Sunday, 3 April 2022

भारत में जनसंख्या के वितरण का वर्णन कीजिए

भारत में जनसंख्या के वितरण का वर्णन कीजिए

    भारत में जनसंख्या के वितरण

    भारत की जनसंख्या का स्थानीय वितरण एक समान नहीं है। इसमें बहुत अधिक क्षेत्राीय विभिन्नताएं हैं। विश्व में जनसंख्या की दृष्टि से चीन के बाद दूसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश भारत है। एक मार्च सन् 2001 को भारत की कुल जनसंख्या 1027 मिलियन याने एक अरब 27 करोड़ हो चुकी थी। यह संख्या विश्व की कुल जनसंख्या के 16.7 प्रतिशत के बराबर है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि विश्व का हर छठवा व्यक्ति भारतीय है। चीन हमसे एक कदम आगे है क्योंकि विश्व में हर पांचवा व्यक्ति चीन का है। भारत में उपलब्ध भूमि विश्व की कुल भूमि का 2.42 प्रतिशत ही है और इतनी ही भूमि पर विश्व की कुल जनसंख्या का करीब 17 प्रतिशत भारत में है। किसी भी देश की जनसंख्या उसके सभी भागों में समान रूप से वितरित नहीं होती। भारत के लिए भी यह तथ्य लागू होता है। देश के कुछ भागों में घनी जनसंख्या है कुछ भागों में मध्यम जनसंख्या है तो कुछ भाग विरल बसे हैं।

    2001 की जनगणना के अनुसार भारत वर्ष में जनसंख्या का घनत्व 324 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। पिछले सौ वर्षों में जनसंख्या का घनत्व चौगुना से भी ज्यादा बढ़ा है। सन् 1901 में यह घनत्व 77 था जबकि सन् 2001 में यह 324 हो गया। अब एक बात और समझने की है। जब यह कहा जाए कि भारत में जनसंख्या का घनत्व 324 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. है, इससे यह मतलब नहीं निकालना चाहिये कि देश के प्रत्येक वर्ग किमी. पर आबादी 324 व्यक्तियों की होगी। वास्तव में जनसंख्या का वितरण भारत वर्ष में बहुत ही अनियमित है। अरूणाचल प्रदेश में औसतन जनसंख्या 13 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. है, जबकि दिल्ली में सन् 2001 की जनगणना के अनुसार 9294 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. है।

    जनसंख्या वितरण को प्रभावित करने वाले कारक

    वे सब कारक जो जनसंख्या के घनत्व एवं उसके वितरण को प्रभावित करते हैं उन्हें दो श्रेणियों में बाँट सकते हैं। ये हैं (क) भौतिक कारक (ख) सामाजिक-आर्थिक कारक।

    भौतिक कारक - ये जनसंख्या के घनत्व एवं वितरण को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। भौतिक कारकों में सम्मिलित हैं- भूमि की बनावट या आकृति, जलवायु, मृदा इत्यादि। यद्यपि विज्ञान एवं तकनीक में बहुत अधिक प्रगति हुई है परन्तु फिर भी भौतिक कारकों का प्रभाव बरकरार है।

