Saturday, 11 June 2022

अनुवाद की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए।

अनुवाद की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए।

अनुवाद की प्रक्रिया को स्पष्ट कीजिए।

अनुवाद की प्रक्रिया और महत्व

अनुवाद वास्तव में एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें अभ्यास का बड़ा महत्व होता है। किसी भी पाठ्यक्रम में अनुवाद की परीक्षा उत्तीर्ण करने मात्र से कोई अनुवादक बन जाए, यह संभव नहीं होता। अच्छा अनुवादक बनने के लिए लगातार अभ्यास करते रहना अनिवार्य है। ऐसा देखा गया है कि अनुवाद के किसी पाठ्यक्रम में परीक्षा परिणाम उत्तम रहने पर भी यदि संबंधित अनुवादक अभ्यास जारी नहीं रखेगा तो वह उत्तम अनुवादक नहीं बना रह सकता है, जबकि अभ्यासरत अति सामान्य परीक्षा-परिणाम वाला अनुवादक भी उत्तम अनुवादक बन सकता है। इसलिए अच्छा अनुवादक बनने के लिए लगातार अभ्यास और अनुवाद चिंतन करते रहना चाहिए। 

नाइडा के अनुसार अनुवाद प्रक्रिया के तीन चरण हैं

1. विश्लेषण

2. अंतरण 

3. पुनर्गठन

अर्थात् स्त्रोत भाषा के मूल पाठ का पहले विश्लेषण किया जाए। फिर दूसरी भाषा अर्थात् लक्ष्य भाषा में उसका अंतरण किया जाए और अंतरण को भाषागत एवं भावगत तथ्यों की दृष्टि से पुनर्गठित किया जाए, जिसे पुनगर्छन कहा है। इन्हीं तीन चरणों को डा. भोलानाथ तिवारी ने इस प्रकार रखा हैं : -

1. मूल का पाठबोधन

2. विश्लेषण

3. भाषांतरण

4. समायोजन

5. मूल सामग्री से तुलना 

6. पुनरीक्षण

मूल का पाठबोधन से तात्पर्य है कि सावधानी से पढ़कर मूल पाठ के आशय को समझें और अर्थ की खोज करें। कभी-कभी मूल पाठ में वर्तनी आदि की भूलें भी होती है, उन पर भी अति सावधानी से ध्यान दें।

विश्लेषण से तात्पर्य है कि इस बात पर चिंतन करें कि मूल पाठ का क्या उद्देश्य है। उसका अर्थ क्या है और उसके व्यक्त करने का तरीका क्या है।

भाषांतरण से तात्पर्य है कि स्त्रोत भाषा के पाठबोधन और विश्लेषण के द्वारा जो कुछ भी स्पष्ट हो पाया उसे लक्ष्य भाषा में अंतरित कर दिया जाए।

समायोजन से तात्पर्य है कि यदि भाषांतरण करते समय वास्तविक अर्थ की प्राप्ति नहीं हो रही है तो शब्दों, वाक्यांशों आदि को ठीक क्रम में रखा जाए ताकि अपेक्षित अर्थ की प्राप्ति हो सके।

मूल सामग्री से तुलना का तात्पर्य है कि उपर्युक्त सभी बातों का ध्यान रखने पर जो अनूदित पाठ तैयार हुआ है वह मूल पाठ के कितने नजदीक है, अर्थात् मूल पाठ और अनूदित पाठ की दूरी जितनी कम हो सके उसका प्रयास करना चाहिए ताकि अनूदित पाठ भी मूल पाठ जैसा लगे।

पुनरीक्षण से तात्पर्य है कि अनुवादक को अपने द्वारा अनूदित पाठ को कम से कम एक बार अवश्य दुबारा देखना चाहिए। इसके पश्चात् किसी अन्य व्यिक्त को भी उसे देखना चाहिए। इस दौरान अर्थ की पूर्ण संप्रेषणीयता, समतुल्यता, एकरूपता, सही शब्द चयन और शब्दों की निश्चितता सुनिश्चित की जा सके।

उपर्युक्त बातों से स्पष्ट है कि अनुवाद एक बहुचरणीय मानसिक प्रक्रिया है और अनुवादक को स्वाभाविक रूप से इन चरणों अर्थात् इन सोपानों से गुजरना होता है। मोटे तौर पर मैं यह कहना चाहूंगा कि प्रत्येक अनुवादक को शुरू में शाब्दिक अनुवाद ही करना होता है, अर्थ को समझकर शाब्दिक अनुवाद करने के बाद यदि उसमें बोधगम्यता नहीं आ पा रही हो या उसके आधार पर कोई प्रक्रिया संभव न हो पा रही है तो फिर मूल पाठ की भावना को ठीक से समझकर प्रासंगिक अर्थ लेना चाहिए। ऐसा करने के लिए शब्दों का समायोजन और वाक्यों का पुनर्गठन आवश्यक हो सकता है। अनुवाद करने के बाद प्रत्येक अनुवादक को उसे एक बार अवश्य पढ़ना चाहिए और देखना चाहिए कि मूल में जो भाव व्यक्त किया गया है कि वह अनुवाद में भी पूरी तरह आ पाया है या नहीं। इसी प्रकार यदि मूल पाठ किसी प्रक्रिया से संबंधित हो तो यह अवश्य देखना चाहिए कि जिन लोगों को स्त्रोत भाषा का ज्ञान न हो या जो लोग लक्ष्य भाषा के पाठ के आधार पर वहीं प्रक्रिया करना चाहते हो उनके लिए भी लक्ष्य भाषा के पाठ के आधार पर पूरी प्रक्रिया करना संभव हो सके।

