Tuesday, 5 June 2018

भारत में आर्थिक उदारीकरण पर निबन्ध। Udarikaran par Nibandh

भारत में आर्थिक उदारीकरण पर निबन्ध। Udarikaran par Nibandh

Udarikaran par Nibandh

आजकल उदारीकरण शब्द का प्रयोग अत्यधिक प्रचलित हो गया है। इसे ऐसे प्रस्तुत किया जा रहा है जैसे देश की जर्जर अर्थव्यवस्था का उद्धार केवल यही पद्धति कर सकती है।  इस व्यवस्था के पक्षधरों का मानना है की स्वतंत्र भारत ने आर्थिक विकास हेतु जिस नीति का पालन किया है, वह सरकारी नियंत्रण पर आधारित रही और निजी उद्योग इससे प्रभावित हुए। फलतः देश की आर्थिक उन्नति में अपेक्षित उन्नति नहीं हुई। यह भी तर्क दिया जा रहा है की ‘परमिट लाइसेंस राज’ ने भी भारतीय अर्थव्यवस्था को में गतिरोध उत्पन्न किया है।

पंडित नेहरु की विचारधारा : ज्ञातव्य है कि सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र किसी भी उन्नतिशील देश के विकास के मूल में होते हैं। और इन्हीं से उस देश की आर्थिक प्रक्रिया नियंत्रित होती है। पंडित जवाहरलाल नेहरू का विचार था कि यदि देश का सर्वांगीण विकास करना है तो प्रमुख उद्योगों को विकसित किया जाना आवश्यक होगा। उनका विचार था कि दुनिया में अनेक आर्थिक विचारधाराओं में संघर्ष हो रहा है। मुख्यता दो धाराएं हैं। एक ओर तो तथाकथित पूंजीवादी विचारधारा है और दूसरी ओर तथाकथित सोवियत रूस की साम्यवादी विचारधारा। प्रत्येक पक्ष अपने दृष्टिकोण की यथार्थता का कायल है। लेकिन इससे जरूरी तौर पर यह नतीजा नहीं निकलता है कि आप इन दोनों पक्षों में से किसी एक को स्वीकार करें। बीच के कई और रास्ते भी हैं। पूंजीवादी औद्योगिक व्यवस्था ने उत्पादन की समस्या को अत्यधिक सफलता से हल किया है। लेकिन उसने कई समस्याओं को हल नहीं भी किया है। यदि वह इन समस्याओं को हल नहीं कर सकता तो कोई और रास्ता निकालना होगा। यह सिद्धांत का नहीं है कठोर तथ्य का सवाल है। भारत में यदि हम अपने देश की भोजन, वस्त्र, मकान आदि की बुनियादी समस्याएं हल नहीं कर सकते तो हम अलग कर दिए जाएंगे और हमारी जगह कोई और आएगा। इस समस्या के हल के लिए चरमपंथी तरीका ही नहीं वरन बीच का रास्ता भी अपनाया जा सकता है। 

भारतीय अर्थव्यवस्था : भारत में जिस प्रकार की अर्थव्यवस्था प्रारंभ हुई उसे मिश्रित अर्थव्यवस्था का नाम दिया गया। मिश्रित अर्थव्यवस्था से तात्पर्य है ऐसी अर्थव्यवस्था जहां कुछ क्षेत्र में सरकारी नियंत्रण रहता है तथा अन्य क्षेत्र निजी व्यवस्था के अधीन रहते हैं। और क्षेत्रों का वर्गीकरण पूर्णतया पूर्व सुनिश्चित रहता है।

हिंदुस्तान में आजादी से पूर्व किसी सुनियोजित औद्योगिक नीति की घोषणा नहीं हुई। स्वतंत्रता के उपरांत प्रथम औद्योगिक नीति की घोषणा मिश्रित अर्थव्यवस्था की संकल्पना पर आधारित थी। सन 1956 में जो औद्योगिक नीति बनी वह प्रमुख एवं आधारभूत उद्योगों के त्वरित विकास तथा समाजवादी समाज की स्थापना जैसे लक्ष्यों पर आधारित थी। बाद में उसमें कतिपय नीतिगत परिवर्तन हुए जिससे सामाजिक क्षेत्र में व्याप्त अवरोधों को दूर किया जा सका।

