुस्मृति प्रणेता महर्षि मनु ने, ब्रह्म विवाह, दैव विवाह, आर्य विवाह, प्रजापत्य विवाह, असुर विवाह, गन्धर्व विवाह, राक्षस विवाह, पैशाच विवाह, नाम से आठ प्रकार के विवाहों का वर्णन किया है। विवाह के समय यदि कन्या-पक्ष वर-यक्ष को धन इत्यादि देता है, तो आसुर विवाह की संज्ञा दी गई है। मनु ने कहा है
जातिभ्यो द्रविणं दत्वा कन्यायै चवै शक्तितः।
कन्या प्रदानं स्वाच्छन्द्यादासुरो धर्म उच्येत ॥” 
भगवतशरण उपाध्याय ने “कालिदास का भारत” नामक ग्रन्थ में महाकवि कालिदास के समय में हर प्रथा का उल्लेख करते हुए लिखा है-“दहेज की प्रथा थी। आजकल के समान विवाह के पूर्व कोई शर्त नहीं थी। विवाह-संस्कार की समाप्ति पर वर को कन्या के अभिभावक अपनी सामर्थ्य और उत्साह (सत्यानुरूप) के अनुसार दहेज देते थे। कन्या को आभूषणों से अलंकृत कर दिया जाता था और ये आभूषण तथा बंधु-बांधुवों से मिली भेंट उसका स्त्री-घन होता था। स्वामी तुलसीदास जी ने भी रामचरितमानस में इस प्रथा का वर्णन किया है-
“कहि न जाए कुछ दाइज भूरी, रहा कनक-मणि मण्डप पूरी।” 
यह स्नेह और वात्सल्य का प्रतीक प्रेमोपहार युग परिवर्तन के साथ-साथ स्वयं से परिवर्तन होता गया। आदि युग में मातृसत्तात्मक सत्ता थी, पति-पत्नी एक युग्म में न रहकर एक समूह में रहते थे। परिवार का दायित्व माता पर रहता था। दहेज का कोई प्रश्न ही न था। इसके बाद कृषि युग में माता के स्थान पर पितृसत्तात्मकता आ गई। इसमें परिवार का दायित्व पिता पर आ गया। इस युग में वर पक्ष कुछ गाय या बैल देकर लड़की लाता था। इसी युग में मनु ने आर्य विवाह का प्रतिपादन किया। इसके पश्चात् राजतन्त्र के व्यवसाय प्रधान युग में स्त्रियाँ गृहस्वामिनी के रूप में रहीं। प्रश्न आया कि लड़की का दूसरे घर में मान-सम्मान कैसे हो? स्पष्ट है कि जिसको कुछ दिया जाता है वह वश में आ ही जाता है। सम्भव है इसी प्रलोभन के आधार पर दहेज, भात, छोछक आदि की परम्परायें पड़ी हों। आधुनिक औद्योगीकरण के अर्थ-प्रधान, वर्ग-भेद-युक्त नवीन युग में इस परम्परा ने जो विष वमन किया है वह अवर्णनीय है।

वर्तमान युग में समाज के आर्थिक वर्ग-विभाजन ने लाखों कन्याओं को मातृत्व सौभाग्य से वंचित कर दिया। हजारों कन्याओं की माँग सिन्दूर से इसलिए न भरी जा सकी, चूंकि उनके माता-पिता इतना दहेज न दे सकते थे जितना कि लड़के वाला मांगता था। धनवान, धन और अटूट दहेज के बल पर अपनी कन्या को अच्छे घर और अच्छे वर को दे सकता है पर मध्यम वर्ग का व्यक्ति अपनी कन्या को कहाँ से दे, पास में जो कुछ था वह लड़की की पढ़ाई-लिखाई में लगा दिया। इन सब आपदाओं के बावजूद उसने जो भी कुछ थोड़ा बहुत अपने जीवन में बचाया था उससे लड़के का पिता संतुष्ट नहीं हो पाता। पचासों जगह टक्कर मारने के बाद बेचारा हताश और निराश होकर घर बैठ जाता है और मौन होकर पत्नी के ताने सुनता रहता है।
गाय, बैल, घोड़े और गधों की भाँति लड़कों की बिक्री होती है, बोली लगती है, और सबसे अधिक बोली लगाने वालों का सौदा पट जाता है। गरीब मध्यम वर्ग की बालिकाये सिसकी भरकर ही अपना जीवन व्यतीत कर देती हैं। सन् 75 में साप्ताहिक हिन्दुस्तान ने इस संदर्भ में श्रृंखला प्रकाशित की थी जिसका शीर्षक था "बंधी न बन्दनवार, देह पर चढ़ी न हल्दी।“ इस लेख श्रृंखला में अनेकों अविवाहित विदुषी महिलाओं ने अन्तरतम की अनुभूतियां सन्निहित थी परन्तु उन सबमें ध्वनि एक ही थी—“माता-पिता की दहेज देने में असमर्थता।