अनुवाद, शब्दानुवाद हो या भावानुवाद इस पर भी काफी चर्चा होती है, लेकिन मैं यह महसूस करता हूँ कि आवश्यक होने पर अनुवादक शब्दानुवाद और भावानुवाद दोनों का ही सहारा लेता है, इसलिए इनके बीच में कोई सीमा रेखा खींच पाना संभव नहीं है। 

अनुवाद की कसौटी

अनुवाद की कसौटी विद्वानों ने यह बताई है कि वह मूल जैसा पढ़ा जाए (It should read like original) इसमें जैसा या Like शब्द ध्यान देने योग्य हैं, क्योंकि जैसा या Like के यहां पर दो अर्थ हैं, जैसा शब्द से एक तात्पर्य तो यह है कि मूल में जो तथ्य है या जो कथ्य है वह सत्यता के साथ अनुवाद में भी आना चाहिए। जैसा शब्द से दूसरा तात्पर्य यह है कि भाषा के प्रवाह (Flow) की दृष्टि से इसमें ऐसा प्रवाह ऐसा Flow रहना चाहिए कि ऐसा प्रतीत हो कि मूल रूंप से यह लक्ष्य भाषा में ही लिखा गया हो।

यदि कोई अनुवादक इन उपर्युक्त बातों का निर्वाह कर सके तो वास्तव में वही सफल अनुवादक कहलाएगा और ऐसे अनुवाद को ही सफल अनुवाद कहा जा सकता है। वास्तव में यदि अनुवादक को स्त्रोत भाषा का अच्छा ज्ञान होगा तो वह उसके तथ्य या कथ्य को भली-भांति समझेगा और यदि अनुवादक का लक्ष्य भाषा पर अधिकार है तो वह लक्ष्य भाषा में किए गए अनुवाद में भाषा के प्रवाह को बनाए रखेगा। इससे यह बात भी स्पष्ट होती है कि अनुवादक को स्त्रोत भाषा का अच्छा ज्ञान होना चाहिए और लक्ष्य भाषा पर भी उसका पूरा अधिकार होना चाहिए। निष्कर्ष - उपर्युक्त पर विचार करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि ---

1. अनुवाद में दो भाषाओं से संबंध होता है। जिस भाषा से अनुवाद करते हैं उसे स्त्रोत भाषा या Source Language कहते हैं और जिस भाषा में अनुवाद करते हैं उसे लक्ष्य भाषा या Target Language कहते हैं।

2. अनुवाद एक भाषा में व्यक्त विचारों को दूसरी भाषा में व्यक्त करने का प्रयास है अर्थात् मुख्यत: भाषान्तर की प्रक्रिया है और गंभीरता से किया जाने वाला प्रयास है।

3. अनुवाद में अर्थ एवं शैली दोनों ही दृष्टियों से स्त्रोत भाषा के संदेश को लक्ष्य भाषा में निकटतम सहज और समतुल्यता के साथ प्रस्तुत किया जाता है।

4. अनुवाद में स्त्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा के सामाजिक सांस्कृतिक संदर्भो को ओझल नहीं होने दिया जाता है। वास्तव में अनुवाद दो संस्कृतियों के बीच सेतु का कार्य करता है। 

5. अनुवाद का मूल प्रयोजन कथ्य को समग्र रूप से अंतरित करना है, किन्तु वह रूप (Form) की उपेक्षा नहीं करता है। 

6. अनुवाद वास्तव में व्याख्या नहीं है पर आवश्यकता पड़ने पर अनुवादक को व्याख्या का सहारा ले सकता है।

7. अनुवाद मूल सामग्री की पुनर्संरचना (Re-creation) है। इसलिए अनुवाद में लक्ष्य भाषा की प्रकृति एवं अभिव्यक्तिकी स्वाभाविकता पर पूरा ध्यान दिया जाता है।

8. ध्यान रहे कि शब्द और अर्थ का कोई स्थायी संबंध नहीं है। समाज जिस अर्थ में किसी शब्द का प्रयोग करता है। अनुवादक को भी उसी अर्थ में उस शब्द का प्रयोग करना चाहिए।

9. स्त्रोत भाषा और उसके अर्थ की पारस्परिकता और लक्ष्य भाषा और उसके अर्थ की पारस्परिकता तथा स्त्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा की संरचना, इन सबके समन्वय का प्रयास अनुवाद है। 

10. स्त्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा दो समानांतर रेखाएं होती हैं, उनकी परस्पर दूरी को कम करने का प्रयास अनुवाद है। 

11. अनुवाद भाषांतरण का शब्द जाल नहीं है अपितु संप्रेषण का सरल, सहज और सटीक प्रयास है। - डा. कुसुम अग्रवाल

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