लोक साहित्य का अर्थ, परिभाषा और स्वरूप स्पष्ट कीजिये

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लोक साहित्य का अर्थ, परिभाषा और स्वरूप स्पष्ट कीजिये

साहित्य के क्षेत्र में दो शब्द प्रचलित हैं- शिष्ट साहित्य तथा लोक साहित्य। लोक साहित्य लोक संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग है तथा लोकगीत, लोककथाएं, लोकगाथाएं, कथागीत, धर्मगाथाएं, लोकनाट्य, नौटंकी, रामलीला आदि लोक साहित्य से संबद्ध विषय हैं। शिष्ट साहित्य अथवा परिनिष्ठित साहित्य निश्चित रूप से लिखित साहित्य होता है, जबकि लोक साहित्य अलिखित एवं लिखित दोनों रूपों में उपलब्ध होता है। वैसे तो लोक साहित्य सामान्यतः मौखिक ही रहा है तथा वह मौखिक परंपरा द्वारा ही अनवरत चलता रहता है, परंतु अब शिक्षा एवं छपाई के प्रचार-प्रसार के कारण लोक साहित्य के रूप में बहुत कुछ बदलावा आया है। आज का लोक कवि जो भी नये साहित्य की रचना करता है, वह सब लिपिबद्ध या लिखित होता है। इसके अतिरिक्त लोक साहित्य के संकलन एवं संग्रह तथा शोध में प्रगति होने के फलस्वरूप बहुत-सा लोक साहित्य लिपिबद्ध किया जा रहा है तथा उसको ग्रंथ रूप में प्रकाशित किया जाने लगा है।

लोक साहित्य का अर्थ

लोक साहित्य का जन्म - 'साहित्य' शब्द के पूर्व 'लोक' अभिधान लगाने के बाद उसका अर्थ होगा- लोक का साहित्य 'लोक' का अर्थ जनता-जनार्दन द्वारा लिया जाता है। इसलिए लोक साहित्य का बोध ऐसे साहित्य से होता है, जिसकी रचना जनता-जनार्दन द्वारा की जाती हो । एक विशिष्ट व्यक्ति की रचना न होने का तात्पर्य यही हो सकता है कि जिस साहित्य की रचना एक जन-समूह द्वारा की जाती हो, उसे ही लोक साहित्य कहा जाना चाहिए। जन-समूह की जो भावनाएं- हर्ष, विषाद, भय, प्रेम, शोक आदि होती हैं उनकी सामूहिक अभिव्यक्ति गीत, कथा आदि के रूप में हुई होगी। किसी एक ने एक पंक्ति की मौखिक रचना की होगी तो दूसरे ने उसमें एक और पंक्ति जोड़ दी, तीसरे ने तीसरी पंक्ति रचकर गीत को आगे बढ़ा दिया होगा। इसी प्रकार परवर्ती पीढ़ियों ने इस गीत में संशोधन, परिवर्द्धन किए होंगे और इस प्रकार अनेक लोगों के रचना - सहयोग से जो साहित्य प्रकाश में आया, वही 'लोक साहित्य की श्रेणी में आ गया है। यही कारण है कि लोक साहित्य की विशेषताओं के रूप में निम्नलिखित बिंदुओं का उल्लेख किया जाता है- 

1. लोक साहित्य की रचना का रचनाकार ज्ञात नहीं होता।

2. लोक साहित्य मौखिक परंपरा द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होता चला जाता है।

3. लोक साहित्य की रचना अनेक रचनाकारों के योगदान द्वारा अस्तित्व में आती है अर्थात लोक साहित्य लोक मानस द्वारा रचित होता है।

4. लोक के द्वारा लोक के लिए लोक का साहित्य ही लोक साहित्य कहलाता है।

5. लोक साहित्य सहज, सरल, अकृत्रिम होता है। वह स्वतः स्फूर्त होता है। 

6. लोक साहित्य का कोई शास्त्र नहीं होता अर्थात उसकी रचना के मानदंड पूर्व निर्धारित नहीं होते । लोक साहित्य शास्त्रों के नियमों, बंधनों को स्वीकार नहीं करता । इसका आशय यह है कि लोक साहित्य पर किसी प्रकार के नियम या सिद्धांत प्रभावी नहीं होते । लोकगीतों की रचना के भी छंद, अलंकार आदि संबंधी कोई नियम नहीं होते ।

