समर का चरित्र चित्रण - Samar ka Charitra Chitran

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समर का चरित्र चित्रण - Samar ka Charitra Chitran

समर का चरित्र चित्रण - समर, राजेन्द्र यादव द्वारा रचित सारा आकाश उपन्यास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण चरित्र है। यही इस उपन्यास का नायक है। समर का चरित्र चित्रण करने के लिए हमें समर के चरित्र की विशेषताएं समझनी पड़ेंगी। 

समर के चरित्र की विशेषताएं

  1. महत्वाकांक्षी परन्तु स्वप्नदर्शी नवयुवक
  2. अस्थिर चरित्र और पुरुष का अहं
  3. प्रतिहिंसा का उग्र रूप
  4. कथनी और करनी में अन्तर
  5. महत्वाकांक्षी और उदार
  6. आत्म-ग्लानि से पीडित समर
  7. समर का कायाकल्प
  8. संवेदनशील और अव्यावहारिक
  9. समर की वैचारिकता
  10. रुढिवादी विचारों से ग्रस्त
  11. अन्ध-विश्वासों का शिकार
  12. पलायनवादिता

(१) महत्वाकांक्षी परन्तु स्वप्नदर्शी नवयुवक - कथा के आरंभ में ही समर का जो रूप उभरता है, वह एक महत्वाकांक्षी परन्तु स्वप्नदर्शी नवयुवक का रूप हैं । इस वर्ष वह इण्टर की परीक्षा देने की तैयारी कर रहा है । वह खूब पढ़ना चाहता है । उसके दो स्वप्न है वह एम. ए. पास कर प्रोफेसर बनना चाहता है या एक स्वयंसेवक के रूप में समाज की सेवा करने का इच्छुक है । उसकी ये महत्वाकांक्षाएँ दरअसल आधार हीन इमारत की तरह है। वह अभी शादी कर घर गृहस्थी के जंजाल में नहीं फँसना चाहता। है । उसके ऊँचे सपनों से भरी इस महत्वाकांक्षा का वर्णन स्वयं उसी के शब्दों मै प्रस्तुत है "इस बात को कभी नहीं भूलना कि मुझे कुछ बनना है--कुछ बनना है, जिसके सामने दुनिया झुके । जिसकी एक बात देश के लिए आज्ञा हो।" 

समर का उपर्युक्त कथन उसकी आदशों से प्रेरित मानसिकता और स्वप्नदर्शी स्वभाव को पूरी तरह से व्यक्त कर देता है । उसकी सनक तो यहाँ तक बढ़ी हुई है कि वह आजन्म ब्रहाचारी बने रहने की प्रतिज्ञा कर लेता है। जब उसकी इच्छा के विरुध्द उसकी शादी कर दी गई तो वह उस जंजाल से छूटने को छटपटाने लगता है, सब-कुछ छोड़कर कहीं भाग जाना चाहता है। उसके चरित्र में आरंभ से ही किसी एक निश्चित निर्णय पर दृढ बने रहने की क्षमता नहीं है । वह स्वभावसे अस्थिर है।

(२) अस्थिर चरित्र और पुरुष का अहं - समर एक सामान्य स्तर का व्यक्ति है। आरंभ में ब्रह्मचारी रहने का निश्चय करता हैं, लेकिन थोडा सा विरोध होने पर उसकी शादी हो जाती है। सुहागरात को जब भाभी उसे कमरे में धकेल कर किवाड बन्द कर चली जाती हैं तो वह कोई विरोध नहीं करता। कमरे में पहुँचकर उसके मन में अपनी पत्नी प्रभा के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न हो जाती है। प्रभा दसवी पास है यह उसने सुन रखा था। एक ओर तो वह अपने मन को यह समझाता रहा था कि एम. ए. करने तक उससे कोई संबंध नहीं रखेगा। परन्तु दूसरी और उसके मन में प्रभा को देखने की भी ललक थी। 

