Friday, 8 March 2019

यदि मैं पूंजीपति होता पर निबन्ध। Yadi Mein Punjipati Hota Hindi Essay

यदि मैं पूंजीपति होता पर निबन्ध। Yadi Mein Punjipati Hota Hindi Essay

उद्योग या व्यवसाय में पूंजी लगाना पूंजीपति होने की अनिवार्य शर्त है। अतः यदि मैं पूंजीपति हुआ तो उद्योग शुरू करूंगा और व्यवसाय में धन लगाऊंगा। उद्योग या व्यवसाय में पूंजी लगाने का मानवीय दृष्टि से महत्व यह होगा कि मैं कुछ लोगों को जीविका दे सकूंगा। देश की बढ़ती बेरोजगारी का एक अंश ही सही कम करने में अपना योगदान दे सकूंगा। दूसरा उद्योग या व्यवसाय से प्राप्त आर्थिक लाभ पर आयकर दे कर राष्ट्र की आर्थिक सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त करूंगा।

यदि मैं पूंजीपति होता तो प्रकाशन उद्योग में पूंजी लगाता और पुस्तक व्यवसाय को स्वीकार कर मां सरस्वती की सेवा में अपना जीवन भी कृतार्थ करता। अमेरिका आदि में चैतन्य महाप्रभु के अनुयाई, वैष्णव संत प्रभुपाद मृत्यु पूर्व यह वचन कहे थे ‘मेरे गुरु महाराज कहा करते थे जो कुछ भी धन हो उससे पुस्तकें प्रकाशित करो। छापो और छापो। मैंने अपनी पुस्तक छापी है अब तुम भी ऐसा ही करो।‘

प्रकाशन का क्षेत्र व्यापक और विविधतापूर्ण है। प्रत्येक का ज्ञान, किंतु विशेषता किसी को नहीं इस उक्ति के विरुद्ध मैं रहूंगा। इसलिए मैं केवल हिंदी का प्रकाशक बनूंगा। इससे मुझे तीन प्रकार का आंतरिक सुख प्राप्त होगा- (1) मां भारती की सेवा का शुभ अवसर शुद्ध और प्रमाणिक ग्रंथ साफ कर, (2) राष्ट्र की सेवा हिंदी में विश्व स्तर के प्रकाशन करके हिंदी को राष्ट्रभाषा के पद पर सिंहासनारूढ़ के द्वारा। (3) हिंदी पर लांछन लगाकर, गालियां देकर मां भारती पर कीचड़ उछालने वालों को अपने प्रकाशनों द्वारा मुंहतोड़ जवाब देकर।

नए वर्ष में लगभग 50 पुस्तकों के प्रकाशन का कार्यक्रम रखूंगा। इसमें कविता और गद्य की प्रायः सभी विधाओं पर पुस्तकें छापूंगा। हिंदी का एक क्षेत्र ऐसा भी है जिसमें बहुत कम प्रकाशन हुआ है वह है शोध प्रबंध। तीन वर्ष से लेकर पांच वर्ष तक खोज करके अपनी मान्यता प्रस्तुत करने वाले शोध प्रबंध विश्वविद्यालय की अलमारियों में ही पांडुलिपि रूप में धूल चाटते रहे, इससे बड़ी लज्जाजनक बात क्या हो सकती है। इसलिए मैं कम से कम दस शोध प्रबंध प्रतिवर्ष छापता। हिंदी का बाल साहित्य तकनीकी दृष्टि से बहुत उच्च स्तर का है इसलिए इस क्षेत्र को हाथ भी नहीं लगाऊंगा।

कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध या शिक्षा के क्षेत्र में नए लेखकों को प्रोत्साहन देने में मेरी प्राथमिकता रहेगी। कारण इनमें से जयशंकर प्रसाद, निराला और महादेवी जन्म लेंगे। प्रेमचंद, भाग्य और धर्मवीर भारती उभरेंगे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, महावीर प्रसाद द्विवेदी तथा हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे महारथी प्रकट होंगे। एक ही लेखक को प्रतिवर्ष छापने से परहेज करूंगा। क्योंकि इससे अन्य लेखकों को शुभ अवसर मिलने में व्यवधान पड़ता है।

पुस्तक को कंप्यूटर से कंपोज करूंगा। प्रूफरीडिंग के लिए प्रूफरीडर रखूंगा। तीन बार प्रूफ की शुद्धि होने के बाद चौथा प्रूफ लोखक को भेजूँगा ताकि तकनीकि दृष्टि से कोई शब्द अशुद्ध जा रहा है तो वह शुद्ध हो सके और पुस्तक शुद्ध छप सके। जैसे घर में जितनी बार झाड़ू मारो कुछ कूड़ा निकल ही आता है उसी प्रकार अशुद्धि छूट जाना स्वाभाविक है। इसके बाद पुस्तक की फिल्म बनेगी और छपेगी। मेरे प्रोडक्शन विभाग का यह कर्तव्य होगा कि पुस्तक की छपाई उच्च कोटि की हो।

पुस्तक विक्रय के भी तीन प्रकार हैं (1) खुदरा व्यापारियों द्वारा, (2)सीधे स्कूल कॉलेज तथा पब्लिक लाइब्रेरियों से संपर्क करके, (3)सरकारी खरीद।

साहित्यिक पुस्तकों का खुदरा विक्रेता आमतौर पर साल भर का उधार लेता है। समय में पेमेंट कर दे तो सबसे बढ़िया पेमेंट करने वाला माना जाता है। मगर समय पर पेमेंट करना पुस्तक विक्रेताओं की प्रवृत्ति और प्रकृति के विरुद्ध है। आजकल उन्हें 4 से 5 महीने तक लग जाता है। पुस्तक विक्रेता को पुस्तक की रकम हजम करने में ही सुख अनुभव होता हैं। इसलिए विक्रय के क्षेत्र में खुदरा पुस्तक विक्रेताओं को कम प्रश्रय दूंगा।

बिक्री की दृष्टि से एक कार्य निरपेक्ष भाव से प्रतिदिन होता रहेगा। वह है सूची पत्र प्रेषण। स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय तथा अन्य संस्थाओं में निजी पुस्तकालय हैं उनको सूची पत्र भेजा जाएगा ताकि अपने प्रकाशनों का प्रचार हो सके। इनके अतिरिक्त हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकारों तथा कई समितियों के अध्यक्षों को भी अपने प्रकाशनों से अवगत कराने के लिए सूची पत्र भेजता रहूंगा। कारण विज्ञापन कभी व्यर्थ नहीं जाता। उसका प्रभाव पड़ेगा ही।

उचित वेतन, समय पर वेतन, वर्ष में एक महीने का बोनस, आर्थिक उपहार तथा प्रतिदिन की चाय देकर कर्मचारियों को खुश रखूंगा। उनके सुख और दुख में भागीदार बनने की चेष्टा करूंगा। हां अनियमित, कामचोर, प्रसादी कर्मचारी को छुट्टी देकर काम की क्षति को रोकूंगा।

इस प्रकार यदि मैं पूंजीपति होता तो प्रकाशन उद्योग को अपनाता आता। विश्व में ज्ञान का प्रचार करता। मां भारती के माध्यम से भगवती सरस्वती की पूजा आराधना करता। आय की वृद्धि के लिए उचित अनुचित सब हथकंडे अपनाता। लेखकों को प्रसन्न रखता तथा अधीनस्थों को खुश।

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