7. लोक साहित्य में आदिम सभ्यता, अर्द्धसभ्य या असभ्य लोगों या समाजों की भावनाओं, उनके असभ्य जीवन, रहन-सहन आदि का प्रभाव आवश्यक होता है। 

8. लोक साहित्य निश्चय ही किसी जनपदीय बोली के माध्यम से व्यक्त होता है।

लोक साहित्य और परिनिष्ठित साहित्य

लोक साहित्य और परिनिष्ठित साहित्य - लोक साहित्य का संबंध किसी जनपद के आदिम जीवन से होता है। ऐसा अनुमान है कि युगों पूर्व आदिम युग में लोक साहित्य की रचना की गई होगी, इसलिए उसका रचना-काल और रचनाकार भी ज्ञात नहीं होता है। आधुनिक युग और आदिम युग की परिस्थितियों में भारी अंतर है। इस कारण आदिम युग के साहित्य में सहजता, सहज स्फूर्तता और नियम - सिद्धांतों से रहित स्थितियां रही होंगी। इस संबंध में डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय ने निम्नांकित मत व्यक्त किया है-

"एक समय था जब संसार के समस्त देशों में मनुष्य प्रकृति देवी का उपासक था तथा प्राकृतिक जीवन व्यतीत करता था । उस समय उसका आचार-विचार, रहन-सहन सरल तथा स्वाभाविक था । यह आडंबर तथा कृत्रिमता से कोसों दूर रहता था। वह स्वाभाविकता की गोद में पला हुआ जीव था। उसके समस्त क्रिया-कलाप - उठना, बैठना, हंसना, बोलना - स्वाभाविकता में आगे रहते थे। चित के आह्लाद के लिए, मन के अनुरंजन के लिए साहित्य की रचना उस समय भी होती थी और आज भी होती है, परंतु दोनों युगों के साहित्य में जमीन-आसमान का अंतर है। आज का साहित्य अनेक रूढ़ियों, वादों से जकड़ा हुआ है। कविता पिंगलशास्त्र की नपी-तुली नालियों से प्रवाहित होती है, अलंकार के भार से वह बोझिल है, कथाओं में अनेक प्रकार के शिल्प विधान (टैक्नीक) को ध्यान में रखना पड़ता है तथा नाटकों की रचना में अनेक नाटकीय नियमों का पालन करना पड़ता है, परंतु जिस युग की हम चर्चा कर रहे हैं, उस युग के साहित्य का प्रधान गुण था - स्वाभाविकता, स्वच्छंदता तथा सरलता । वह साहित्य उतना ही स्वाभाविक था जितना जंगल में खिलने वाला फूल, उतना ही स्वच्छंद था जितना आकाश में विचरने वाली चिड़िया, उतना ही सरल तथा पवित्र था जितना गंगा की निर्मल धारा । उस समय के साहित्य का जो अंश आज अवशिष्ट तथा सुरक्षित रह गया है, वही हमें लोक साहित्य के रूप में उपलब्ध होता है।"

लोक साहित्य की परिभाषा

लोक साहित्य की परिभाषा - लोक साहित्य की उपर्यक्त विशेषताओं के आधार पर कोई ऐसी पूर्ण तथा सर्वमान्य परिभाषा विद्वानों द्वारा आज तक नहीं दी जा सकी है जिसके आधार पर लोक साहित्य की कोई पहचान स्थापित की जा सके। फिर भी अनेक विद्वानों ने 'लोक साहित्य' की परिभाषा अपने-अपने दृष्टिकोणों से देने का प्रयास तो किया ही है। इसलिए पहले हम कुछ प्रमुख विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाएं निम्न क्रम में उधृत कर रहे हैं - 

