पार्वती का चरित्र चित्रण - Parvati Ka Charitra Chitran

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पार्वती का चरित्र चित्रण - Parvati Ka Charitra Chitran

पार्वती का चरित्र चित्रण - 'नीली झील' कहानी की नायिका पार्वती है। वह महेस से पुनर्विवाह करती है। विवाह के पश्चात् पार्वती अपने पत्नी-धर्म को बखूबी निभाती भी है। गर्भवती होने पर चिंतित दिखाई देती है कि घर पर एवं अस्पताल में उसकी देखभाल कौन करेगा। वह संवेदनशील है जब उससे सोनापतारी का अण्डा टूट जाता है तो वह आशंकित हो जाती है। पेट में बच्चा मरने के कारण उसकी मृत्यु हो जाती है। पार्वती के चरित्र में निम्नलिखित बिंदु दिखाई पड़ते हैं-

पतिव्रता: पार्वती एक पतिव्रता नारी है वह अपने पति का पूरा सम्मान करती है। वह अपने पति का पूरी तरह से ख्याल रखती है एवं उसकी प्रत्येक बात को प्रसन्नतापूर्वक मानती है। जब महेसा आधी रात को घर लौटता है तो पार्वती को उसकी चिंता सताती है इसलिए वह उससे देर से आने के बारे में पूछती है, तो वह सीधेपन से कह देता है, जंगल तक गया था।” यही नहीं जब वह कहीं से देर बाद आता है या कोई अन्य कार्य के लिए इधर-उधर चला जाता है तो वह उसके लिए ही सोचती है उसकी सुख-सुविधाओं का भी ध्यान रखती है। एक बार महेस दो दिन का कहकर चार दिन तक नहीं आता है तो पार्वती उसकी कुशलता की मन्नत मांगती है जैसे कि इन पंक्तियों से पता चलता है— “दीवार पर सगनौती की लकीरें बनी देखकर उसे फिर कुछ याद आया... जब एक बार वह दो दिन के लिए कहकर चार दिन बाद लौट आया था, शायद तभी पार्वती ने गेरू से यह सगनौती उठाई होगी।" इस प्रकार पार्वती जितना समय जिंदा रहती है वह जो कुछ भी करती है केवल अपने पति के लिए ही करती है क्योंकि महेस के बिना उसका कोई नहीं था। वह अपना पतिव्रता धर्म पूर्णता से निभाती है।

साहसी: वह परंपराओं को न मान कर साहस करते हुए महेस से पुनर्विवाह करती है। वह लोगों की बातों की परवाह नहीं करती है कहानी के प्रस्तुत शब्दों से इस बात की पुष्टि होती है, "विधवा पण्डिताइन ने उससे शादी कर ली थी। लोगों ने तरह-तरह की बातें कही..... किसी का कहना था कि जवान देखकर पण्डिताइन ने फांस लिया और कोई कहता था कि महेस रूपया पैसा देखकर ढरक गया......" पर पार्वती पर इन बातों का कोई असर नहीं होता । वह किसी की परवाह न करते हुए महेस के साथ प्रसन्नतापूर्वक जीवन का निर्वाह करती है।

सहायक: पार्वती के पास गांव के दूसरे लोगों के मुकाबले अधिक धन था। गांव के जिन लोगों को धन की ज़रूरत होती थी वह धन देकर उनकी सहायता करती थी । पार्वती के महेस को बोले प्रस्तुत शब्दों से पता चलता है, "रूपया बहुत फैल गया है, वसूल नहीं होता, तुम ज़रा लोगों को डांटो-डपटो।"

जगन नाई की पत्नी के प्रस्तुत शब्दों से भी पता चलता है जो वह कर्ज वसूली करने आए महेस से कहती है, "पार्वती चाची मुँह से चाहे जितना बिगड़े, पर आदमी की मरजाद और इज्जत का तो ख्याल करती थी।

वह दूसरों को उधार तो देती थी पर उन्हें पूरा मान-सम्मान भी देती थी। वह उधार वापिस लेने के लिए किसी से क्रूरता भरा व्यवहार नहीं करती थी। वह लोगों की समय असमय जरूरत पूरी करती थी इसलिए सारे गाँव वाले भी उसका मान-सम्मान करते थे चाहे पीठ पीछे कितनी भी बातें करते थे। निम्नलिखित पंक्तियों से इस बात की पुष्टि होती है - "पार्वती रूपये का लेन देन करती और सबकी चोटी अपने पाँव के नीचे रखती । बस्ती में कौन ऐसा था, जिसे वक्त बेवक्त चार पैसे की जरूरत नहीं पड़ती।"

