लोक साहित्य की परिभाषा और क्षेत्र बताइये।

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लोक साहित्य की परिभाषा और क्षेत्र बताइये।

लोक साहित्य की परिभाषा

लोक-साहित्य की परिभाषा: विद्वानों ने ‘लोक–साहित्य' की परिभाषा अपने-अपने दृष्टिकोण से देने का प्रयास किया है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में- "ऐसा मान लिया जा सकता है, जो चीजें लोकचित्त से सीधे उत्पन्न होकर सर्वसाधारण को आंदोलित, चालित और प्रभावित करती हैं, वे ही लोक-साहित्य, लोक–शिल्प, लोक–नाट्य, लोक-कथानक आदि नामों से पुकारी जा सकती हैं। परिभाषा में आए शब्द "लोक चित्र' के सन्दर्भ में डॉ. द्विवेदी का कहना है कि 'लोक चित्र से तात्पर्य उस जनता के चित्र से है जो परम्परा-प्रथित और बौद्धिक - विवेचनापरक शास्त्रों और उन पर की गयी टीका-टिप्पणियों के साहित्य से अपरिचित होता है ।"

डॉ. धीरेन्द्र वर्मा के मत में - "वास्तव में लोक साहित्य वह मौखिक अभिव्यक्ति है, जो भले ही किसी व्यक्ति ने गढ़ी हो, पर आज जिसे सामान्य लोक-समूह अपना मानता हैं ।"

डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय ने सुप्रसिद्ध पाश्चात्य लोक-संस्कृति विशारदग्रिम के नाम का उल्लेख करते हुए जनता का जनता के लिए रचा गया, जन काव्य कहकर लोक-साहित्य की निम्न परिभाषा निर्धारित करने का प्रयास किया है - "सभ्यता के प्रभाव से दूर रहने वाली, अपनी सहजावस्था में वर्तमान जो निरक्षर जनता है, उसकी आशा-निराशा, हर्ष-विषाद, जीवन-मरण, लाभ-हानि, सुख - दुःख आदि की अभिव्यंजना जिस साहित्य में प्राप्त होती है, उसे लोक-साहित्य कहते हैं । इस प्रकार लोक-साहित्य जनता का वह साहित्य है जो जनता द्वारा जनता के लिए लिखा गया हो। डॉ. सत्येन्द्र के अनुसार - "लोक-साहित्य' के अन्तर्गत वह समस्त बोली या भाषागत अभिव्यक्ति आती है जिसमें (अ) आदिम मानस के अवशेष उपलब्ध हों, (आ) परम्परागत मौखिक क्रम से उपलब्ध बोली या भाषागत अभिव्यक्ति हो जिसे किसी की कृति न कहा जा सके, जिसे श्रुति ही माना जाता हो, और जो लोकमानस की प्रवृत्ति में समाई हुई हो। (इ) कृतित्म हो किन्तु वह लोक - मानस के सामान्य तत्वों से युक्त हो कि उसके किसी व्यक्तित्व के साथ सम्बनध रहते हुए भी, लोक उसे अपने ही व्यक्तित्व को कृति स्वीकार करे ।

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि लोक-साहित्य, लोकमानस की सहज और मौखिक अभिव्यक्ति है जो परम्परा द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती है। इसका रचियता अज्ञात होता है।

लोक साहित्य का क्षेत्र

लोक साहित्य का क्षेत्र बहुत व्यापक है। लोक-साहित्य के विद्वानों का मत है कि जहां-जहां लोक है, वहीं-वहीं लोक-साहित्य भी उपलब्ध होता है। आदिम जीवन का जो लोक-साहित्य से घनिष्ठ संबंध है। यदि यह कहा जाए कि आदिम जीवन लोक-साहित्य का संस्कार-विधाता है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। पूर्ण सभ्य, सुसंस्कृत जातियों के जीवन में संस्कारों को सम्पन्न करने में जो भूमिका वैदिक मंत्रों की होती है, आदिम जातियों में लोकगीतों की भी वही भूमिका होती है। वास्तव में लोक-जीवन के लिए लोकगीत ही वैदिक मंत्र है। जन्म से लेकर विवाह, मरण आदि तक के विविध अवसरों पर लोकगीत गाने की परम्परा है । सम्पूर्ण वर्ष सभी ऋतुओं में, जीवन के विविध क्रिया-कलापों के अवसर पर लोकगीतों के गाने की परम्परा है। इसी प्रकार बाल्यकाल से ही दादी-नानी की कहानियों से लेकर व्रतों, त्योहारों, पर्वों, उत्सवों, मेलों, तीर्थों, धार्मिक, सामाजिक क्रिया-कलापों के अवसर पर लोकगीतों को गाया जाता है। तात्पर्य यह है कि लोक जीवन का प्रत्येक क्षण लोक-साहित्य से किसी-न-किसी प्रकार सम्बद्ध रहता है। जिस प्रकार मनुष्य का जीवन बहुआयामी है उसी प्रकार लोक-साहित्य का क्षेत्र भी बहुत विस्तृत है ।

डॉ. उपाध्याय के अनुसार, "लोक - साहित्य का विस्तार अत्यन्त व्यापक है। साधारण जनता जिन शब्दों में गाती है, रोती है, हँसती है, खेलती है, उन सबको लोक-साहित्य के अन्तर्गत रखा जा सकता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि लोक - साहित्य की व्यापकता मानव के जन्म से लेकर मृत्यु तक है तथा स्त्री, पुरुष, बच्चे, जवान तथा बूढ़े लोगों की सम्मिलित सम्पत्ति है ।

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