उदारीकरण का अर्थ : आर्थिक प्रतिबंधों की न्यूनता को ही उदारीकरण कह सकते हैं। प्रतिबंधों के कारण प्रतियोगिता का अभाव रहता है। फलतः उत्पादक वर्ग वस्तु की गुणवत्ता के प्रति उदासीन रहता है। किंतु यदि प्रतिबंधों का अभाव कर दिया जाए तो इसका परिणाम दूरगामी होता है। उदारवादियों का मानना है कि नियंत्रित अर्थव्यवस्था या सरकारीकरण से उद्यमिता बाधित होती है।
यहां पर उल्लेख किया जाना आवश्यक है कि निजीकरण को विश्व के अधिकांश विकसित एवं अर्ध विकसित देशों ने अपनाया है, क्योंकि सरकारी उद्योगों में प्रतियोगिता का अभाव रहता है और इसमें उत्पादकता को बढ़ाने का कोई विशेष प्रयास नहीं किया जाता है। फलतः इन उद्योगों में कुशलता घट जाती है। किंतु विकल्प के रूप में निजीकरण ही बेहतर व्यवस्था है यह भी नहीं कहा जा सकता।
निजी करण का अर्थ : निजीकरण का अर्थ उत्पादन के साधनों का निजी हाथों में होना है। इसमें सबसे बड़ी कमी यह है कि निजीकरण का उद्देश्य अल्पकाल में अधिक से अधिक लाभ कमाना होता है। इस कारण यह दीर्घकालीन प्रतिस्पर्धात्मक बाजार नहीं बनाए रहता। प्रायः सरकारी घाटों को पूरा करने के लिए निजीकरण का तरीका अपनाया जाता है। सार्वजनिक संपत्ति का निजी हाथों में विक्रय उसी दशा में किया जाना चाहिए जबकि वह राष्ट्र ऋण को कम करने में सहायक हो।

नई औद्योगिक नीति : विगत वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था अत्यधिक नियंत्रित एवं विनियमित अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित हुई है। 24 जुलाई 1991 को भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व अर्थव्यवस्था के एक अंग के रूप में विकसित करने के लिए नई औद्योगिक नीति तैयार हुई, जिसे उदार एवं क्रांतिकारी नीति की संज्ञा दी गई। इस नीति का लक्ष्य है-
  • अर्थव्यवस्था में खुलेपन को लाना।
  • अर्थव्यवस्था को अनावश्यक नियंत्रण से मुक्त रखना।
  • विदेशी सहयोग एवं भागीदारी को बढ़ावा देना।
  • रोजगार के अवसर बढ़ाना।
  • सार्वजनिक क्षेत्र को प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाना।
  • आधुनिक प्रतिस्पर्धात्मक व्यवस्था को विकसित करना ।
  • निर्यात बढ़ाने के लिए आयातो को उदार देना।
  • उत्पादकता वृद्धि हेतु प्रोत्साहन देना।

आज वर्तमान औद्योगिक नीति के अंतर्गत उद्योगों पर लगे प्रशासनिक एवं कानूनी नियंत्रणों में शिथिलता दी गई है। सभी मौजूदा उत्पादन इकाइयों को विस्तार परियोजनाओं को लागू करने के लिए पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं है। उच्च प्राथमिकता वाले उद्योगों में विदेशी पूंजी के निवेश को 40% के स्थान पर 51 प्रतिशत कर दिया गया है।

यह तो ठीक है की नई औद्योगिक नीति से उत्पादन वृद्धि, निर्यात संवर्धन औद्योगिकीरण, तकनीकी सुधार, प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति का विकास तथा नए उद्यमियों को प्रोत्साहन प्राप्त होगा। किंतु अत्यधिक उदारीकरण एवं विदेशी पूंजी के निवेश की स्वतंत्र छूट से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था बहुराष्ट्रीय निगमों एवं बड़े औद्योगिक घरानों के चक्कर में फस जाएगी। इस नीति के निम्नलिखित दूरगामी दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं।
  • आर्थिक विषमता में वृद्धि।
  • आत्मनिर्भरता में हास।
  • आयातित संस्कृति को बढ़ावा।
  • बहुराष्ट्रीय कंपनियों एवं विदेशी विनियोजको को स्वतंत्र छूट देने से देश के उद्यमियों का प्रतिस्पर्धा में टिक पाना कठिन होना।
  • अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के दबाव।
  • काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि उदारीकरण की हवा पश्चिम से चली है। ठीक है कि निजी उद्योगों की उत्पादन समृद्धि में विशेष भूमिका हो सकती है किंतु हस्तक्षेप के अभाव में निजी उद्यमिता विनाशात्मक भी हो सकती है। और किसी भी रुप में निजीकरण सार्वजनिक इकाइयों की त्रुटियों को दूर करने वाला प्रभावपूर्ण उपकरण नहीं हो सकता है। निजी कारण से निजी क्षमता का लाभ होगा और सार्वजनिक इकाइयां अस्वस्थ होंगी।

उपसंहार : उदारीकरण से आशय यह नहीं है कि सरकार की भूमिका इसमें कम होती है अपितु इसमें उसका उत्तरदायित्व और बढ़ जाता है। और आर्थिक उदारीकरण का औचित्य सही मायने में सभी सिद्ध हो सकेगा जब उससे जनसाधारण लाभान्वित हो सकेगा। उदारीकरण की नीति भारतीय अर्थव्यवस्था को गतिशील एवं प्रतिस्पर्धात्मक बनाने में सफल हो सकती है। किंतु इससे विदेशी पूंजी पर आश्रित आर्थिक उपनिवेशवाद की स्थापना एवं बड़े औद्योगिक घरानों का वर्चस्व बढ़ेगा। जिससे गरीबी और बेरोजगारी में वृद्धि होगी। अतः इस नीति को दूरदर्शिता पूर्वक लागू करना होगा अन्यथा अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के भारत में आने से भारतीय कंपनियों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। जो कि आर्थिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से भारत के लिए अत्यधिक हानिकारक है।

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