लोक साहित्य की परिभाषा और विशेषताएं लिखिए

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लोक साहित्य की परिभाषा और विशेषताएं लिखिए

लोक साहित्य की परिभाषा

लोक साहित्य की परिभाषा: समग्र रूप में 'लोक' शब्द का प्रयोग उस जन-समूह के लिए किया जाता है, जो साज-सज्जा, ऊपरी दिखावा, सभ्यता एवं शिक्षा आदि से दूर आदिम मनोवृत्तियों से युक्त होता है। इस प्रकार वैदिक काल से लेकर अब तक 'लोक' शब्द का प्रयोग प्रायः समान अर्थों में अनवरत रूप में प्राप्त होता है। दृष्टव्य यह है कि 'लोक' शब्द का प्रयोग लोक-कल्याण अथवा लोक-संग्रह के संदर्भों में किया जाता है । 'लोक' शब्द का प्रयोग प्राचीन काल से हो रहा है। ऋग्वेद में 'लोक' शब्द जन के पर्यायवाची शब्द के रूप में प्रयुक्त हुआ है । पुरुष सूक्त में इसका अर्थ जीव तथा स्थान है। अथर्ववेद में इसका अभिप्राय पार्थिव और दिव्य दो लोकों से है। पाणिनी ने 'लोक' से वेद की सत्ता को अलग स्वीकार का है। 'महाभारत' में 'लोक' शब्द का अर्थ साधारण जनता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का मत भी यही है। पुराणों में 'लोक' शब्द स्थान के पर्यायवाची रूप में प्रयुक्त हुआ है, इसी कारण से हिन्दी में 'लोग' शब्द बना जिसका अर्थ है- सामान्य जन। इसी अर्थ में 'लोक' शब्द साहित्य शब्द से पहले जुड़कर विशेषण के रूप में प्रयुक्त हुआ है।

भरत मुनि के नाट्य शास्त्र में भी 'लोक' शब्द का प्रयोग सटीक रूप में किया गया है। भरत मुनि के नाट्य शास्त्र में स्वयं लिखा है कि इस शास्त्र की रचना लोक मनोरंजनार्थ की जा रही है। वास्तव में 'लोक' शब्द अंग्रेजी भाषा के शब्द 'फोक' का ही हिंदी रूपांतर है। अंग्रेजी के 'फोन' शब्द का प्रयोग अशिक्षित, अर्दशिक्षित, असभ्य, अर्द्धसभ्य वर्ग के लिए किया जाता है। अतः जो विद्वान व्यक्ति 'लोक' शब्द का प्रयोग सरल ग्रामीणों के लिए करते हैं, वपे सामान्य दृष्टिकोण से 'लोक' शब्द तथा ग्रामीणों दोनों के प्रति अन्यपाय करते हैं। अतः निष्कर्ष रूप में प्रसिद्ध साहित्य डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा दिए हुए 'लोक' के अर्थ को स्वीकार किया जा सकता है, यथा- 

"लोक शद का अर्थ जनपद या ग्राम्य नहीं है, बल्कि नगरों और ग्रामों में फैली हुई वह समूची जनता है, जिसके व्यावहारिक ज्ञान का आधार पोथियां नहीं हैं।" उसी तरह लोक साहित्य के प्रसिद्ध विद्वान डॉ कृष्णदेव उपाध्याय ने लोक का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है कि जो लोग संस्कृत या परिष्कृत वर्ग से प्रभावित न होकर अपनी पुरातन स्थितियों में ही रहते हैं, वे 'लोक' होते हैं। 

हिन्दी के कुछ विद्वान 'जन' शब्द को 'लोक' शब्द के अर्थ में प्रयुक्त करते हैं। ये विद्वान 'लोक' और 'जन' को पर्यायवाची मानते हैं। अपने मत की पुष्टि में वे अन्यत्र दिए हुए एवं शब्द कोशों में उल्लेख किए हुए 'लोक' शब्द के विभिन्न अर्थों में 'जन' अर्थ को उद्धृत करते। उदाहरणतः डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल ने 'जन' शब्द का प्रयोग ग्रम्य के अर्थ में किया है। डॉ. सत्येन्द्र ने 'लोक' शब्द को व्यापक तथा 'जन' शब्द को संकीर्णता का बोधक माना है। 

