Sunday, 22 July 2018

लाटी कहानी का सारांश

लाटी कहानी का सारांश

लाटी कहानी का सारांश

कथा नायक कप्तान जोशी की पत्नी को क्षय रोग हो जाना : कथानायक कप्तान जोशी अपनी पत्नी बानो से अत्यधिक प्रेम करता है। विवाह के तीसरे दिन के बाद ही कप्तान को युद्ध हेतु बसरा जाना पड़ा। तब बानो सिर्फ 16 वर्ष की थी। अपने पति की अनुपस्थिति में बानो नें 7-7 नंदों के ताने सुने, भतीजों के कपड़े धोए, ससुर के होज बुने। पहाड़ की नुकीली छतों पर पांच-पांच सेर उड़द दाल पीसकर बड़ियां बनाई आदि। उसे मानसिक प्रताड़ना दी गई कि उसका पति जापानियों द्वारा कैद कर लिया गया है और वह कभी नहीं आएगा। इन सब कारणों से निरंतर घिरती-घुलती रही। बानो क्षय रोग से पीड़ित होकर चारपाई पकड़ लेती है। (कहानी का उद्देश्य यहाँ देखें)

कप्तान का पत्नी के प्रति अगाध प्रेम : कप्तान अपनी पत्नी बानो से अत्यधिक प्रेम करता है। जब वह 2 वर्ष बाद लौट कर घर आता है तो उसे पता चलता है कि घर वालों ने बानो को क्षय रोग होने पर सेनेटोरियम अस्पताल भेज दिया है। वह दूसरे दिन ही वहां पहुंच गया। उसे देखकर बानो के बहते आंसुओं की धारा ने दो साल के सारे उलाहने सुना दिए। सेनेटोरियम के डॉक्टर द्वारा बानो की मौत नजदीक आने की स्थिति में कमरा खाली करने का उसे नोटिस दे दिया गया। कप्तान ने भूमिका बनाते हुए बानो से कहा कि अब यहां मन नहीं लगता है। कल किसी और जगह चलेंगे। वह दिन-रात अपनी पत्नी की सेवा में बिना कोई परहेज एवं सावधानी बरतें लगा रहता था।

बानो द्वारा आत्महत्या का प्रयास करना : बानो समझ गई कि उसे भी सेनेटोरियम छोड़ने का नोटिस मिल गया है, जिसका अर्थ हुआ कि अब वह भी नहीं बचेगी। कप्तान देर रात तक बानो को बहलाता रहा। उससे अपना प्यार जताता रहा। जब कप्तान को लगा कि बानो सो गई है, तो वह भी सोने चला जाता है। सुबह उठने पर बानो अपने पलंग पर नहीं मिली। दूसरे दिन नदी के घाट पर बानो की साड़ी मिली। कप्तान को जब लाश भी नहीं मिली तो उसने समझा बानो नदी में डूबकर मर गई है।

लाटी के रूप में बानो का मिलना : जब कप्तान को पूरा विश्वास हो गया कि बानो अब इस दुनिया में नहीं है, तो घर वालों के जोर देने से उसने दूसरा विवाह कर लिया। दूसरी पत्नी प्रभा से उसे दो बेटे और एक बेटी हुयी। वह भी कप्तान से अब मेजर हो गया। लगभग 10 वर्ष बाद नैनीताल में वैष्णो देवी के दल में उसे लाटी मिलती है, तो मेजर उसे पहचान लेता है। पता चलता है कि गुरुमहाराज ने औषधियों से उसका क्षय रोग ठीक कर दिया था, लेकिन इस प्रक्रिया में उसकी स्मरण शक्ति और आवाज दोनों चली गई। अब ना तो वह बोल सकती है, और ना ही उसे अपना अतीत याद है। वह वैष्णवीदेवी के दल के साथ चली जाती है और मेजर स्वयं को पहले से अधिक बूढा और खोखला महसूस करता है।

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