समर यह कल्पना करता है कि, प्रभा लजीली नव-क्यू की तरह बनी होगी, उसी साज-सज्जा से मेरा स्वागत करने को तैयार होगी। वह पहले स्वयं बोलकर अपनी कमजोरी नहीं दिखाना चाहता है। इसलिए चुपचाप पलंग पर बैठे प्रभा के अपने पास आने की कल्पना करने लगता। उसे आशा है कि अभी मेरी इस कठोरता पर फूट-फूट कर रो उठेगी। दोनों हाथों से मेरे पाँव पकड़कर अभय माँगती -सी आँसू-भीगा मुंह उठाकर पूछेगी - मेरे नाथ, बताओ, इस दासी से क्या अपराध हुआ है ? फिर पाँवों पर सिर पटक-पटक कर हजारों बार माफी माँगेगी।

परन्तु जब बहुत समय बीत जाता है, और प्रभा ऐसा कुछभी नहीं करती तो समर का अहं आहत नाग के समान फन उठाकर सडा हो जाता है। मैं यहाँ क्यों आया ? न बोलना, न स्वागत - क्या यह मेरा अपमान नहीं है ? समझती हैं, दूसरे लड़कों की तरह मैं इसे मनाऊँगा, खुशामद करूँगा ? ... मेरे आनेपर नमस्कार प्रमाण कुछ नहीं है। यही तमीज और अदब सिखाया हैं घरवालाने ? 

परंतु ऐसा कुछ भी नहीं होता। प्रभा की यह गलती और उदासीनता पहली ही रात को दोनों के जीवन में वह जहर घोल जाती है, जिसको ज्वाला में जलते दोनों बहुत दिनों तक नाटकीय -सी यातना भोगते रहते हैं। समर प्रतिज्ञा करता

हैं कि वह इस अपमान को जिन्दगी भर नहीं भूल पायेगा। इसका बदला लेगा। वह स्वयं को नितान्त अकेला महसूस करता है। वह सोचता हूँ कि, पता नहीं कैसी लड़की को मेरे गले गढ दिया गया है। जब दो अहंवादी व्यक्तित्व परस्पर टकराते हैं, तो उस टकराने का परिणाम अशुभ ही होता है। समर और प्रभा दोनों ही अपनी-अपनी मान्यताओं और महत्वाकाक्षांओं में ग्रस्त अहंवादी है। इसलिए उनकी यह परस्पर टकराहट दोनों के लिए ही दुःखदायी बन जाती हैं। 

समर भावुक हैं, इसलिए अस्थिरता का भी शिकार है। इस घटना के उपरान्त उसके चरित्र को यह कमजोरी उसे भयानक निराशा से भर देती है। जब प्रभा दूसरी बार ससुराल आती है तो समर इस बार भी अपना प्रेम प्रभा के प्रति प्रदर्शित करता है। उसका मन तो प्रभा से मिलने को बेचैन हैं, अमर के मुँह से यह सुनकर कि प्रभा ने अपने घरवालोंसे उसकी खूब तारीफ की है । परन्तु ऊपर से दिखावा करता है।

प्रभा समर के कमरे में जाने से इन्कार कर देती हैं कि उससे यह नहीं हो सकता कि कोई उसे दुत्कारता रहे और वह उसके सामने खड़ी पूँछ हिलाती रहे। तेज स्वर में भाभी से कहे गये ये शब्द समर को फिरसे मडका देते है । वह प्रभा से सारे सम्बन्ध तोड देने की प्रतिज्ञा कर बैठता है।

अस्थिर स्वभाव वाले अहंकारी व्यक्ति बहुत निर्मम भी होते हैं। वे स्वयं को दूसरों से भिन्न और श्रेष्ठ समझ यह आशा करते हैं कि दूसरे उनका सम्मान करे, उनकी बात मानें। उन्हें अपनी कमजोरी और छोटेपन का अहसास नहीं होता। समर का स्वभाव भी ऐसा ही हैं। दूसरी बार स्वयं को प्रभा से अपमानित अनुभव कर उसका मन प्रतिहिंसा की भावना से भर उठता है। घरवालों से कह कर घर का सारा काम प्रभा पर भरवा देता है। प्रभा को रोते देख और परेशान देखकर आनन्द मनाता हैं। और इसी बातका फायदा भाभी उठाती है और प्रभा के विरुद्ध की बातें समर को सुनाती है। समर का एकमात्र ध्येय प्रभा के उस घमण्ड को तोडना ही बन जाता। प्रभा जब कडकडाती ठण्ड में बरतन माँजती हुई समर देखता है तो उसे हँसी आती। भाभी की बच्ची पैदा हो जाने पर प्रभा का काम और ज्यादा बढ़ जाता है, और समर आनन्द मनाता है।