दहेज प्रथा भारतीय संस्कृति के पवित्र भाल पर एक महान् कलुषित कलंक है, कुरीति है। रावण ने केवल एक सीता का हरण कर उसके जीवन को कष्टमय बनाया था परन्तु दहेज रूपी रावण ने न जाने कितनी कन्याओं को सौभाग्य सिंदूर से वंचित करके उनके जीवन को भी दूभर बना दिया। शिशुपाल ने केवल सोलह हजार रानियों को ही कारागार में बन्द किया था परन्तु दहेज रूपी शिशुपाल ने न जाने कितनी भारतीय कन्याओं का अपने क्रूर हाथों से गला घोंट दिया है। दहेज प्रथा मानव जाति के लिए एक अभिशाप है। इससे राष्ट्र को व्यक्तिगत और समष्टिगत हानियाँ होती हैं। दहेज प्रभाव में लड़की अयोग्य वर को सौंप दी जाती है। बेमेल विवाह ज्यादा दिन टिकाऊ नहीं होते। द्वन्द् और संघर्षों के बाद तलाक की नौबत आ जाती है। माता-पिता ऋण के बोझ से दब जाते हैं। यदि किसी प्रकार चातुर्य से लड़की को अच्छा घर और अच्छा वर मिल भी गया और वे इच्छानुकूल उसके साथ न पहुंचा, तो सास और ननद की कलह लड़की की जान ले लेती है। ससुराल में लड़की का जीवन दूभर हो जाता है। वह या तो पिता के घर वापस आ जाती है या उसे मौत का आलिंगन करना पड़ता है। कभी-कभी सास ससुर भी माया जाल रचकर उसे मौत के मुंह में पहुंचा देते हैं। विवाहित स्त्रियों की आत्महत्या संबंधी कारणों की खोज का आधार दहेज की अपर्याप्तता ही कई बार समाचार-पत्रों के माध्यम से प्रकाश में आई है। दहेज के बिना विवाह के अभाव में बहुत-सी अबोध बालिकायें वंश की मान-मर्यादा और घर की प्रतिष्ठा भी खो बैठती हैं और नारकीय जीवन व्यतीत करने लगती हैं। कभी-कभी अधिक दुःखी और हताश होकर माता या पिता स्वयं ही आत्महत्या कर बैठते हैं। ये देश की व्यक्तिगत हानियाँ हैं जो असह्य हैं।

दहेज प्रथा राष्ट्र के समष्टिगत रूप के लिए सबसे बड़ा घातक शत्रु है। पिता जब यह देखता है कि मेरी कन्या बिना धन और बिना दहेज के अच्छे घर को प्राप्त नहीं कर सकती तो वह विवश होकर भ्रष्टाचार, बेईमानी, रिश्वतखोरी, चोरी, तस्करी करता है और काला धन इकट्ठा करने पर जुट जाता है जिसका परिणाम होता है देश में आवश्यक वस्तुओं का अभाव, दुर्भिक्ष और मुद्रास्फीति। ये सामाजिक कुरीतियाँ और कुप्रथायें देश को भयंकर आर्थिक संकट के कगार पर लाकर खड़ा कर देती हैं। भारत के प्रथम एवं भूतपूर्व प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है
"These social customs will carry India towards poverty.”

महात्मा गाँधी भारत की राजनीतिक स्वतन्त्रता के साथ-साथ देश की आर्थिक, नैतिक और सामाजिक स्वतन्त्रता के भी पक्षधर थे। गाँधी जी अपने जीवन काल में दैनिक प्रार्थना सभाओं और सामाजिक सभाओं में समय-समय पर देश की कुप्रथाओं की ओर संकेत करते और जनता से उन्हें त्याग देने का संकल्प कराते। दहेज प्रथा की क्रूरता और भयावहता से क्षुब्ध होकर सन् 1928 में गाँधी जी ने कहा था- 
"दहेज की पातकी प्रथा के खिलाफ जबरदस्त लोकमत बनाया जाना चाहिये और जो नवयुवक इस प्रकार गलत ढंग से लिए गये धन से अपने हाथों को अपवित्र करें उन्हें जाति से बहिष्कृत कर देना चाहिए।' इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि यह हृदयहीन बुराई है।"
राजा राममोहन राय ने जिस प्रकार सती प्रथा को बन्द कराया था, उसी प्रकार राष्ट्रीय चेतना के अभ्युदय के साथ-साथ सामाजिक चेतना एवं जागृति के लिए भी राष्ट्र के नेताओं ने जन-जागरण प्रारम्भ किया। उधर आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द आदि समाज-सुधारकों ने भी इस राष्ट्रीय कलंक की ओर जनता का ध्यान आकृष्ट किया। पं० नेहरू ने भी इस दहेज-दानव के विनाश के लिए जनता को प्रोत्साहित किया। परन्तु अन्य महान् और विकराल समस्याओं के समक्ष इस समस्या ने गौण रूप धारण कर लिया।