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में- "ऐसा मान लिया जा सकता है, जो चीजें लोकचित्त से सीधे उत्पन्न होकर सर्वसाधारण को आंदोलित, चालित और प्रभावित करती हैं, वे ही लोक साहित्य, लोकशिल्प, लोकनाट्य, लोक-कथानक आदि नामों से पुकारी जा सकती हैं।"

उपर्युक्त परिभाषा में यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि आचार्य द्विवेदी ने 'लोकचित्त' शब्द का प्रयोग किया है। लोकचित्त से द्विवेदी जी का आशय परंपरा प्रस्थित और बौद्धिक विवेचनापरक शास्त्रों और ऊपर की गई टीका-टिप्पणियों के साहित्य से अपरिचित जन-शक्ति या बुद्धि से है ।

डॉ. सत्येन्द्र के अनुसार - लोक साहित्य के अंतर्गत वह समस्त बोली या भाषागत अभिव्यक्ति आती है, जिसमें - 

1. आदिम मानस के अवशेष उपलब्ध हों ।

2. परंपरागत मौखिक क्रम से उपलब्ध बोली या भाषागत अभिव्यक्ति हो, जिसे किसी की कृति न कहा जा सके, जिसे श्रुति ही माना जाता हो और लोक मानस की प्रवृत्ति में समायी हुई हो ।

3. वह कृतित्व हो, किंतु वह लोक मानस के सामान्य तत्वों से ऐसे युक्त हो कि उसके किसी व्यक्तित्व के साथ संबद्ध रहते हुए भी, लोक उसे अपने ही व्यक्तित्व की कृति स्वीकार करें। 

डॉ. रवीन्द्र भ्रमर के अनुसार 'लोक साहित्य लोक मानस की सहज और स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। यह बहुधा अलिखित ही रहता है और अपनी मौखिक परंपरा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक आगे बढ़ाता रहता है। इस साहित्य के रचयिता का नाम प्रायः अज्ञात रहता है। लोक का प्राणी जो कुछ कहता- सुनता है, उसे समूह की वाणी बनाकर और समूह में घुल-मिलकर ही कहता है। सम्भवतः लोक साहित्य लोक-संस्कृति का वास्तविक प्रतिबिम्ब भी होता है। अभिजात, परिष्कृत या लिखित साहित्य के प्रतिकूल लोक साहित्य परिमार्जित भाषा, शास्त्रीय रचना पद्धति और व्याकरणिक नियमों से मुक्त रहता है। लोकभाषा के माध्यम से लोकचिंता की अकृत्रिम अभिव्यक्ति लोक साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता है।' 

डॉ. धीरेन्द्र वर्मा के मत में "वास्तव में लोक साहित्य वह मौखिक अभिव्यक्ति है, जो भले ही किसी व्यक्ति ने गढ़ी हो, पर आज जिसे सामान्य लोक-समूह अपना मानता है।" 

डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय ने सुप्रसिद्ध पाश्चात्य लोक संस्कृति - विशारद ग्रिम के नाम का उल्लेख करते हुए जनता का जनता के लिए रचा गया, जनकाव्य कहकर लोक साहित्य की निम्न परिभाषा निर्धारित करने का प्रयास किया है- 

"सभ्यता के प्रभाव से दूर रहने वाली, अपनी सहजावस्था में वर्तमान जो निरक्षर जनता है, उसकी आशा-निराशा, हर्ष-विषाद, जीवन-मरण, लाभ-हानि, सुख-दुःख आदि की अभिव्यंजना जिस साहित्य में प्राप्त होती है, उसे लोक साहित्य कहते हैं। इस प्रकार लोक साहित्य जनता का वह साहित्य है जो जनता द्वारा जनता के लिए लिखा गया हो।" 

डॉ. कुन्दनलाल उप्रेती ने निष्कर्ष स्वरूप लोक साहित्य की एक परिभाषा देने का प्रयास किया है, जो निम्न प्रकार है- 

