Monday, 30 July 2018

महाकवि सूरदास का जीवन परिचय

महाकवि सूरदास का जीवन परिचय

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जीवन परिचय : महाकवि सूरदास हिंदी साहित्य कोश के सूर्य माने गए हैं। वह बृज भाषा के कवियों में बेजोड़ माने जाते हैं। अष्टछाप के कवियों के तो वे सिरमौर ही थे। कृष्ण भक्त कवियों में भी उनकी क्षमता का कोई दूसरा कवि दिखाई नहीं पड़ता। इनके जन्मकाल के विषय में मतभेद है। भारतीय विद्वानों की यह परंपरा रही है कि वह अपने नाम से नहीं। अपितु अपने काम से अमर होना चाहते हैं। यही कारण रहा है जिसके चलते भारतीय साहित्यकारों के जन्म से जुड़े हुए प्रसंग सदैव विवादास्पद रहे हैं। सूरदास जी का जन्म वैशाख शुक्ल षष्ठी, संवत 1535 (1478) ईसवी को मथुरा-आगरा मार्ग पर स्थित रुनकता (रेणुका क्षेत्र) ग्राम में हुआ था। कुछ विद्वान इनका जन्म दिल्ली के निकट सीही नामक ग्राम में हुआ मानते हैं। यह सारस्वत ब्राह्मण रामदास के पुत्र थे। इनकी माता के विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं है। यह जन्म से अंधे थे या बाद में नेत्रहीन हुए, इस संबंध में भी विवाद है। इन्होंने प्रकृति के नाना प्रकारों, मानव स्वभाव एवं चेष्टाओं आदि का जैसा सूक्ष्म एवं ह्रदयग्राही वर्णन किया है। उससे यह जान पड़ता है कि यह बाद में नेत्रहीन हुए।

आरंभ से ही इनमें भगवान के प्रति भक्ति की भावना थी। मथुरा के निकट गऊघाट पर यह भगवान के विनय के पद गाते हुए निवास करते थे। यही इनकी महाप्रभु वल्लभाचार्य से भेंट हुई। जिन्होंने इनके सरस पद सुनकर इन्हें अपना शिष्य बनाया और गोवर्धन पर स्थित श्री नाथ जी के मंदिर का मुख्य कीर्तनिया नियुक्त किया। यहीं पर इन्होंने श्रीमद्भगवत में वर्णित कृष्ण चरित्र का ललित पदों में गायन किया। महाप्रभु वल्लभाचार्य जी का भक्ति संप्रदाय पुष्टिमार्ग कहलाता है। एक मात्र भगवान की कृपा पर ही निर्भरता को सिद्धांत रूप में ग्रहीत करने के कारण ही यह पुष्टि संप्रदाय कहलाता है। गुरु के प्रति  इनकी अगाध श्रद्धा थी, अंत समय में इन्होंने अपने दीक्षा गुरु महाप्रभु वल्लभाचार्य का स्मरण निम्नलिखित शब्दों में किया है।
भरोसो दृढ इन चरनन करो।
श्रीबल्लभ-नखचंद्र-प्रभा बिनु सब जग माँझ अँधेरो।। 

श्री वल्लभाचार्य की मृत्यु के उपरांत उनके पुत्र गोस्वामी विट्ठलनाथ जी ने पुष्टिमार्ग के 8 सर्वश्रेष्ठ कवि एवं गायकों को लेकर अष्टछाप की स्थापना की। सूरदास का इनमें सबसे प्रमुख स्थान था। गोवर्धन के निकट पारसोली ग्राम में इनकी मृत्यु संवत 1640 (सन 1583 ईस्वी) में हुई। कहते हैं कि मृत्यु के समय उन्होंने यह पद गाकर प्राण त्यागे।
'खंजन नैन रूप रस माते।' 

साहित्यिक सेवाएं : सूरदास ने भगवान के लोकरंजक संसार को आनंदित करने वाले रूप को लेकर उनकी लीलाओं का गायन किया है। तुलसी के समान उनका उद्देश्य संसार को उपदेश देना नहीं था, अपितु उसे कृष्ण की मनोहारिणी लीलाओं के रस में डुबोना था। वल्लभाचार्य जी के शिष्य बनने से पहले सूर विनय के पद गाया करते थे। जिनमें दास्य की भावना की प्रधानता थी। इनमें अपनी दीनता और भगवान की महत्ता का वर्णन रहता था।
(क) मो सम कौन कुटिल खल कामी।
(ख) हरि मैं सब पतितन को राऊ।
किंतु पुष्टिमार्ग में दीक्षित होने के उपरांत सूर ने विनय के पद गाने के स्थान पर कृष्ण की बाल्यावस्था और किशोरावस्था की लीलाओं का बड़ा ह्रदयहारी वर्णन किया है।

कृतियां : सूरदास की कीर्ति का मुख्य आधार उनका सूरसागर ग्रंथ है, इसके अतिरिक्त सूरसारावली और साहित्य लहरी भी उनकी रचनाएं मानी गई हैं। यद्यपि कतिपय विद्वानों ने इनकी प्रमाणिकता में संदेह प्रकट किया है। सूरसागर में श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध की कृष्ण लीलाओं का विविध भाव भंगिमाओं में गायन किया गया है।

साहित्य में स्थान : सूरदास के कृतित्व और महत्व की अनेक प्रशस्तियों से हिंदी साहित्य भरा पड़ा है।
सूर सूर तुलसी ससी, उडुगन केशवदास। 
अबके कवि खद्योत सम, जहँ तहँ करत प्रकास ।।
यदि इसे अतिशयोक्ति भी माने तो कम से कम इतना तो निसंकोच कहा कि जा सकता है कि तुलसीदास के समान व्यापक काव्य क्षेत्र न चुनने पर भी सूर ने अपनी सीमित क्षेत्र - वात्सल्य और श्रृंगार का कोई कोना ऐसा ना छोड़ा, जो उनके संचरण से अछूता रह गया हो। वह निर्विवाद रुप से वात्सल्य और श्रृंगार रस के सम्राट हैं।

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