Monday, 10 December 2018

बछेन्द्रीपाल का जीवन परिचय। Bachendri Pal Biography in Hindi

बछेन्द्रीपाल का जीवन परिचय। Bachendri Pal Biography in Hindi

नाम
बछेन्द्री पाल
जन्म
24 मई 1954
पिता
किसनसिंह पाल
माता
हंसा देवी
राष्ट्रीयता
भारतीय
व्यवसाय
पर्वतारोहण प्रशिक्षक
शेरपा तेनजिंग द्वारा एवरेस्ट विजय के ठीक इक्तीस वर्ष बाद एक बार फिर भारतीयों ने एवरेस्ट विजय का इतिहास रचा। यह अवसर था किसी भारतीय महिला द्वारा एवरेस्ट शिखर पर पहुँचने का। 23 मई, सन् 1984 का दिन सम्पूर्ण भारत एवं विशेषकर नारी जगत् के लिए गौरव और सम्मान का दिन था। इसी दिन प्रथम भारतीय महिला बछेन्द्री पाल ने एवरेस्ट की चोटी पर कदम रखा।
Bachendri Pal
परिचय : बछेंद्री पाल का जन्म सन् 24 मई 1954 को उत्तराखंड राज्य के उत्तरकाशी जिले के एक गाँव नकुरी में  हुआ। इनके पिता किसनसिंह पाल एक किसान थे। इनकी मां हंसा देवी घरेलू महिला थीं । बछेंद्री पाल माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली प्रथम भारतीय महिला हैं। वे एवरेस्ट की ऊंचाई को छूने वाली दुनिया की 5वीं महिला पर्वतारोही हैं। इन्हें बचपन से ही पर्वत बहुत आकर्षित करते थे। जब ये एम0 ए0 की पढ़ाई कर रहीं थी उनके मन में पर्वतराज हिमालय की सबसे ऊँची चोटी एवरेस्ट पर विजय प्राप्त करने की इच्छा बलवती हुई। अपने इस स्वप्न को पूरा करने के उद्देश्य से इन्होंने नेहरू पर्वतारोहण संस्थान से पर्वतारोहण का प्रशिक्षण प्राप्त किया। इन्होंने बड़ी लगन, मेहनत से पर्वतारोहण के गुर सीखे और कुशलता प्राप्त की। एवरेस्ट यात्रा से पूर्व, इन्होंने नेहरू पर्वतारोहण संस्थान द्वारा आयोजित ‘प्री-एवरेस्ट ट्रेनिंग कैम्प-कम-एक्सपीडिशन’ में भी भाग लिया।

एवरेस्ट पर्वत पर विजय : आखिरकार 23 मई सन् 1984 ई0 को वह शुभ दिन आ गया जिसका स्वप्न पाल ने बचपन से देखा था, अपने लक्ष्य को पाने के लिए कठिन परिश्रम से प्रशिक्षण प्राप्त किया था। उन्होंने पर्वत विजय करके यह सिद्ध कर दिया कि महिलाएँ किसी क्षेत्र में पुरुषों से पीछे नहीं हैं। उनमें साहस और धैर्य की कमी नहीं है। यदि महिलाएँ ठान लें तो कठिन से कठिन लक्ष्य भी प्राप्त कर सकती हैं।

एवरेस्ट विजय अभियान में बछेन्द्री पाल को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। यह साहसिक अभियान बहुत जोखिम भरा था। इसमें कितना जोखिम था इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अंतिम चढ़ाई के दौरान उन्हें साढ़े छः घंटे तक लगातार चढ़ाई करनी पड़ी। इनकी कठिनाई तब और बढ़ गई जब इनके एक साथी के पाँव में चोट लग गई। इनकी गति मंद पड़ गई थी तब ये पूरी तेजी से आगे नहीं बढ़ सकती थीं, फिर भी ये हर कठिनाई का साहस और धैर्य से मुकाबला करते हुए आगे बढ़ती रहीं। अन्ततः 23 मई, सन् 1984 को दोपहर एक बजकर सात मिनट पर वे एवरेस्ट के शिखर पर थीं। इन्होंने विश्व के उच्चतम शिखर को जीतने वाली सर्वप्रथम पर्वतारोही भारतीय महिला बनने का अभूतपूर्व गौरव प्राप्त कर लिया था।

एक प्रेसवार्ता में जब सुश्री बछेन्द्री पाल से यह पूछा गया कि ‘‘एवरेस्ट पर पहुँचकर आपको कैसा लगा ?’’ इन्होंने उत्तर दिया- ‘‘मुझे लगा मेरा एक सपना साकार हो गया।’’ बछेन्द्री पाल ने एक पुस्तक भी लिखी है, जिसका नाम है ‘एवरेस्ट-माई जर्नी टू द टॉप’।

एवरेस्ट विजय के पहले सुश्री बछेन्द्री पाल एक महाविद्यालय में शिक्षिका थीं। लेकिन एवरेस्ट की सफलता के बाद भारत की एक ‘आयरन एण्ड स्टील कम्पनी’ ने इन्हें खेल सहायक की नौकरी की खुद पेशकश की। इन्होंने इस आशा के साथ यह प्रस्ताव स्वीकार किया कि यह कम्पनी इन्हें और अधिक पर्वत शिखरों पर विजय पाने के प्रयास में सहायता, सुविधा तथा प्रेरणा प्रदान करती रहेगी। इस समय सुश्री पाल ‘टाटा स्टील एडवेन्चर फाउन्डेशन’ नामक संस्था में नई पीढ़ी के पर्वतारोहियों को प्रशिक्षण देने का कार्य कर रहीं हैं।

सम्मान/पुरस्कार
  • भारतीय पर्वतारोहण फाउंडेशन से पर्वतारोहण में उत्कृष्टता के लिए स्वर्ण पदक (1984)[7]
  • पद्मश्री(1984) से सम्मानित।
  • उत्तर प्रदेश सरकार के शिक्षा विभाग द्वारा स्वर्ण पदक (1985)।
  • अर्जुन पुरस्कार (1986) भारत सरकार द्वारा।
  • कोलकाता लेडीज स्टडी ग्रुप अवार्ड (1986)।
  • गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स (1990) में सूचीबद्ध।
  • नेशनल एडवेंचर अवार्ड भारत सरकार के द्वारा (1994)।
  • उत्तर प्रदेश सरकार का यश भारती सम्मान (1995)।
  • हेमवती नन्दन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय से पी एचडी की मानद उपाधि (1997)।
  • संस्कृति मंत्रालय, मध्य प्रदेश सरकार की पहला वीरांगना लक्ष्मीबाई राष्ट्रीय सम्मान (2013-14)

महिलाओं द्वारा पर्वतारोहण का सिलसिला बछेन्द्री पाल के बाद रुका नहीं। उनसे प्रेरणा पाकर हरियाणा के इंडोतिब्बत पुलिस बल के अधिकारी पद पर कार्यरत सुश्री संतोष यादव ने सन् 1992 ई0 और 1993 ई0 में लगातार दो बार एवरेस्ट की सफल चढ़ाई की।

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