Thursday, 15 July 2021

Hindi Essay on "Gandhian Philosophy", "गांधीवाद पर निबंध", "गांधी दर्शन पर निबंध"

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गांधीवाद पर निबंध : गाँधी जी ने जिन सिद्धांतों का प्रतिपादन किया उनका पालन ही गांधीवाद कहलाता है। आज समस्त विश्व गाँधीजी के सिद्धान्तों को मान्यता प्रदान कर रहा है और उनकी जन्म शताब्दी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मनाई जा रही है। परन्तु हम गाँधीजी के सिद्धान्तों को ठीक प्रकार से नहीं समझ पा रहे हैं, इतना ही नहीं हम उनके प्रति शंकालु और सन्देहशील होकर यहाँ तक कह बैठते हैं कि गाँधीवादी-विचारधारा को गहरे गड्ढे में सदा सर्वदा के लिए गाड़ देना चाहिए। लोगों का कहना है कि गाँधीवाद  द्वारा समाज का न अब तक कुछ भला हो सका है और न भविष्य में उसके द्वारा कुछ भला होने की सम्भावना है । इसी मनोवृत्ति को लक्ष्य करते हुए यह लोकोक्ति चल पड़ी है कि-मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी है।

गाँधीवादी का अर्थ 

गांधीवादी विचारधारा के अर्थ को ठीक तरह से समझने का प्रयत्न बहुत कम लोगों ने किया । भारतवर्ष में तो स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद इनके प्रति उपेक्षा का वातावरण ही बन गया है और उसको व्यवहार में लाने का बहुत कम प्रयत्न किया गया है। गाँधीवाद सही अर्थ में हमें जीवन के कुछ मूल्य ही नहीं देता है, बल्कि व्यावहारिक जीवन का तर्कपूर्ण एवं न्यायसंगत मार्ग भी बताता है । उसको अपनाना या न अपनाना हमारे ऊपर निर्भर है।

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अन्य जीवन दर्शन परिधि से केन्द्र की ओर जाना चाहते हैं जबकि गाँधीवादी जीवन केन्द्र से परिधि की ओर जाता है । अर्थात् गांधीवाद के मान्यता यह है कि समाज को सुखी बनाने के लिए व्यक्ति को सुखी बनाना होगा। सुखी होने के लिए व्यक्ति को अपना सुधार अथवा आत्म-विकास करना होगा। व्यक्ति के विकास को ध्यान में रखते हुए ही उन्होंने 'सत्य और अहिंसा' पर आधारित अपने जीवन दर्शन-गाँधीवाद का प्रतिपादन किया था।

"भय से मुक्ति और स्वतन्त्रता की प्राप्ति के लिए मानव सदा संघर्ष करता चला आया है । गाँधीवाद भय से मुक्ति और मानसिक स्वतन्त्रता का सन्देश देता है ।"

गाँधीवाद सत्यानुभव पर आधारित है और जीवनमात्र में शुद्ध-बुद्धि आत्मा का दर्शन करता है और जीवन में आध्यात्मिकता एवं नैतिकता को सब कुछ मानता है। प्रत्येक व्यक्ति का अपना निजी 'सत्य' है और उसको जीवन में ढालना उसका धर्म है। सत्यानुभूति पर आधारित आचरण का नाम 'अहिंसा' है। इस प्रकार गाँधीवाद हमको निर्भय होकर धर्माचरण का सन्देश देता है । हम यदि यह समझते हैं कि विश्व में सत्य-अहिंसा, प्रेम, अपरिग्रह, मैत्री, मानवता आदि उदात्त गुणों की आवश्यकता है तो हम सहज ही यह स्वीकार करते हैं कि विश्व को गाँधीवाद की आवश्यकता है और उसका भविष्य सर्वथा उज्ज्वल है।

विपक्षी में आत्म-तत्व का दर्शन करके सर्वथा सद्भावनापूर्ण बना रहना साधना का विषय है। यह साधना कायरों का नहीं, कष्ट सहिष्णु वीरों का धर्म है। अन्त तक कष्टों को हँसते हुए झेलते रहना और मन को मैला न होने देना सच्ची वीरता है। इसी कारण गाँधीजी प्रायः कहा करते थे कि - 

सत्याग्रही की कभी हार नहीं होती है । अहिंसा और कायरता का कोई मेल नहीं, सच्ची अहिंसा युद्ध निर्माता के बिना असम्भव है । 

