Sunday, 24 June 2018

बंदर बने माली - जातक कहानी

बंदर बने माली - जातक कहानी

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एक समय की बात है एक राजा ने खुशी के मौके पर अपने सभी कर्मचारियों को छुट्टी दे दी। सभी कर्मचारी खुशी-खुशी छुट्टी मनाने चले गए पर राजमहल का माली नहीं गया। माली सोच में पड़ गया, "यदि मैं चला जाऊंगा तो बेचारे पेड़-पौधे सब सूख जाएंगे। क्या करूं ?"

कुछ विचार करने के बाद वह बगीचे में रहने वाले बंदरों के पास गया। उसने बंदरों के मुखिया से कहा, "आप सब बगीचे में स्वतंत्र रुप से रहते हो, फल, बीज जितना चाहिए, उतना खा लेते हो। पेड़ों के बीच झूलते हो, खेलते-कूदते हो। क्या आप लोग मेरी मदद करोगे ? मुखिया ने तुरंत हामी भरते हुए कहा, "अवश्य करेंगे ! हमें क्या करना है बताइए ?"

माली ने उत्तर दिया, "तुम सबको मिलकर यहां के पेड़-पौधों को पानी देना होगा। धूप कम होने के बाद शाम को पानी देना होगा। " माली ने उन्हें सावधान किया, "पर ध्यान रखना पानी ठीक मात्रा में देना। जरूरत से ज्यादा नहीं। " फिर वह निश्चिंत होकर गांव चला गया।

शाम होते ही पानी के घड़े लेकर बंदर चुस्ती से काम पर लग गए। बंदरों के मुखिया ने चेतावनी दी, "हर पौधे को सही मात्रा में पानी देना। " एक बंदर ने पूछा, "हमें कैसे मालूम पड़ेगा कि हमने पौधे को सही मात्रा में पानी दिया है कि नहीं ?"

मुखिया सोच में पड़ गया, फिर उसने बोला - हर एक पौधे को जड़ से उखाड़ कर उन की जड़ को देखो। लंबी जड़ वाले पौधे को ज्यादा पानी देना, छोटी जड़ वाले पौधे को कम पानी देना। यह सुनते ही बंदरों ने एक-एक करके सारे पौधे उखाड़ दिए। अगले दिन माली काम पर लौट आया। अफसोस ! सभी पौधे जमीन पर मुरझाए पड़े थे। 

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