"अतः आदिम मानव के मस्तिष्क की सीधी तथा सच्ची अभिव्यक्ति ही लोक संस्कृति तथा लोक साहित्य है। हमारे विचार में लोक साहित्य लोक समूह द्वारा स्वीकृत व्यक्ति की परंपरागत मौखिक क्रम से प्राप्त वह वाणी है, जिसमें लोक मानस संगृहीत रहता है।"

डॉ. उप्रैती ने 'लोक साहित्य की अपनी परिभाषा में डॉ. सत्येन्द्र, डॉ. कृष्ण देव उपाध्याय एवं डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा प्रस्तुत परिभाषाओं की विशेषताओं को संयुक्त किया है। 

उपर्युक्त सभी विद्वानों की परिभाषाओं में प्रायः सभी ने एक तथ्य का अवश्य उल्लेख किया है कि इसके रचयिता का पता नहीं होता। कभी-कभी इस तथ्य का इस रूप में भी उल्लेख किया गया है कि यह लोक साहित्य लोक मानस की कृति होती है। इस संबंध में एक प्रश्न अनायास ही उपस्थित होता है कि क्या लोक साहित्य के अंतर्गत सम्मिलित होने वाली सभी रचनाएं एक व्यक्ति द्वारा रचित नहीं होतीं ? क्या लोक ही उनका रचयिता होता है ? इस संबंध में लोक साहित्य की रचना प्रक्रिया पर स्पष्टतया विचार किया जाना वास्तविकता यह है कि लोक साहित्य के अंतर्गत आने वाली रचनाएं व्यक्ति-विशेष द्वारा रची गई होती हैं, किंतु उन पर लोक की ऐसी खराद लगती है कि मूल रचना का कभी-कभी तो स्वरूप ही बदल जाता है। ऐसे विभिन्न परिवर्तनों की प्रक्रिया से होकर वाली रचनाएं वास्तव में एक व्यक्ति की पृथक या स्वतंत्र रचना नहीं होती, वरन् ऐसी रचनाओं को लोक की रचनाएं या लोकमानस की कृति के नाम से पुकारा जाता है। 

लोक साहित्य की उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर एक सामान्य परिभाषा निम्नानुसार प्रस्तुत की जा सकती है -

• लोक साहित्य वह रचना अथवा अभिव्यक्ति है, जिसका रचनाकार ज्ञात नहीं होता, जो मौखिक परंपरा से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक निरंतर चलती जाती है, जो किसी जनपद के लोक जीवन और लोक-संस्कृति की अभिव्यक्ति जनपदीय बोली के माध्यम से करती है, जिसे किसी शास्त्रीय सिद्धांतों का बंधन स्वीकार्य नहीं होता और जो सहज, स्वतः स्फूर्त जनमानस की अनुभूतियों को व्यक्त करती है। इसी अर्थ में किसी भाषा के शिष्ट या परिनिष्ठत साहित्य से वह भिन्न होती है, क्योंकि शिष्ट साहित्य की रचना लिखित रूप में, पृथक् रूप वाली, लिखित या प्रकाशित कृति होती है और उसका रचनाकार ज्ञात होता है तथा उसकी वैयक्तिक अनुभूति का ही उसमें अभिव्यंजन होता है।

• इस संबंध में यह भी ज्ञातव्य है कि लोक साहित्य की उपर्यक्त जितनी भी परिभाषाएं, विद्वानों द्वारा दी गई हैं, उन पर अधिकांश रूप में पाश्चात्य लोक संस्कृतिविदों का प्रभाव परिलक्षित होता है। किसी भी परिभाषा को मौलिक तथा पूर्ण अथवा निर्दोष नहीं माना जा सकता है।

लोक साहित्य के स्वरूप की विशेषताएं

लोक साहित्य के स्वरूप की विशेषताएं- लोक साहित्य की उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर लोक साहित्य की निम्नांकित विशेषताओं का उल्लेख किया जा सकता है

1. रचनाकार ज्ञात नहीं होता - लोक साहित्य का रचनाकार ज्ञात नहीं होता। यह मौखिक परंपरा द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक निरंतर चलता जाता है। लोक साहित्य की रचना अनेक रचनाकारों के योगदान से अस्तित्व में आती है। 