गांधीवाद और विश्व शांति 

विध्वंसकारी एटम बम्ब के युग में जबकि युद्ध का दानव अपनी चरम सीमा को प्राप्त हो चुका है, विश्व वंद्य बापू का सत्य-अहिंसा का सन्देश ही हमें शान्ति प्रदान करता है और यही मार्ग विश्व-मानव को भयमुक्त कर सकता है । गाँधी जी द्वारा प्रतिपादित सत्य-अहिंसा के मार्ग पर चल कर हम न्यूक्लिअर अस्त्रों और उनके कुप्रभावो के भय से मुक्त हो सकते हैं। गाँधीजी की अहिंसा के बिना लोकतन्त्र की सुरक्षा असम्भव है । सत्य और अहिसा से रहित लोकतन्त्र का भविष्य सर्वथा सुरक्षित ही समझना चाहिए। इसी सत्य एवं अहिंसा के मार्ग पर चलने वाले नीग्रो गाँधी मार्टन लुथर किंग नीग्रो समाज को अधिकार दिलाने में सफल हुए थे भले ही वह स्वयं इस प्रयत्न में शहीद हो गए। उनका यह विश्वास आज भी अमर है"We shall overcome some day."

अणुबम के इस युग में लोग गाँधीजी की अहिंसा को सशंक दृष्टि से देखने लगते हैं। मेरा विचार है कि वे यदि अहिंसा शब्द की व्यापकता को समझने का प्रयत्न करें, तो वे निराश नहीं होंगे । अहिंसा जीव हिंसा अथवा मांस भक्षण तक सीमित नहीं है । अहिंसा का अर्थ है हम मन, वचन अथवा कर्म द्वारा किसी को किसी प्रकार का कष्ट न पहुंचाएँ । हम मन से किसी का अहित न सोचें, वाणी द्वारा किसी से कोई अप्रिय बात न कहें तथा हाथ-पाँव द्वारा किसी को शारीरिक कष्ट न पहुँचाएँ में ऐसा कौन व्यक्ति होगा जो एक ऐसे समाज की स्थापना न करना चाहेगा जिस सब लोग परस्पर प्रेम-प्रीति का व्यवहार करें और किसी को किसी प्रकार का कष्ट न पहुँचाएँ।

आधुनिक समाज और गांधीवाद 

अत्यधिक वैज्ञानिक उन्नति एवं सुख-सुविधाओं के साधनों को देखकर हम भारतवासी भ्रमित हो गए हैं, वैज्ञानिक चकाचौंध को देखकर हम समझने लगे हैं कि भौतिक विकास ही सब कुछ है । परन्तु यदि हम उन देशों की ओर देखें जिन्हें हम उन्नत और विकासशील मानते हैं तो हमारी समझ में आ जाए कि भौतिकवाद हमको सुख-शान्ति नहीं दे सकता है । आजकल अमरीका में हमें भौतिक उन्नति चरम सीमा पर दिखाई देती है। वहाँ की आधुनिक सभ्यता का विकास प्रायः हमारी ईर्ष्या का विषय बन चुका है। वहाँ की 'Press button civilizations' को देखकर हम अमरीका को आदर्श देश और वहाँ की सभ्यता को आदर्श सभ्यता मानने लगे हैं। परन्तु हम भूल जाते हैं कि वहाँ के निवासी अपने जीवन में एक प्रकार की घुटन और बेचैनी अनुभव करने लगे हैं। वहाँ के जागरूक व्यक्तियों का एक बहुत बड़ा वर्ग इसके विरुद्ध विद्रोह कर उठा है। वीटल्स, वीनिवस, हिप्पीज, हरे राम हरे कृष्ण आदि

आंदोलन इसी असंतोष एवं विद्रोह को प्रकट करते हैं। इन्हें देखकर हम सहज ही समझ सकते हैं कि मानव के लिए भौतिक सुख-समृद्धि ही सब कुछ नहीं है, वह इसके अतिरिक्त भी कुछ चाहता है, और यह है आत्मिक-सुख संतोष । गाँधीवादी चिन्तन हमें सहज रूप से आत्मिक-सुख और शांति प्रदान करता है । अतः यह स्पष्ट है कि आज के वैज्ञानिक और भौतिकता प्रधान युग में गाँधीवाद की जैसी आवश्यकता है वैसी पहले कभी नहीं थी।