वर्ग वैषम्य के साथ-साथ यह भयानक रोग समाज में बढ़ता गया। केन्द्र सरकार ने पं० नेहरू के प्रधानमन्त्रीत्व काल में सन् 1961 में दहेज निरोधक अधिनियम बनाया, परन्तु जनता के पूर्ण सहयोग के अभाव में यह कानून केवल कानून की पुस्तकों तक ही सीमित रह गया। इस अधिनियम की मुख्य-मुख्य धारायें निम्नवत् हैं
(1) दहेज केवल उस राशि को माना जाएगा जिसे वर-पक्ष के लोग दहेज के समय किसी शर्तनामे के आधार पर निर्धारित करते हैं। इसके अन्तर्गत वह धन तथा वस्तुयें शामिल नहीं हैं। जिन्हें कन्या का पिता स्वेच्छा से देता है।
(2) इस अधिनियम के अन्तर्गत दहेज लेना अथवा देना या दहेज के लेन-देन में सहायता देना अपराध घोषित कर दिया गया। प्रत्येक अपराधी को 5000 रु० तक जुर्माना और 6 माह की कैद हो सकती है।
(3) कन्या के माता-पिता से प्रत्यक्ष रूप से भी दहेज माँगना अपराध है। ऐसे अपराधी को उक्त दण्ड की व्यवस्था है।
(4) अधिनियम की धारा 6 में स्पष्ट रूप से लिख दिया गया है कि दहेज से प्राप्त होने वाली धनराशि पर कन्या का अधिकार होगा। यदि किसी प्रकार का दहेज परिवार के अन्य किसी सदस्य ने स्वीकार कर लिया है तो उसे एक वर्ष के अंदर वह धन कन्या को वापिस करना होगा।

समस्त राज्य सरकारों ने 1961 के दहेज विरोधी कानूनों में संशोधन करके नये अध्यादेश जारी किये। पंजाब, बिहार, राजस्थान और उत्तर प्रदेश आदि सभी राज्य सरकारों ने विवाह के व्यय का एक निश्चित मापदण्ड निर्धारित किया। दहेज स्वरूप धनराशि अथवा उपहारों के रूप में 3000 से 5000 रुपये तक निश्चित किये गये। अनावश्यक साज-सज्जा के खर्च में कमी लाने के लिए जनता को दिन में विवाह करने की सलाह दी गई। बारातियों की अधिकतम संख्या 25 रखी गई। सरकारी अधिकारियों, मन्त्रियों एवं राजपत्रित अधिकारियों का ऐसे आयोजनों में भाग लेने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। निमन्त्रण-पत्रों पर 'दहेज रहित संस्कार’ लिखा रहना आवश्यक है। भारत की प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने 15 फरवरी, 1976 को मावलंकार हाल, नई दिल्ली में भाषण करते हुये इस सम्बन्ध में कहा था-
"ऐसे रीति-रिवाज जो स्त्री वर्ग के लिए कष्टप्रद हैं, उन्हें नष्ट करने का हर सम्मत प्रयत्न किया जाना चाहिये। दहेज एक ऐसा रिवाज है। इस बुराई को कानून द्वारा ही समाप्त नहीं किया जा सकता, इसके लिए सामाजिक चेतना व जागृति भी बहुत आवश्यक है। यह कार्य भविष्य में बनने वाली सास अच्छी प्रकार से कर सकती है जिन्हें कि इस रिश्वत (दहेज) को लेने से इंकार कर देना चाहिये।"
(हिन्दुस्तान टाइम्स, 16 फरवरी, 1976)