    1. भू-आकृति - यह जनसंख्या वितरण के प्रतिरूप को प्रभावित करता है। भू-आकृति का सबसे महत्वपूर्ण भाग है उसमें मौजूद ढ़लान तथा उसकी ऊ¡चाई। इन दोनों गुणों पर जनसंख्या का घनत्व एवं वितरण बहुत कुछ आधारित रहता है। इसका प्रमाण पहाड़ी एवं मैदानी क्षेत्रा की भूमि ले सकते हैं। गंगा-सिंधु का मैदानी भूभाग घनी आबादी का क्षेत्रा है जबकि अरूणाचल प्रदेश समूचा पहाड़ियों से घिरा उबड़-खाबड़ पर्वतीय भूभाग है, अतः जनसंख्या का घनत्व सबसे कम एवं वितरण भी विरल एवं फैला हुआ है। इसके अलावा भौतिक कारकों में स्थान विशेष का जल-प्रवाह क्षेत्रा, भूमि जल स्तर जनसंख्या वितरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    2. जलवायु - किसी स्थान की जलवायु जनसंख्या के स्थानिक वितरण एवं प्रसार को प्रभावित करती है। अब राजस्थान के गरम और सूखे रेगिस्तान साथ ही ठंडा एवं आर्द्रता एवं नमी वाले पूर्वी हिमालय भूभाग का उदाहरण लें। इन कारणों से यहां जनसंख्या का वितरण असमान तथा घनत्व कम है। केरल एवं पश्चिम बंगाल की भौगोलिक परिस्थितिया¡ इतनी अनुकूल हैं कि आबादी सघन एवं समान रूप से वितरित है। पश्चिमी घाट पर्वत श्रृंखला के पवन-विमुख भाग तथा राजस्थान के भागों में घनत्व कम है।

    3. मृदा - यह बहुत हद तक जनसंख्या के घनत्व एवं वितरण को प्रभावित करता है। वर्तमान औद्योगीकरण एवं उद्योग प्रमुख समाज में मृदा कैसे जनसंख्या को प्रभावित करने में सक्षम हो सकती है। यह स्वाभाविक प्रश्न हो सकता है। परन्तु इस सच्चाई से कि आज भी भारत की 75 प्रतिशत जनता गांवों में बसती है, कोई इन्कार नहीं कर सकता। ग्रामीण जनता अपना जीवन-यापन खेती से ही करती है। खेती के लिए उपजाऊ मिट्टी चाहिये। इसी वजह से भारत का उत्तरी मैदानी भाग, समुद्र तटवर्ती मैदानी भाग एवं सभी नदियों के डेल्टा क्षेत्रा उपजाऊ एवं मुलायम मिट्टी की प्रचुरता के कारण सघन जनसंख्या वितरण प्रस्तुत करते हैं। दूसरी ओर राजस्थान के विशाल मरूभूमि क्षेत्रा, गुजरात का कच्छ का रन तथा उत्तराखण्ड के तराई भाग जैसे क्षेत्रों में मृदा का कटाव तथा मृदा में रेह का उत्फुलन(मिट्टी पर सफेद नमकीन परत चढ़ जाना जो उसकी उपजाऊपन को नष्ट कर देती है) विरल जनसंख्या वाले क्षेत्रा हो जाते हैं।

    किसी भी क्षेत्रा में जनसंख्या का घनत्व एवं वितरण एक से अधिक भौतिक एवं भौगोलिक कारकों से प्रभावित होते हैं। उदाहरण स्वरूप भारत के उत्तर-पूर्वी भाग को लें। यहाँ अनेक कारक प्रभावशील है - जैसे भारी वर्षा, उबड़-खाबड़, उतार-चढ़ाव वाली जमीनी बनावट, सघन वन एवं पथरीली सख्त मिट्टी। ये सब एक साथ मिलकर जनसंख्या के घनत्व एवं वितरण को विरल बनाते हैं।

    (ख) सामाजिक-आर्थिक कारक- भौतिक कारकों के समान ही सामाजिक-आर्थिक कारक भी जनसंख्या के वितरण एवं घनत्व को प्रभावित करते हैं। परन्तु इन दोनों कारकों के सापेक्षिक महत्व के विषय में पूर्ण एकरूपता नहीं भी हो सकती है। कुछ स्थानों पर भौतिक कारक ज्यादा प्रभावशील होते हैं तो कुछ जगहों पर सामाजिक एवं आर्थिक कारक अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सामान्य तौर पर आम सहमति है कि सामाजिक एवं आर्थिक (अभौतिक) कारकों की भूमिका बढ़ी है। विभिन्न सामाजिक-आर्थिक कारक जो जनसंख्या की बसावट में विभिन्नता लाते हैं, इस प्रकार हैं-; 1- सामाजिक-सांस्कृतिक एवं राजनैतिक कारक; 2- प्राकृतिक संसाधनों का दोहन।


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