विद्वानों और समीक्षकों की दृष्टि से डॉ. पाण्डेय 'लोक' शब्द के सतही अर्थ तक ही सीमित रह गए। यदि इस शब्द के अर्थ का गंभीरता से विश्लेषण किया जाए तो हम देखेंगे कि 'लोक' शब्द समाज की सूक्ष्म स्थिति यानी उसके अमूर्त भाव का बोधक है, जबकि 'जन' शब्द अपने अर्थ में स्थूलता वाचक है और जनता शब्द के अधिक निकट है। अतः 'जन' शब्द को 'जनता' शब्द के साथ संबंधित किया जा सकता है। परंतु इस संदर्भ में यह तथ्य भी दृष्ट्व्य है कि 'जनपद' शब्द का प्रयोग हमारे प्राचीनतम ग्रंथों में उपलब्ध होता है और उसका प्रयोग बहुलतापूर्वक किया गया है। आदि ग्रंथ वाल्मीकि रामायण में रामराज्य के वर्णन में उसका प्रयोग 'जनपद शब्द का प्रयोग प्राप्त होता है। अतएव 'जन' शब्द की प्राचीनता और उसकी सार्थकता पर प्रश्न - चिह्न लगाने का कोई प्रश्न ही उत्पन्न नही होता है।

परवर्ती संस्कृति एवं पाली के साहित्यिक ग्रंथों में 'जन' शब्द का प्रयोग ‘मानव समाज' के अर्थ में किया जाता है। आधुनिक राजनीतिक शब्दावली में 'जनता' के अर्थ में 'जन' शब्द प्रयुक्त किया गया है। इस दृष्टि से 'जन' और 'लोक' शब्द प्रायः समानार्थी ठहरते हैं। दोनों में अंतर केवल यही है कि 'जन' मूर्त स्वरूप है और 'लोक' अमूर्त स्वरूप है।

अतः इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि 'लोक' वस्तु अंग्रेजी भाषा के 'फोक' शब्द का हिन्दी रूपांतर समझा जा सकता है और लोक साहित्य के संदर्भ में 'लोक' शब्द का प्रयोग ही सब दृष्टियों से उपयुक्त एवं उचित है। आज लोक-साहित्य शब्द लोक प्रचलित एवं लोकमान्य हो गया है। लोक साहित्य को जन साहित्य कहना एक प्रकार से नये विवाद एवं भान्ति को जन्म देता है।

लोक साहित्य की विशेषताएँ

लोक-साहित्य की विशेषताओं के रूप में निम्नलिखित बिंदुओं का उल्लेख किया जाता है-

1. लोक साहित्य मौखिक परंपरा द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होता चला जाता है।

2. लोक - साहित्य की रचना अनेक रचनाकारों के योगदान द्वारा अस्तित्व में आती है अर्थात् लोक-साहित्य लोक मानस द्वारा रचित होता है।

3. लोक के द्वारा लोक के लिए, लोक का साहित्य ही लोक-साहित्य कहलाता है।

4. लोक साहित्य सहज, सरल, अकृत्रिम होता है। वह स्वतः सपूर्ति होता है।

5. लोक-साहित्य का कोई शास्त्र नहीं होता अर्थात् उसकी रचना के मानदंड पूर्व निर्धारित नहीं होते । लोक - साहित्य शास्त्रों के नियमों, बंधनों को स्वीकार नहीं करता। इसका आशय यह है कि लोक - साहित्य पर किसी प्रकार के नियम या सिद्धांत प्रभावी नहीं होते। लोकगीतों की रचना के भी छंद, अलंकार आदि संबंधी कोई नियम नहीं होते।

6. लोक-साहित्य में आदिम सभ्यता, अर्द्धसभ्य या असभ्य लोगों या समाजों की भावनाओं, उनके असभ्य जीवन, रहन-सहन आदि का प्रभाव आवश्यक होता है।

7. लोक - साहित्य निश्चय ही किसी जनपदीय बोली के माध्यम से व्यक्त होता है।

8. लोक - साहित्य का कोई रचयिता नहीं माना जाता, इसे लोकमानस की कृति कहा जाता है।

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