गाँधीजी ने राजनीति में नैतिकता का समावेश किया और हृदय परिवर्तन द्वारा शत्र पर विजय प्राप्त करने की नीति अपनाई। उन्होंने अंग्रेजों के प्रति अहिंसा का व्यवहार करते हुए उनका विरोध किया। यह एक ऐसा प्रयोग या जिसको देखकर विश्व चकित है । गाँधी जी द्वारा प्रतिपादित सत्य को अपनाकर हम समस्त अन्तराष्ट्रीय समस्याओं को शीघ्र ही सुलझा सकते हैं। यदि विश्व-मानव सत्य के मार्ग पर चले तो विभिन्न देशों में होने वाले संघर्षों की उग्रता बहुत कुछ अपने आप कम हो जाए और वसुधैव कुटुम्बकम का स्वप्न साकार प्रतीत होता हुआ दिखाई देने लगे ।

गांधीवाद और रामराज्य 

सत्य और अहिंसा पर आधारित गाँधीजी का शासनतन्त्र राम राज्य की स्थापना का स्वप्पन' देखता है। उनकी मान्यता थी कि “That governmet is the best which governs the least." आधुनिक राजनीति की शब्दावली में जिसे कल्याणकारी राज्य (welfare state) कहते हैं, वही गाँधीवाद का राम राज्य है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को आवश्यकता की वस्तुएँ प्राप्त होंगी, सब सुख-संतोपपूर्वक रहेंगे और परस्पर प्रेम व्यवहार का जीवन व्यतीत करेंगे। शासक और शासिदल अपने दृष्टिकोण में थोड़ा सा परिवर्तन करके सर्वकल्याणकारी समाज की सहज ही स्थापना कर सकते हैं। इसी आदर्श को व्यावहारिक रूप देने के लिए गाँधीजी ने सर्वोदय आन्दोलन चलाया था। व्यक्ति और समाज को सर्वतोमुखी उन्नति ही सर्वोदय है। सर्वोदय का अर्थ है सप्त प्रकार की उन्नति-स्वास्थ्य, सम्पत्ति, साहित्य, सभ्यता, संस्कृति, सद्बुद्धि और सद्भावना । ऐसा कौन व्यक्ति होगा जो इस प्रकार सप्तपर्णी उन्नति की कामना नहीं करेगा, ऐसा कौन सा देश अथवा काल होगा जब सर्वोदयी सुख-समृद्धि को स्पृहा की दृष्टि से नहीं देखा जाएगा?

गांधीवाद और मद्यनिषेध 

आज अनेक देशों में मद्य-निषेध एवं जीवहिंसा के विरुद्ध आन्दोलन हो रहे हैं। मद्य-निषध सम्बन्धी कानून लागू किए जा रहे हैं, तथा इन आन्दोलनों के प्रति विश्वास उत्पन्न करने के लिए सत्याग्रह द्वारा हृदय परिवर्तन का मार्ग अपनाया जा रहा है। लन्दन में 'School of nonviolence' के निर्देशक और प्रसिद्ध गाँधीवादी विद्वान रेवरेन्ड कालेन हैजैट्स मद्य निषेध के लिए सराहनीय कार्य कर रहे हैं। उनका कहना है कि "तीस-तीस वर्ष से अभ्यस्त शराबियों को दो वर्ष में मद्य-निषेधी बना देना अहिंसा से ही सम्भव है।" दुनियाँ के लोगों को विश्वास हो चला है कि हिंसा के द्वारा प्राप्त अधिकार और स्वतन्त्रता अस्थायी रहते हैं और वे प्रतिशोध की भावना उत्पन्न करते हैं। परन्तु अहिंसा एवं हृदय परिवर्तन द्वारा प्राप्त किए जाने पर वे ही स्थायी बन जाते हैं और परस्पर मैत्री-भाव उत्पन्न करते हैं ।

गांधीवादी अर्थशास्त्र 

अर्थशास्त्र में भी उन्होंने व्यक्ति की स्वतन्त्रता का प्रतिपादन किया। उनके अनुसार आर्थिक शोषण से बचने का एक ही उपाय है कि व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं को कम करे और प्रत्येक हाथ को काम मिले जिससे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति कम से कम परावलम्बी रह जाए।

गाँधीजी का चरखा उनको अर्थनीति का प्रतीक है। उनका कहना था कि हमारे उद्योग मानव प्रधान होने चाहिए, न कि मशीन प्रधान । मशीनों के द्वारा उत्पादन की मात्रा तो बढ़ती है, परन्तु मानव श्रम का महत्व कम होता है। गाँधी जी चाहते थे कि मानव की कदर मानव के रूप में हो। इसी कारण वह मानव को Commercial न मान कर एक Spiritual animal मानते थे। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि-"Today machine merely helps a few to ride on the back of million. The impetus behind it all is not the philanthropy to save labour but greed."

