Wednesday, 6 March 2019

मेरी प्रथम रेल यात्रा पर निबंध | Essay on My First Train Trip in Hindi

मेरी प्रथम रेल यात्रा पर निबंध | Essay on My First Train Trip in Hindi

My First Train Trip in Hindi
मेरी 14 वर्ष की अवस्था हो गई थी किंतु अब तक मुझे कभी दिल्ली से बाहर किसी और शहर में जाने का अवसर नहीं मिला था इसलिए मैं अब तक रेल यात्रा नहीं कर सका था। कुछ दिन पहले मैं अपने साथियों के साथ बालभवन देखने गया था। वहां छोटी सी रेलगाड़ी को देख कर और उसमें बैठ कर के बहुत आनन्द आया। मैं सोचने लगा कि असली रेलगाड़ी में यात्रा करते हुए अधिक आनंद आएगा। मेरे मन में रेल यात्रा की इच्छा बढ़ती ही रही।

कुछ ही दिनों बाद एक ऐसा अवसर आ गया जिससे मुझे रेल यात्रा का शुभ अवसर मिल गया। मेरे पिताजी के घनिष्ठ मित्र श्री यशपाल ने अंबाला छावनी से सूचना दी कि उनकी पुत्री का विवाह है। इस अवसर पर मेरे पिताजी का जाना जरूरी था। जब वे अंबाला जाने का कार्यक्रम बनाने लगे तो मेरी रेल यात्रा की इच्छा जागृत हो उठी। मैंने पिताजी से कहा मैं भी जाऊंगा बहन जी की शादी में। पहले तो उन्होंने मुझे डांटा किंतु मैं जाने की रट लगाता रहा। बाल हट के आगे भगवान भी झुक जाते हैं। आखिर पिताजी भी मुझे साथ ले जाने के लिए तैयार हो गए।

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से बारह बजकर दस मिनट  पर ट्रेन चलती है। हम ग्यारह बजकर पैंतालीस मिनट पर ही स्टेशन पर पहुंच गए। पिताजी ने टिकट घर से टिकट लिए और गाड़ी की ओर चल दिए। गाड़ी के विशाल विस्तृत चबूतरे को देखकर जिज्ञासा प्रकट की तो पिताजी ने समझाया यह विशालकाय लौह पथ गामिनी के ठहरने, विश्राम करने, दाना पानी लेने तथा अपने भार को हल्का करने और नया भाग लेने के लिए निश्चित स्थान है। गाड़ी पर यात्रियों के चढ़ने और उतरने के लिए यह चबूतरा या मंच है। इसे रेलवे की भाषा में प्लेटफार्म कहते हैं।

यात्रियों की सुविधा के लिए प्लेटफार्म पर सार्वजनिक नल होता है। क्षुधाशांति के लिए जलपान की रेहड़ियां होती हैं। ज्ञानवर्धक और मानसिक भूख मिटाने के लिए बुकस्टाल होता है। इसके अतिरिक्त 1-2 रेहड़िया, बच्चों के खेल खिलौने, स्थान विशेष की प्रसिद्ध वस्तु की भी होती है।

गाड़ी में भीड़ बहुत थी। जब हम किसी डिब्बे में जाने की कोशिश करते तो अंदर बैठे यात्री हमारे साथ सहानुभूति दिखाते हुए कहते आगे डिब्बे खाली पड़े हैं। आगे गए तो वही हाल। तब मुझे पता लगा कि यह सहानुभूति नहीं प्रवंचना थी ।

आखिर हम एक डिब्बे में घुस गए। अंदर विचित्र दृश्य था। पांच सात लोग खड़े थे और इधर-उधर झांककर बैठने की जगह ढूंढ रहे थे। उधर दो से तीन लोग पैर पसारे पड़े थे। एक सज्जन ने सीट पर अपना बिस्तर रखा हुआ था। जो भी उनसे पूछता कहते सवारी आने वाली है। इधर इंजन ने सीटी बजाई और उधर गार्ड ने भी सीटी बजाकर तथा हरी झंडी दिखाकर गाड़ी को चलने की स्वीकृति दे दी।