2 जनपदीय बोली में अभिव्यक्ति - लोक साहित्य की अभिव्यक्ति किसी जनपद की बोली के माध्यम से होती है। इसमें लोक जीवन और लोक संस्कृति की झांकी जनपदीय बोली में चित्रित जाती है।

3. शास्त्रीय सिद्धांतों के बंधन से मुक्त - लोक साहित्य शास्त्रीय सिद्धांतों के बंधन से पूर्णतः मुक्त होता है। इसकी रचना के मानदंड पूर्व निर्धारित नहीं होते। लोकगीतों की रचना के छंद, अलंकार संबंधी कोई नियम नहीं होते । 

4. सहज, सरल और अकृत्रिम - लोक साहित्य में कोई आडंबर नहीं होता, वरन् वह सहज, सरल और अकृत्रिम होता है। वह स्वतः स्फूर्त होता है। 

5. अर्द्ध सभ्य समाजों की भावनाओं का चित्रण - लोक साहित्य में आदिम सभ्यता, अर्द्ध सभ्य या असभ्य समाजों की भावनाओं की अभिव्यक्ति होती है। इन समाजों से जुड़े रीति-रिवाजों और संस्कारों की झांकी उस समाज की बोली के माध्यम से लोक गीतों में चित्रित की जाती है।

उपर्युक्त विशेषताओं में सर्वाधिक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि लोक साहित्य का रचनाकार शास्त्रीय सिद्धांतों से परिचित नहीं होता। न तो वह रस या रसावयवों से परिचित होता है और न वह अलंकार - विधान, भाषायी गुण, रीतिवृत्त आदि से ही परिचित होता है और न वह पिंगलशास्त्र का ही ज्ञाता होता है, तथापि, उसकी वाणी में काव्य के वे सभी तत्व विद्यमान होते हैं, जिन्हें शिष्ट साहित्य के रूप विधायक तत्वों के रूप में मानकता मिली हुई है। यदि अंतर है तो केवल इतना कि लोक साहित्य में अनुभूति सहज, अभिव्यक्ति सरल और अकृत्रिम तथा शास्त्रीय नियमों के बंधन को नकाराती हुई स्वच्छंद बनी रहती है। परिणामतः लोककाव्य में छंद रचना के नियमों का निर्वाह नहीं किया जाता, तुकांत का ठीक से पालन नहीं किया गया होता है। जो अलंकार आते हैं, वे सभी सहज स्वाभाविक और आयाम रहित होते हैं। आशय यह है कि लोक साहित्य की विशेषताओं के अंतर्गत निम्नलिखित बातें भी सम्मिलित की जा सकती हैं-

  1. लोकानुभूति
  2. जनपदीय बोली की शब्दावली।
  3. सहज प्रवाह।
  4. स्वच्छंद विधान (शास्त्रीय नियमों का बंधन नहीं)
  5. लयपूर्ण गेयता की प्रधानता (लोक कथाओं को छोड़कर)
  6. आदिम मन की अभिव्यक्ति (आदिम जीवन की अभिव्यक्ति)
  7. लोकजीवन- लोक संस्कृति की अभिव्यक्ति, (रूढ़ियों, परंपराओं, प्रथाओं, लोक विश्वासों, व्रतों, त्योहारों, पर्वों, उत्सवों की प्रधानता )
  8. अर्द्ध सभ्य, असभ्य जातियों के जीवन, रहन-सहन की अभिव्यक्ति । 

उपर्युक्त विशेषताओं को ही लोक साहित्य के रूप विधायक तत्वों के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। अतः निष्कर्ष रूप से कहा जा सकता है कि लोक साहित्य सहज, सरल, स्वच्छंद अभिव्यक्ति का नाम है, जो किसी प्रकार के शास्त्रीय नियमों का नहीं करता और अनगढ़, अकृत्रिम तथा कलात्मक अभिव्यक्ति से कोसों दूर रहता है।

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