Monday, 23 July 2018

शिवरात्रि पर निबंध। Essay on Shivratri in Hindi

शिवरात्रि पर निबंध। Essay on Shivratri in Hindi

फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी को यह पर्व मनाया जाता है। निर्जल व्रत, रात्रि जागरण चार पहरों की पूजा, दूध से शिवलिंग का अभिषेक, शिव महिमा का कीर्तन इस दिन पूजा अर्चना के मुख्य अंग हैं।

शिवरात्रि का पर्व व्रतों का नरेश कहा जाता है। ‘शिवरात्रि व्रतं नाम सर्व पाप प्रणाशनम’ के अनुसार शिवरात्रि व्रत सर्व पापों को नष्ट करने वाला है। इतना ही नहीं यह व्रत व्रती को कामधेनु, कल्पवृक्ष और चिंतामणि के समान मनोवांछित फल देने वाला है। ‘मुक्ति भक्ति प्रदायकम’ के अनुसार भोगों तथा मोक्ष का प्रदाता है। स्कंद पुराण के अनुसार जो मनुष्य इन तिथि को व्रत करके जागरण करता है और विधिवत शिव की पूजा करता है उसे फिर कभी अपनी माता का दूध नहीं पीना पड़ता, वह मुक्त हो जाता है। ज्योतिष के अनुसार अमावस्या में सूर्य चंद्रमा के समीप होता है अतः उस समय जीवन रूपी चंद्रमा का चित्र रूपी सूर्य के साथ सहयोग होने से इष्ट सिद्धि की प्राप्ति होती है।

शिवरात्रि शिव पार्वती के विवाह का दिन है। शिव पार्वती के मिलन की रात है, शिव शक्ति पूर्ण समरस होने की रात है। इसलिए शिव ने पार्वती को वरदान दिया- ‘आज शिवरात्रि के दिन जहां कहीं तुम्हारे साथ मेरा स्मरण होगा वहां उपस्थित रहूंगा’।

डॉ विद्यानिवास मिश्र कहते हैं ‘लोग प्रायः उपस्थिति का मर्म नहीं समझते। सामान्य उपस्थिति सत्ता रूप में तो हर क्षण हर जगह है ही पर भाव रुप में उपस्थित मांग करती है स्थल भावित हो, व्यक्ति भावित हो और समय भावित हो। शिवरात्रि के दिन इसी से काशी में भगवान श्री विश्वनाथ के यहां तीनों प्रभूत परिमाण में भावित मिलते हैं। इतने दिनों से काशी में इतने असंख्य श्रद्धालु बाबा विश्वनाथ की शरण में भाव से भरे आते हैं उन सब का भाव आज के दिन उच्छल नहीं होगा।‘

अपनी पत्नी पार्वती सहित कैलाश पर्वत करते हैं। उनका सारा शरीर भस्म से विभूषित है ।पहनने-बिछाने में वे व्याघ्र चर्म का प्रयोग करते हैं। गले में सर्प और कंठ नरमुंड माला से अलंकृत है। उनके सिर पर जटा जूट हैं जिसमें द्वितीय का नवचंद्र जटित है। इसी जटा से जगत पावनी गंगा प्रवाहित होती है। ललाट के मध्य में उनका तीसरा नेत्र है जो अंतर्दृष्टि और ज्ञान का प्रतीक है। इसी से उन्होंने काम का दहन किया था। उनका कण्ठ नीला है। एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरु शोभायमान है। वे ध्यान और तपोबल से जगत को धारण करते हैं।

सर्व विघ्नविनाशक गणेश और देव सेनापति कार्तिकेय शंकर जी के दो पुत्र हैं। भूत और प्रेत इनके गण हैं। नंदी नामक बैल इनका वाहन है। कृषि-भू भारत में बैल का अनन्य स्थान है। ‘उक्षाधार पृथिवीम्’ अर्थात समूची धरती बैल के सहारे स्थित है, कहकर वृषभ का वेद में गुणगान हुआ है।