(३) प्रतिहिंसा का उग्र रूप - समर की इस प्रतिहिंसा का उग्र रूप उस समय दिखाई देता है जब प्रभा द्वारा मिट्टी के बने गणेशजी से बरतन मांज लिए जानेपर अम्मा और भाभी उसे खूब फटकार रही हैं। जब प्रभा यह बताती है कि उससे भूल से ऐसा हो गया, तो समर अम्मा को जवाब देने का बहाना लगाकर उसके गाल पर ऐसा थप्पट मारता है कि बेचारी  दिवाल से जा टकराती है। उसमें संयम के साथ विचार करने की शक्ति का अभाव हैं । समर स्वयं स्वीकार करता है असल मैं शुरू से ही जल्दबाज रहा हूँ । जरा कोई बात देखी कि झट अपने विचार बना डाले। यह मेरी बहुत ही बड़ी कमजोरी है। मुझे इससे पीछा छुडाना होगा। परन्तु अन्त तक इस कमजोरी से अपना पीछा छुड़ा नहीं पाता। प्रभा उसकी इच्छा के विरुध्द चूड़ी पहनते देख, यह क्रोध से उन्मुक्त हो उसकी सारी चूड़ियां तोड़ डालता है।

(४) कथनी और करनी में अन्तर - समर स्वप्नदर्शी आदर्शवादी है। आदर्श को व्यवहार में लाना बहुत ही मुश्किल काम है। समर स्वयं को नए विचारों का अनुयायी मानता है। इतिहास का विद्यार्थी होने के कारण वह जानता है कि हमारे यहाँ मुसलमानों के आने के समय हो परदा प्रथा का जोरे बढ़ा था। प्राचीन भारतीय संस्कृति का पुजारी होने के कारण समर परदा प्रथा का विरोधी है। परन्तु जब उसकी पत्नी प्रभा अपने ससुर और जेठके सामने नहीं घूँघट निकालती, उनसे परदा नहीं करती तो यह देख उसे धक्का लगता है। इसके लिए वह प्रभा को बदतमीज कह देता है।

समर आजन्म ब्रह्मचारी रहना चाहता था, परन्तु थोडा-सा कमजोर विरोध पर शादी कर लेता है। शादी के बाद प्रभा से कोई सम्बन्ध नहीं रखना चाहता था, परन्तु मन ही मन उससे मिलने के लिए उत्सुक रहता है। प्रभा से झगडा हो जाने के बाद उससे सारे सम्बन्ध तोड पढ़ाई में मन लगाना चाहता हैं, परन्तु किताब सामने रखकर प्रभा के सम्बन्ध में सोचता रहता है। इस प्रकार समर कमजारे दिल और चरित्र वाला है।

(५) महत्वाकांक्षी और उदार - समर निर्बल चरित्र का भले ही हो, परन्तु स्वभाव या विचारों से बुरा आदमी नहीं है। वह भावुक है संवेदनशील है। वह महत्वाकांक्षी है, परन्तु स्व केन्द्रित और निर्मम ऐसा महत्वाकांक्षी नही है, जो अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए घरवालों की या किसी को भी चिन्ता नहीं करते। उसकी महत्वाकांक्षा है कि वह पढ़-लिखकर प्रोफेसर बने और फिर अपने घरवालों की सहायता करता हुआ स्वयं भी अच्छा जीवन बिता सके। अपने बड़े भाई साहब को दिन-रात मेहनत करता देख उसे दुःख होता हैं कि वे अकेले ही सारे घर का भार ढो रहे हैं, और वृद्ध हो गये हैं। मुन्नी के प्रति भी उसके मन में अगाध ममता और करुणा है। जब उसे प्रेस में नौकरी लग जाती है, तो वह सोचता है कि यदि मेरी यह नौकरी पहले लग गयी होती तो मुन्नी को हरागंज ससुराल न जाने देता। अपने बाबूजी के प्रति भी उसके मन सहानुभूति हैं । वह जानता हूं कि आर्थिक अभाव ने ही उन्हें चिड़चिड़ा बना दिया है। ये सारी बातें समर को एक मला आदमी सिद्ध करती है। ममता और उदारता उसके विशिष्ट गुण है।