गाड़ी मंद गति से चल रही थी। 5 से 7 मिनट पश्चात सब्जी मंडी का स्टेशन आया। गाड़ी थोड़ी देर रूकी और 20  से 30 यात्री चढ़े और उतरे। पुनः सीटी बजी और गाड़ी चल दी।

सब्जी मंडी स्टेशन छोड़ने के पश्चात गाड़ी ने जो गति पकड़ी उसका अनुमान लगाना मेरे लिए मुश्किल है। हां इतना जरूर पता है कि वह छोटे बड़े स्टेशन छोड़ती तेजी से चली जा रही थी। छोटे स्टेशनों पर रूकती नहीं। अपनी धुन में मस्त चली जा रही थी।

यात्रियों की चर्चा में बाधा डालने वाले भी डिब्बे में आते रहते हैं। कोई आंखें अंधी होने की दुहाई देता है तो कोई अपने अंगहीन होने की दर्दनाक कहानी सुनाकर पैसे मांगता है। बैठे हुए यात्री भूख महसूस न करे अतः विभिन्न प्रकार की खाने की चीजें बेचने वाले आते हैं। कोई दाल सेवियां बेच रहा है तो कोई मूंगफली। कई लोग अपने सुरमें तथा दंत मंजन को विश्वविख्यात की उपाधि से विभूषित कर यात्रियों की आंख में धूल झोंकने की चेष्टा करते हैं।

पानीपत और करनाल के रास्ते में इन सब मांगने और बेचने वालों से अलग सफेद कपड़े पहने और टोपी लगाए एक आदमी को हमने अपने डिब्बे में आते देखा। यह भी अजीब आदमी है। हर व्यक्ति से टिकट मांगता है। टिकट देख कर उसे अपनी मशीन से पंच कर देता है। पिताजी ने समझाया यह टिकट चेकर है। बिना टिकट सफर करने वालों को पकड़ना और उनसे जुर्माना वसूल करना इसका काम है।

ट्रेन पानीपत करनाल और कुरुक्षेत्र पर रूकी। शेष स्टेशन छोड़ चली। करनाल जाकर पिताजी और मैं प्लेटफार्म पर उतरे। बड़ा शोरगुल था। कोई गर्म चाय की आवाज लगा रहा था तो कोई रोटी छोले की। गाड़ी को 5 मिनट रूकना है, अतः यात्री भी चाय पीने, पूरी खाने और सिगरेट पीने में लगे हुए हैं। हमने भी जल्दी से चाय पी और बिस्कुट खाए। उधर गाड़ी ने सीटी दी  और हम भाग कर गाड़ी में चढ़ गए।

भगवान कृष्ण के उपदेश भूमि कुरुक्षेत्र के बाहर दर्शन कर अपने को कृतार्थ समझा। घण्टे भर की यात्रा के बाद अंबाला छावनी स्टेशन आ गया। गाड़ी की गति मंद हुई। लोगों ने अपने बिस्तर संभाले। हमने भी अपनी अटैची संभाली। झटके के साथ गाड़ी रुकी।

कुली गाड़ी की ओर झपट रहे थे। चाय, दूध, रोटी, छोले की वहीं आवाजें कानों में गूंज रही थी। हम गाड़ी से उतरकर धीरे से प्लेटफार्म पर चल रहे थे। मार्ग में ही एक व्यक्ति पिताजी से गले मिला। दोनों बड़े प्रसन्न हो रहे थे। पिताजी उसे बधाइयां दे रहे थे। मैं समझ गया कि यही मेरे पिता जी के प्रिय मित्र श्री यशपाल हैं। मैंने उनका चरण स्पर्श किया। उन्होंने मुझे प्यार से थपथपाया।

यही है मेरी पहली रेल यात्रा रोचक भी और ज्ञानवर्धक भी।

SHARE THIS

Author:

I am writing to express my concern over the Hindi Language. I have iven my views and thoughts about Hindi Language. Hindivyakran.com contains a large number of hindi litracy articles.

0 comments: