Saturday, 29 December 2018

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जीवन परिचय और साहित्य

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जीवन परिचय और साहित्य

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
जीवन परिचय : हिन्दी साहित्य इतिहास के सुप्रसिद्ध लेखक एवं निबंधकार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अगोना नामक गाँव में सन् 1884 ईस्वी में हुआ था। इनके पिता का नाम पंडित चन्द्रबली शुक्ल था। अपनी शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् कुछ समय तक इन्होनें मिर्ज़ापुर के विद्यालय में अध्यापक के रूप में कार्य किया था। सन् 1908 ईस्वी में उन्होनें नागरी प्रचारिणी सभा, काशी के ‘हिन्दी-शब्द-सागर’ के सह सम्पादक के रूप में कार्य किया तथा ‘नगरी प्रचारिणी’ पत्रिका का सम्पादन भी किया। कुछ समय तक इन्होनें काशी विश्वविद्यालय में हिन्दी-प्राध्यापक के रूप में भी कार्य किया था। 2 फरवरी, 1941 को इनकी मृत्यु हो गयी थी। आचार्य शुक्ल अत्यन्त सरल तथा सहज व्यक्तित्व के स्वामी थे। वे श्याम वर्ण, मंझले कद तथा लम्बी-लम्बी मूछों वाले सामान्य व्यक्तियों जैसे लगते थे। बाहर जाते समय वे पाश्चात्य वेशभूषा अर्थात् कोट, पैण्ट, टाई लगाकर निकलते थे तथा घर में धोती पहनते थे। इस प्रकार उनकी वेशभूषा में भारतीय एवं पाश्चात्य प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता था। उनकी प्रकृति अत्यन्त गम्भीर थी, परन्तु उनकी रचना धार्मिकता में व्यंग्य-विनोद की झलक भी मिलती है।

साहित्यः आचार्य रामचन्द्र शुक्ल बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार थे। उन्होंने निबंध, आलोचना, कविता, कहानी, अनुवाद कोश-निर्माण, सम्पादन, इतिहास लेखन आदि विभिन्न क्षेत्रों में अपनी योग्यता का परिचय दिया है। इन की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-  
कहानी - ग्यारह वर्ष का समय
काव्य - मनोहर छटा आदि, बुद्धचरित (अनुवादित)
निबन्ध - श्रद्धा-भक्ति 115
नाटक - हास्य विनोद, पृथ्वीराज चौहान
उपन्यास - शशांक (बंगला से अनुवादित)
इतिहास - हिन्दी साहित्य का इतिहास
निबंध - चिन्तामणी (चार भाग); जायसी, तुलसी और सूर पर लिखी भूमिकाएँ।
सम्पादन - हिन्दी शब्द-सागर, नागरी प्रचारिणी पत्रिका, तुलसी ग्रन्थावली, जायसी, ग्रन्थावली,
भ्रमरगीत-सार आदि।
आचार्य शुक्ल के निबंध-साहित्य को निम्नलिखित भागों में विभाजित कर सकते हैं-
(क) मनोविकार सम्बन्धी निबंध - चिन्तामणि, भाग एक में लेखक द्वारा रचित दस मनोविकारों सम्बंधी निबंध प्राप्त होते है, जो भावयामनोविकार, उत्साह, श्रद्धा-भक्ति, करूण, लज्जा और ग्लानि, लोभ और प्रीति, कृपा, ईर्ष्या, भय तथा क्रोध हैं। इन निबंधों में जीवन की व्यावहारिक पृष्ठभूमि और मनोवैज्ञानिक आधार पर विभिन्न मनोविकारों की व्याख्या की गई है। ये सभी निबंध लोक जीवन के लिए आदर्श हैं तथा इनमें मनोविज्ञान और नीति का सुन्दर समन्वय हुआ है। इनमें तत्कालीन समस्याओं पर कटाक्ष करते हुए उन समस्याओं को सुलझाने के लिए मौलिक सुझाव भी दिए गए हैं।

(ख) समीक्षात्मक निबंध - शुक्ल जी के सैद्धान्तिक समीक्षा सम्बन्धी चार निबंध-कविता क्या है, काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था, साधारणीकरण और व्यक्ति वैचित्र्यवाद तथा रसात्मक बोध के विविध रूप अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। ‘कविता क्या है’ में उन्होंने कविता की परिभाषा, लक्षण, प्रयोजन, शक्ति, भाषा, अलंकार, स्वरूप आदि पर विस्तार से विचार किया है।’ काव्य में लाके मंगल की साधनावस्था में यह बताया गया है कि आनन्द की दो अवस्थाएं साधना और सिद्धावस्था होती हैं। इसके साथ ही इस में लोकमंगल के विधान की विधियाँ भी बताई गई हैं। ‘साधारणीकरण और व्यक्ति वैचित्र्यवाद’ में साधारणीकरण का रस-प्रक्रिया में योगदान स्पष्ट किया गया है। ‘रसात्मक बोध के विविध रूप’ निबंध में शुक्ल जी ने साहित्य और जीवन के विभिन्न मतों, सिद्धांतों, एवं मान्यताओं का वर्णन करते हुए उस के स्वरूप और रस की व्याप्ति पर विचार किया है। व्यावहारिक समीक्षा से सम्बन्धित इन के निबंध भारतेन्दु हरिशचन्द्र तुलसी का भक्ति मार्ग, मानस की धर्म भूमि आदि हैं। इन निबंधों में उन्होनें साहित्यकार की साहित्यिक विशेषताओं के साथ-साथ उसकी धारणाओं, मान्यताओं एवं आदर्शों का भी वर्णन किया है। ‘काल में प्राकृतिक दृश्य’, ‘काव्य में रहस्यवाद’, ‘ काव्य में अभिव्यंजनवाद’ आदि निबंधों में उन्होनें काव्य के क्षेत्र में प्रचलित विभिन्न सिद्धांतों तथा मतों की समीक्षा की है।

(ग) भूमिकाओं के रूप में लिखित निबंध - रामचन्द्र शुक्ल ने तुलसी, सूर, जायसी तथा भारतेन्दु से सम्बन्धित ग्रन्थावलियों अथवा रचनाओं के संकलनों की भूमिकाओं के रूप में जो निबंध लिखे हैं उनमें इन साहित्यकारो के व्यक्तित्व और कृतित्व की उन्होनें विस्तृत विवेचना की है। इस भूमिकाओं से इन साहित्यकारों के जीवन और साहित्य का विस्तृत परिचय प्राप्त हो जाता है।

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर कह सकते हैं कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी निबंध साहित्य की अमूल्य निधि तथा इस क्षेत्र के सम्राट हैं।

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