(६) आत्म-ग्लानि से पीडित समर - समर स्वभाव से मठा और उदार है। इसलिए यदि भावावेश में आकर वह कोई गलती कर बैठता है, तो मनमें ग्लानि का अनुभव करता है। जिस दिन वह प्रभा को थप्पड़ मार देता है, लेकिन उसके बाद बुरी तरह से पीडित होता है। थप्पड मारने के बाद स्वयं ही सोचने लगता है यह मैंने क्या किया ? यह मैं क्या किया ? मुझे क्या हो गया था ? उसके बाद वह स्वयं को धिक्कारता है नीच, कायर, कमीने। यह तेरा आदर्शवाद है ? यही तेरे महान बनने के सपने है ?

और फिर वह रो उठता है। यह घटना उसके जीवन में एक नया मोड ला देती हैं। वह स्वयं को प्रभा का अपराधी महसूस करने लगता है। अब प्रभा के प्रति उसका सारा आक्रोश गलकर निकल जाता है और वह उसके प्रति ध्यान देने लगता हूँ। प्रभा घर में कितनी मुसीबतें सहती हैं, इन बातों की और उसका ध्यान जाता है। अब प्रभा की सहनशक्ति उसकी दृष्टि में प्रभा का बहुत बडा गुण बन जाती है । मनसे वह प्रभा के समीप आना चाहता है, परन्तु पोछले व्यवहारों का संकोच उसके लिए बाजा बन जाती है। और अन्तमें, अपने चरित्र पर लगाए गए लांछन के कारण कभी भी न रोनेवाली प्रभा को फूट-फूटकर रोता देते, समर के भीतर संकोच का सारा बाँध एकाएक टूट जाता है और वह प्रभा को लिपटाए रातभर रोता रहता है।

(७) समर का कायाकल्प - समर के चरित्र के सम्बन्ध में एक बात विशेष उल्लेखनीय है कि वह प्रारंभ से ही घर में स्वयं को उपेक्षित और एकाकी -सा महसूस करता आ रहा था। बचपन में पिताजी उसे बुरी तरह मारते थे । वह खूब पढ़ना चाहता था, महत्वाकांक्षी था, इसलिए सब लोग उसे स्वार्थी समझाते थे। वह अपने मन की बातें किसी से भी नहीं कह पाता था। दिवाकर मित्र था फिर भी अपना दुःख, अपने घर की आर्थिक दुरावस्था का रोना कभी उसके सामने नहीं प्रकट किया। प्रभा और उसके बीच की कटुता दूर होती है तो उसे नया जीवन-सा मिल जाता है। वह अपने मन की सारी बातें प्रभा को बताने लगता है। ऐसा करनेसे उसे एक सहारा मिल जाता है। 

इसके बाद दोनो भविष्य के सुनहरे सपने देखने लगते हैं। वह हर बात में प्रभा की सलाह लेता है, शिरीश भाई से सुनीं नई नई बातें बताता है। अब उसके मन का संकोच बहुत कुछ दूर हो जाता है। उसमें आत्मविश्वास का संचार होता है। वह आगे पढ़ना चाहता है, परन्तु घर की दशा उसे आगे पढ़ने की इजाजत नहीं देतो | इसलिए वह स्वावलंबी बन स्वयं कमाकर आगे पहने की योजना बनाता है।

