कफन कहानी की कथावस्तु लिखिए

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कफन कहानी की कथावस्तु लिखिए।

कफ़न प्रेमचन्द की आखिरी कहानी है। इस लेख में कफ़न कहानी की कथावस्तु का वर्णन किया गया है। कफ़न प्रेमचंद द्वारा रचित कथासंग्रह है। इसमें प्रेमचंद की अंतिम कहानी कफन के साथ अन्य १३ कहानियाँ संकलित हैं। कफन एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की कहानी है जो श्रम के प्रति आदमी में हतोत्साह पैदा करती है क्योंकि उस श्रम की कोई सार्थकता उसे नहीं दिखायी देती है। 
कफन की कथावस्तु

'कफ़न' कहानी प्रेमचन्द की सम्पूर्ण कहानियों में सबसे अधिक चर्चित कहानी है। किसी घटना को केन्द्र में रखकर सामान्यतः प्रेमचन्द जी किसी मनःस्थिति या व्यापक रूप से जीवन- स्थिति का उत्थापन करते हैं । 'कफन' में एक ही केन्द्रिय घटना है बुधिया की मृत्यु । कफन कहानी का कथावस्तु इसी घटना को जीवन की सामान्य किन्तु व्यापक परिस्थिति को केन्द्र में रखकर निर्मित है। कहानी की समाप्ति बिना किसी पूरक घटना के होती है, इसलिए ऐसा लगता है कि कहानी की सम्पूर्ण गति एक बार फिर इसी केन्द्र की ओर लौट जाती है।

कफन कहानी की कथावस्तु

कफन कहानी का कथा-सूत्र बहुत छोटा है। कहानी एक दलित परिवार की है। परिवार में घीसू और माधव पिता-पुत्र हैं। घीसू की पत्नी मर चुकी है। माधव का विवाह एक वर्ष पूर्व हुआ है। उसकी जवान पत्नी बुधिया कोठरी के भीतर प्रसव पीड़ा से छटपटा रही है। बाहर अलाव के पास बैठे हुए पिता-पुत्र आलू भूनकर खा रहे हैं। दोनों में से कोई भी भीतर बुधिया को देखने जाने के लिए इसलिए तैयार नहीं कि उसकी अनुपस्थिति में दूसरा सारे आलुओं को चट कर जायेगा । पिता-पुत्र आलू खाकर सो जाते हैं। बुधिया कराहते - कराहते दम तोड़ देती है। सवेरे माधव कोठरी में जाकर देखता है कि उसकी पत्नी मर चुकी है। पिता-पुत्र हाय-हाय करके रोने लगते हैं। घीसू लकड़ी और कफ़न के लिए गाँववालों से सहायता माँगता है। ज़मीदार साहब दोनों के निठल्लेपन को जानते हुए भी दो रुपयों की सहायता करके अपना फर्ज निभाते हैं। पिता-पुत्र कफ़न खरीदने बाज़ार जाते हैं। दिन-भर बज़ार में चक्कर लगाते हैं। उन्हें कफ़न के लिए कोई कपड़ा पसन्द नहीं आता। शाम होने पर दोनों उस पैसे से शराब पीते हैं और पेट भर पूरियाँ खाते हैं। दोनों आपस में बात करते हैं कि एक न एक दिन तो हम भी वहाँ जायेंगे जहाँ बुधिया गयी है। अगर वह पूछेगी कि तुमने हमें कफ़न क्यों नहीं दिया तो क्या जवाब देंगे ? घीसू माधव को डाँटकर कहता है कि उसे कफ़न मिलेगा और वही लोग देंगे, जिन्होंने पहले दिया था। पूरियाँ खा-पीकर दोनों तृप्ति का अनुभव करते हैं और यह विश्वास प्रकट करते हैं कि बुधिया अवश्य बैकुण्ठ में जायेगी क्योंकि मरकर भी उसने दोनों की ज़िन्दगी की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर दी। नशे के सरूर में दोनों गाने लगते हैं- 'ठगिनी क्यों नैना झमकावे ।' गाते-गाते नशे में मदमस्त होकर वहीं गिर पड़ते हैं। कहानी यहीं समाप्त हो जाती है।

ऊपर से देखने पर कथानक अतिरंजित और अविश्वसनीय लगता है। आज भी ऐसे पतित मनुष्यों की कल्पना नहीं की जा सकती, जो कफ़न के पैसे से शराब पीने लगें किन्तु प्रेमचन्द जिस बात को उभारना चाहते थे वह यह कि मनुष्य के स्वभाव और चरित्र के निर्माण में समाज के आर्थिक ढाँचे की भूमिका ही निर्णायक होती है। अतः कहानी की कथावस्तु इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण भी है और सफल भी।

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