देश के युवक-युवतियों से अपने विवाह में दहेज न लेने के लिए शपथ उठाने के लिए कहा गया था। महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले यवक-युवतियों ने दहेज ने लेने की शपथ ग्रहण की। कॉलेज की छात्राओं ने भी दहेज मांगने वाले युवकों से विवाह न करने की शपथ ग्रहण की। उत्तर प्रदेश के समस्त हाईस्कूल और इण्टर कॉलजों में छात्राओं ने लिखित शपथ-पत्र पर हस्ताक्षर किये कि हम दहेज न लेंगे और न अभिभावकों को लेने देंगे। ये शपथ पत्र विशाल पुस्तक के रूप में शिक्षा निदेशक, उ० प्र० लखनऊ के यहाँ एकत्रित किये गये। आर्य समाज आदि अन्य समाज सेवी संस्थायें भी इस दिशा में महान् योगदान करती हैं। अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ग के अन्तर्गत भी इस कुप्रथा के विरोध में कठोर कदम उठाये गये हैं। नेशनल फेडरेशन ऑफ इण्डिया वूमेन ने 11 अक्टूबर, 1976 को दहेज प्रथा के विरोध में प्रस्ताव पास किया था। समाचार-पत्र पत्रिका और प्रचार के अन्य साधनों द्वारा जनता को दहेज के भयानक परिणामों से अवगत कराया गया। फलस्वरूप देश के कोने-कोने में दहेज विरोधी भावनायें जनता में उत्पन्न होती जा रही हैं।

दहेज प्रथा के उन्मूलन के लिए देश के युवा वर्ग में जागृति परमावश्यक है। पुरातन रीति-रिवाजों में विश्वास रखने वाले पुराने लोगों की प्रवृत्ति में आमूल-चूल परिवर्तन होना असम्भव-सा ही है। इसके लिए दृढ़ प्रतिज्ञ होकर शिक्षित युवक-युवतियों को आगे आना चाहिये। इस दिशा में युद्ध स्तर पर सामाजिक क्रान्ति का आह्वान किया जाए, इसमें भी नेतृत्व युवा वर्ग के हाथों में ही हो। गाँव-गाँव, नगर-नगर में सभाओं का आयोजन हो तथा अनपढ़ व्यक्तियों एवं रूढ़वादी प्रवृत्ति के व्यक्तियों को दहेज के दुष्परिणामों से व्यापक रूप से परिचित कराया जाये। दहेज विरोधी कानून का सख्ती से पालन कराया जाए एवं अपराधी को कड़ा दण्ड देने की व्यवस्था की जाए। इस प्रकार धनवानों को गरीबों की गरीबी का मजाक उड़ाने से रोका जा सकता है। पर माता-पिता अधिक ध्यान दें और उन्हें आत्म-निर्भर वे अपने पैरों पर खड़े होने योग्य बनायें। अन्तर्जातीय विवाहों को भी प्रोत्साहन दिया जाए,  इससे योग्य वर मिलने में कठिनाई न होगी। प्रेम विवाहों को भी प्रोत्साहन दिया जाए परन्तु माता-पिता के परामर्श एवं पथ-प्रदर्शन में ही। पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में अधिक जागृति उत्पन्न की जाये। जहाँ दहेज लेने व देने के भी समाचार मिलें वहाँ युवा वर्ग पिकेटिंग का मार्ग ग्रहण करें और विवाह को सम्पन्न न होने दें जब तक कि ली हुई धनराशि वापस न कर दी जाए। इसके लिए गाँधी जी के सत्याग्रह का शान्तिपूर्ण शस्त्र भी कार्य में लाया जा सकता है। सामूहिक विवाह की योजना बनाई जाए, जिसमें गरीब-अमीर सभी वर्गों की कन्याओं के विवाह सम्पन्न हों।

माता-पिता की सुख-शान्ति पर तुषारापात करने वाला, बालिकाओं के सुख सुहाग पर वज्रपात करने वाला, आये दिन वधु हत्याओं और आत्म-दाहों को प्रोत्साहन देने वाला, घोड़े और बैलों के क्रय-विक्रय का यह व्यवसाय, निश्चित ही आज एक राष्ट्रीय समस्या के रूप में सरकार और जनता के समक्ष मुँह खोले खड़ा है। यदि जनता ने विशेषकर शिक्षित युवक-युवतियों ने पुरातन मनोवृत्तियों वाले माता-पिता की अवहेलना कर सरकार को हृदय से सहयोग दिया तो भारतीय संस्कृति पर लगा हुआ यह कलंक सदैव-सदैव के लिए धुल जायेगा। यदि भारत का प्रत्येक नागरिक हृदय से दहेज न लेने और न देने की प्रतिज्ञा ले ले, तब यह समस्या समाप्त हो सकती है। प्रत्येक भारतीय को यह नारा बुलन्द करना चाहिये कि “दुल्हिन ही दहेज है।”

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