उसे आगे पढ़ना है, अपना और प्रभा का भविष्य बनाना है, इसलिए दिवाकर से अपनी स्थिति स्पष्ट कर उससे आग्रह करता है कि वह उसके लिए कोई नौकरी ढूँढै, जिससे वह आगे पढ सके। और नौकरी मिल जाने पर वह घोर परिश्रम करता हुआ कॉलेज जाने लगता है। यह समर पहले से भिन्न एक नया समर है उसका काया कल्प सा हो जाता है। वह एक नया उत्साह सा भरा हुआ आगे बढ़ने लगता है। 

(८) संवेदनशील और अव्यावहारिक- समर स्वप्नदर्शी है, इसलिए व्यवहार कुशलता का उसमें अभाव है। अपनी-अव्यावहारिकता के कारण ही प्रभा के लिए धोती माँगने पर उसे जली कही बातें सुननी पडती है। उसमें यह समझाने की बुद्धि नहीं है कि कौन-सी बात, किस व्यक्ति से और कैसे कहीं जाय। जिससे उसका अच्छा प्रभाव पडे। इसी अनाडीपन के कारण वह प्रेसवाले से लड़ आता है, और फिर ऐसी मनःस्थिति में बाबूजीसे अनुचित बातें करता है। समर के चरित्र की यही कमजोरी उसे बार बार ठोकर खाने को मजबूर करती रहती हैं। भावावेश के क्षणी में वह उचित-अनुचित का ध्यान नहीं रख पाता। 

(९) समर की वैचारिकता - समर स्वभाव से भावुक है, इसलिए किसी भी बातसे शीघ्र ही प्रभावित हो उठता है। आरंभ में वह संघ की शाखा में जाता है। राणाप्रताप और शिवाजी उसके आदर्शों नायक है। राम और कृष्ण का आदर्श उसके लिए उज्ज्वल और अनुकरणीय है। वह आजीवन बारी रहकर देश की सेवा करना चाहता है। हिन्दू समाज और संस्कृति की सभी बातोंको वह श्रेष्ठ और अनुकरणीय मानता हैं। लम्बी चोटी रखता है, संयुक्त परिवार प्रथा में उसकी गहरी आस्था है। तलाक को वह अनुचित और पाप समझाता है। वह हरदम स्वयं को सबसे भिन्न और श्रेष्ठ समझाने के मुगालते में पड़ा रहता है। सादा जीवन और उच्च विचार उसके जीवन का मूलमन्त्र बन गया है।

कॉलेज के अपने साथियोंमै अलग-अलग रहने के कारण सब उसे मनहूस कहते हैं। उसे अभिनेता अभिनेत्रियों की बातें करना, लडकियाको छेड़ना या पीछा करना, राजनीति पर बहस करना आदि सब कुछ बेकार लगता है। इन्हीं बाताने उसे इस नयी चढती उमर में ही बुढा सा बना दिया है। आदर्श के प्रति सच्ची और दृढ-निष्ठा व्यक्ति को एक गहरे उत्साह से भरे रखती हैं। परन्तु समर में अपने आदर्शों के प्रति इस निष्ठा और उत्साह का प्रभाव है। इसी कारण वह स्वयं को निराश और थका हुआ-सा अनुभव करता रहता हैं।

(१०) रुढिवादी विचारों से ग्रस्त - समर अभी विद्यार्थी है, वह भी इन्टर में पढने वाला। अपने साथियों से मिलता जुलता नहीं, इसलिए नये विचारों से उसका परिचय नहीं हो पाता। जब दिवाकर उसकी चोटी, वेशभूषा आदि का मजाक उडाता है तो वह उत्तर देता है। देखो दिवाकर, यह अपने विश्वासों की बात है। हर देश के वस्त्रों, रहन सहन या विचारों को एक संस्कृति होती हैं। हम लोग अपनी संस्कृति का अध्ययन नहीं करते। और इस तरह के लोगों के कारण ही देश की यह हालत होती जा रही। हम लोग पतित होते चले जा रहे है। अपनी चीजों, अपने देवी देवताओं का तो हम यों मजाक उडायेगे और हर विदेशी चीज के पीछे भागेंगे। संघ की आदर्शवादी विचार धारासे भिन्न कुछ भी देखने या सुनने का उसे कभी अवसर ही नहीं मिला। जिस परिवार का वह सदस्य हैं, वह परिवार घोर रूढ़िवादी और परम्परा प्रिय है। उस वातावरण का भी समर पर गहरा प्रभाव है। जब समर चोटी कटवा लेता है। तो बाबूजी उसे खूब फटकारते हैं और वह स्वयं गणेशजी वाली घटना को लेकर प्रभा को नास्तिक कहकर उसे थप्पड देता है। 