धार्मिक वृत्तिवाली: वह एक पण्डिताइन थी इसलिए परमात्मा में विश्वास रखती थी और पूजा पाठ अथवा किसी धार्मिक कृत्य के लिए परंपराओं को भी साथ लेकर चलती है। वह परंपरागत देवी पूजा में विश्वास रखती है। उस क्षेत्र में देवियों की पूजा हेतु मेंहदी और महावर लगाने की प्रथा थी जिसका प्रस्तुत उदाहरण से पता चलता है, "एक दिन देवियों की पूजा के लिए जब पार्वती ने महावर लगाया । "

वह गांव में मंदिर बनवाने की इच्छा रखती है और साथ ही एक धर्मशाला का निर्माण करवाना चाहती है ताकि यात्रियों को रहने की सुविधा मिल सके। इन कृत्यों के प्रति उसकी भावाभिव्यक्ति इस प्रकार है- "अच्छा सुनो! मेरा मन है कि कुछ रुपया लगाके यहां चबूतरे पर एक मंदिर बनवा दिया जाए.... और बन सके तो मुसाफिरों के लिए दो कोठरियां भी बन जाएं। हारे-थके लोगों को आराम मिलेगा और कुछ रूपया धरम के कारज में लग जाएगा।" उसे विश्वास है कि जब तक मंदिर रहेगा तो लोगों से आशीर्वाद ही मिलेगी इसलिए अस्पताल में उसके अंतिम शब्द भी मंदिर निर्माण से ही सम्बन्धित थे जैसे- पार्वती की सांसें धीमी पड़ती जा रही थीं, वह एकदम निश्चित लग रही थी, और उसने महेसा को पास बुलाकर कहा था, अब मन्दिर ज़रूर बनवा देना, पार्वती मन्दिर।"

संवेदनशील: पार्वती एक पतिव्रता होने के साथ-साथ संवेदनशील भी है। वह न तो किसी को कष्ट देती है और न ही किसी का अनिष्ट होते देख सकती है। जब महेस उसे पक्षियों के अंडे दिखाता है तो सोनापतारी का अण्डा वह पार्वती के हाथ में पकड़ा देता है जो उसके हाथ से गिर कर टूट जाता है जिस पर वह भयभीत हो जाती है जिसका पता प्रस्तुत शब्दों से चलता है, "महेस एक-एक अण्डा उठाकर दिखाने लगा। वैसे तो पार्वती नहीं छूती, पर उसने सोनापतारी का अण्डा हाथ में ले ही लिया। घुमाकर देखते ही हाथ से छूटकर वह गिर पड़ा और टूट गया, तो पार्वती के मुंह से चीख निकल गई, "हाय दइया! ग ग ग पारबती के चेहरे पर काले बादल - से छा गए थे, उसका दिल धक्-से रह गया था" पशु-पक्षियों के प्रति उसके हृदय में संवेदनशील भाव भरे थे।

स्पष्टवक्ता एवं आशंकित: पार्वती किसी भी स्थिति में हर बात को स्पष्ट कह देती है। महेसा को उदास देख उसे लगता है कि महेस उससे विवाह करवा कर पछता रहा है वह महेस से स्पष्ट शब्दों में कह देती है कि, "आज सोच-सोच के बड़ा दुख हुआ । ..... अपने सुख की खातिर हमने तुम्हें खराब कर दिया। पार्वती की आँखों में पनीलापन था, पछतावा तो होता होगा, सच-सच बताना!" पार्वती को निराधार आशंकाएं भी घेरे रहती हैं और वह सदैव नकारात्मक सोचती है फिर उसका परिणाम भी वैसा ही होता है। हाथ से अण्डा छूट जाने पर वह एकदम भयभीत हो जाती है और कहती है। "असगुन हो गया" तथा वह अपने भविष्य के लिए आशंकित हो उठती है। जब वह गर्भवती होती है तो तब भी अपने गर्भ को लेकर चिंतित रहती है।

इस तरह पार्वती एक अच्छी पत्नी व प्रेमिका होने के साथ-साथ एक भली स्त्री है। वह सुख - दुःख में लोगों की मदद धन से करती है उसका संवेदनशील हृदय सदैव आशंकित रहता है। धार्मिक वृत्ति होने के कारण वह ईश्वर के प्रति आस्था रखती है और मन्दिर बनवाकर समाज को अपना योगदान देना चाहती है।

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