औद्योगिक विकेन्द्रीकरण को लक्ष्य करके उन्होंने ग्रामोत्थान का आन्दोलन चलाया और कुटीर उद्योग-धन्धों की अर्थ नोति पर बल दिया । यदि प्रत्येक व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार उत्पादन करे तो आर्थिक शोषण और बेकारी की समस्या स्वयं हल हो जाए। जापान का उदाहरण हमारे सामने है। वहाँ प्रत्येक व्यक्ति उत्पादन करता है, परिणाम यह हुआ है कि जापान स्वयं भी समृद्ध हो गया और औद्योगिक जगत पर छा गया है।

कुछ लोग रूस के समाजवाद का उदाहरण देकर राष्ट्रीयकरण की नीति का समर्थन करते है। वे भूल जाते हैं कि भारतवर्ष रूस की भाँति एक कम्यूनिष्ट राष्ट्र नहीं है अतः यहाँ पर लक्ष्मण रेखाएँ खींचकर उत्पादन और विकिरण का विभाजन सम्भव नहीं है। गाँधीजी का समाजवाद वस्तुतः भारतवर्ष के ऋषियों द्वारा प्रतिपादित समाजधर्म का ही एक नवीन संस्करण है, जिसमें पूँजीपति सम्पत्ति का स्वामी न होकर संरक्षक मात्र हो। गाँधी जी के अर्थ शास्त्र में प्रत्येक प्राणी के पूर्ण हित का ध्यान रखा जाता है जबकि आधुनिक युग के श्रेष्ठतम अर्थशास्त्रीय greatest good of the greatest number की सीमा से आगे नहीं सोच सके हैं। गाँधी जी की अर्थनीति मे सम्पत्ति और सत्ता के केन्द्रीकरण के लिए कोई स्थान नहीं है।

अन्य देशों में समाजवाद के असफल प्रयोग देखने के पश्चात् भी हमारी समझ में यह बात आ जानी चाहिए कि गाँधीजी की अर्थनीति ही सुखी समाज की रचना कर सकती है। यदि हमारा प्रत्येक गाँव आर्थिक दृष्टि से एक स्वतंत्र इकाई बन जाए और उत्पादन विकेन्द्रीकृत हो जाए तो वर्ग संघर्ष, हड़ताल, तालेबन्दी, मुकद्दमेबाजी आदि के अभिशापों से हमारा सहज छुटकारा हो जाये । इसी आधार पर गाँधी जी ग्रामपंचायतों को शक्तिशाली बनाना चाहते थे। वह चाहते थे कि गाँव की समस्याएं गाँव बालों द्वारा गाँव में निबटा देनी चाहिये ।

निष्कर्ष 

गाँधी जी के आदर्श पर चल कर हम विभिन्नता में अभिन्नता का दर्शन करके 'एकता के सूत्र में बंधे रह सकते हैं। साम्प्रदायिक एकता स्थापित करने और छूआछूत मिटाने का रास्ता हमें गाँधीवाद ने ही दिखाया है। इस दिशा में जो मार्ग दर्शन गाँधीवाद करता है, वह हमारी राष्ट्रोन्नति के लिये अत्यन्त उपयोगी है। इतना ही नहीं गाँधी जी ने समस्त धर्मों की एकता बताई और वह मूलमंत्र दिया कि धर्म व्यक्तिगत मामला है। इस बात पर बल देकर हम पारस्परिक मतभेदों को सहज ही दूर कर सकते हैं।

गाँधीवाद जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हृदय परिवर्तन द्वारा स्थायी विकास का मार्ग दिखाता है और मानवीय मूल्यों के आधार पर प्रत्येक समस्या का समाधान प्रस्तुत करता है। वह नवीन व्यक्ति और नवीन समाज के निर्माण का जीवन दर्शन है। मार्क्सवादी क्रान्ति से बचने का एक ही उपाय है कि गाँधीवाद विकासशील क्रान्ति का मार्ग अपनाएँ। मानव एकता एवं समानता का संदेश देने वाली गाँधीवादी चिन्तन पद्धति आधुनिक युग में हमारे कल्याण का मार्ग प्रस्तुत करती है। यदि हम वास्तविकता की दृष्टि से देखें तो इस तथ्य में किसी को संदेह नहीं होगा कि गांधी जी के सिद्धांतों एवं आदर्शों के पालन में ही विश्वहित निहित है।


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