शिव को भारतीय संस्कृति के समन्वयवादी रूप में स्मरण किया जाता है जिनके तेज से जन्मतः विरोधी प्रकृति के शत्रु भी मित्रवत वास करते हैं। पार्वती का सिंह शिव के नंदी बैल को कुछ नहीं कहता। शिव पुत्र कार्तिकेय का वाहन मोर शिव के गले में पड़ा सांप को कभी छूता तक नहीं। शिव के गण वीरभद्र का कुत्ता गणेश के चूहे की ओर ताकता तक नहीं। परस्पर विरोधी भाव को छोड़कर सभी आपस में सहयोग तथा सद्भाव से रहते हैं।

शिव मंदिरों में शिवलिंग पूजन का प्रसंग गंभीर एवं रहस्यपूर्ण है। पदम पुराण के अनुसार ऋषियों का आराध्य देव कौन है इसके निश्चयार्थ ऋषि शिव के पास पहुंचे। शिव भोग-विलास में व्यस्त थे। अतः द्वार पर ही ऋषियों को रोक दिया गया। मिलने में विलंब होने के कारण भृगु मुनि ने शिव को श्राप दिया कि तुम योनि रूप में प्रतिष्ठित हो तब से शिव लिंग-रूप में पूजित हैं। डॉ राजबली पांडेय का कथन है कि ‘शिवलिंग शिव का प्रतीक है जो उनके ज्ञान और तेज का प्रतिनिधित्व करती है।’

शिवरात्रि के दिन शिव मंदिरों को सजाया जाता है। बिल्व पत्रों तथा पुष्पों से अलंकृत किया जाता है। शिव की अनेक मनमोहक झांकियां दिखाई जाती हैं। गंगावतरण की झांकी, शिव का प्रलयंकारी रूप, शिव परिवार का दृश्य, इन झांकियों में प्रमुख हैं। विद्युत की चकाचौंध से झांकियों और वातावरण को चमत्कृत किया जाता है।

हिंदू जन महाशिवरात्रि के दिन शिव के प्रति श्रद्धा भावना व्यक्त करने के लिए उपवास रखते हैं। मंदिरों में जाकर शिवलिंग पर दूध, बेलपत्र तथा कमल और धतूरे के पुष्प, मंदारमाला चढ़ा कर धूप-दीप नैवेद्य अर्पित कर पूजा अर्चना करते हैं। भजन कीर्तन में भाग लेते हैं। प्रवचन सुनते हैं। ह्रदय-हारी झांकियों को देखकर आत्मा को तृप्त करते हैं। मंदिरों में अपार भीड़ और धका-पेल आज भी शिव के प्रति अपार श्रद्धा का ज्वलंत प्रमाण है। मंदिरों की भव्यता और आकर्षक झांकियों के दर्शन के लिए श्रद्धालु विभिन्न मंदिरों में जाकर अपने को कृतार्थ करते हैं।

महर्षि दयानंद द्वारा स्थापित आर्य समाज के मतावलंबी महाशिवरात्रि को ‘ऋषि बोधोत्सव’ रूप में मनाते हैं। बालक मूलशंकर को शिवरात्रि के जागरण में शिवलिंग पर गणेशवाहन चूहे को देखकर बोध हुआ ‘पुराणोक्त कैलाश-पति परमेश्वर का वाश शिवलिंग में नहीं हो सकता। यदि होता तो वे मूषक प्रतीक स्पर्श से रोकते।‘ उनमें ज्ञान का उदय हुआ। वे मूर्ति पूजा के विरुद्ध हो गए। शिवरात्रि के दिन आर्य समाजों की ओर से जलसे सभाएं आयोजित होते हैं। हवन-यज्ञ होते हैं। महर्षि दयानंद के महान कार्यों पर प्रवचन, भाषण होते हैं।

शिवरात्रि पर भगवान शंकर की पूजा तथा भक्ति की श्रद्धा और आस्था का पर्व है। पाचन प्रक्रिया के उद्धार और आत्म शुद्धि निमित्त व्रत का महत्व है। पूजा अर्चना से उत्पन्न मन की शांति और धैर्य का जनक है। यह पाप कृत्यों के प्रक्षालन का दिन है। भावी जीवन में कल्याण, मंगल, सुख और शांति प्राप्तत्यर्थ अभ्यर्थना का पावन प्रसंग है। शिव पार्वती की वंदना का महत्व तुलसी के शब्दों में देखिए-
भवानी शंकरौ वंदे, श्रद्धाविश्वास रूपणौ। 
याभ्यां बिना ना पश्यन्ति सिद्धः स्वान्तः स्थमीश्वरम्।।


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