(११) अन्ध-विश्वासों का शिकार - समर जिस पारिवारिक व्यवस्था और समाज में रहा नियमों और मान्यताओं के प्रति मन में अन्धविश्वास भरा हुआ है। उसकी मान्यता हैं कि हमारे पूर्वजा ने जो नियम बनाये थे, वे बहुत सोच-समझकर ही बनाये होगे, इसलिए उनका विरोध नहीं किया जाना चाहिए। हमारे यहाँ जो कुछ पहले था, जो कुछ आज हैं वह सब बिल्कुल ठीक और कल्याणकारी। इसीकारण जब शिरीष भाई तलाक और पिता की सम्पति में पुत्री के हिस्से को वकालत करते हैं, तो समर यह कहकर विरोध करता है - इससे हमारे सारे समाज का ढाँचा चरमरा जाएगा । चारों तरफ भयानक गडबडी फैल जायेगी। शादी-विवाह जैसी पवित्र चीज को लोग मन बहलाव का एक साधन बना ली। दो दिन पहले शादी की और फिर तलाक हो गया। इससे अपने यहाँ की सती और आदर्श नारियों की उज्ज्वल परम्परा एकदम लुप्त हो जायेगी। विवाह का आधार या तो स्वार्थ रह जायेगा या वासना का आवेश।

समर की ऐसी बातों को सुनकर शिरीष भाई उसके इस चिन्तन को भावनाओं के आवेश में घुटना कहते हैं, जिसमें तर्क और बुद्धि की कसौटी का कोई स्थान नहीं होता। समर के विचारों में भावनाओं का आवेश मात्र मिलता है, स्वस्थ और यथार्थ पर आधारित चिन्तन नहीं।

(१२) पलायनवादिता - समर भावुकता के आवेश में घुटने वाला युवक है। यही कारण हैं, समर बहुत जल्दी निराश हो जाता है। उसकी निराशावादीता का उदाहरण इस प्रकार हैं उनकी बातकी सच्चाई दिल को चीरती चली गई। नहीं नहीं, मेरे लिए कोई भविष्य नहीं है, कोई जगह नहीं है ... लेकिन घंटे पर पडती चोट की तरह यह बात भी घनघनाता रही कि कही कुछ नहीं हैं.... कोई अपना नहीं हैं.... समर की यही निराशावादिता उसके अन्दर पनपनेवाली पलायनवादी प्रवृतिका कारण है । यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि भावुक व्यक्ति जब निराश होता है तो निराशा की चरम सीमा पर पहुँचकर या तो वह विरक्त होकर घरबार छोडकर भाग खड़ा होता है, या आत्महत्या कर लेता है। समर भावुक हैं, इसीलिए जीवन के संघर्षों से जूझते हुए शीघ्र भाग खडे होने की सोचने लगता है -- यही उसकी पलायनवादी प्रवृत्ति हैं।

समर की यही कायरता अन्तमें उसे यह सोचने पर बाध्य कर देती है कि वह घर छोड दे और वह अनिश्चय की स्थिति में सोचने लगता है -- अब पीछे वाली ट्रेन भी खिसकने लगी थी ... दोनों गाडियाँ दो विरोधी दिशाओं की तरफ सरक रही थी ... मुझे लगा, जैसे मैं तेजी से चक्कर खाते चाक पर खड़ा हूँ...भीतर कोई दुहराये चला जा रहा है... कूद पड... चढ जा ... कूद पड ।... चढ जा।

पलायनवादि वृतिसे उसका मन दुहरी अवस्था में होता है और वह कोई निश्चय नहीं कर सकता।

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