विधि का शासन की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।

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विधि का शासन की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए।

  1. विधि का शासन किस देश से लिया गया ? 
  2. कानून का शासन नामक सिद्धांत का अर्थ है।
  3. विधि का शासन किस संविधान की विशेषता है?

विधि का शासन की अवधारणा

विधि का शासन (Rule of Law)- विधि के शासन की अवधारणा का उदय सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में हुआ तथा ब्रिटिश विचारक डायसी ने सर्वप्रथम विधि के शासन' की सुस्पष्ट व व्यवस्थित अवधारणा प्रस्तुत की। विधि के शासन से अभिप्राय ऐसे शासन से है जिसमें प्रत्येक स्थिति में विधियों को सर्वोच्च मान्यता दी जाए तथा शासन का समस्त कार्य विधियों के अनुसार ही हों। इस धारणा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह धारणा किसी राजनीतिक व्यवस्था में किसी भी व्यक्ति, संस्था या संरचना को विधियों (कानूनों) से ऊपर स्वीकार नहीं करती। इस धारणा में इस बात पर भी विशेष बल दिया जाता है कि विधियों का निर्माण संवैधानिक तरीके से किया जाए तथा विधि किसी भी दशा में असंवैधानिक, अमानवीय एवं अनुचित न हो। 'विधि के शासन' को संविधानवाद की प्रमुख विशेषता माना जाता है। वर्तमान लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्थाओं में विधि के शासन को विशेष महत्त्व प्राप्त है।

भारत में विधि का शासन 

विधि के शासन का अभिप्राय देश में कानूनी समानता का होना है। भारत में प्रत्येक व्यक्ति पर, चाहे वह राजा हो या निर्धन, देश का साधारण कानून समान रूप से लागू होता है और सभी को साधारण न्यायालय में समान रूप से न्याय मिलता है। राजनीतिक एवं अंतरराष्ट्रीय पारस्परिक मर्यादा की दृष्टि से इस नियम के थोड़े से अपवाद हैं। यथा, राष्ट्रपति एवं राज्यपाल देश के साधारण न्यायालय द्वारा दंडित नहीं हो सकते [अनुच्छेद 361 (1)] विदेश के राजा, राष्ट्रपति या राजदूत न्यायालय के अधिकारक्षेत्र से बाहर हैं (अनुच्छेद 51)।

भारतीय संविधान में कानून के संरक्षण की समानता न केवल देश के नागरिकों को, अपितु विदेशियों को भी समान रूप से, जाति, धर्म, वर्ण, जन्मस्थान आदि का भेद भाव किए बिना, दी गई है। पुरुषों और स्त्रियों के अधिकार में भी अंतर नहीं किया गया है (अनुच्छेद 15)। सभी नागरिकों को जीविका अथवा सरकारी नियुक्ति में समान अवसर मिलने का अधिकार मिला है (अनुच्छेद 16)। अस्पृश्यता का पूर्ण रूप से निषेध हुआ है (अनुच्छेद 17)। सैनिक एवं शैक्षणिक उपाधियों के अतिरिक्त राज्य अपने नागरिकों को अन्यान्य उपाधि नहीं दे सकता (अनुच्छेद 18)। कोई नागरिक विधि द्वारा निर्धारित अपराध के लिए ही केवल एक बार दंडित हो सकता है (अनुच्छेद 20)। किसी भी व्यक्ति को मृत्युदंड अथवा कारावास विधिसम्मत रूप में ही दिया जा सकता है (अनुच्छेद 21),संकटकालीन असाधारण परिस्थिति में ही सरकार बिना मामला चलाए किसी को नजरबंद कर सकती है (अनुच्छेद 19 (2))।

संविधान द्वारा प्रदत्त अपने मूल अधिकारों के अपहरण पर कोई नागरिक न्यायालय में सरकार के विरुद्ध मामला चला सकता है। संविधान में यह निर्देश दिया गया है कि राज्यों के उच्च न्यायालय तथा देश का सर्वोच्च न्यायालय इन मूल अधिकारों की रक्षा करें। निष्पक्ष तथा निर्भीक न्यायाधीशों द्वारा न्याय का विधान किया गया है। इनके आदेशों का पालन करना शासन का कर्तव्य है। निष्पक्ष एवं स्वतंत्र समाचारपत्र तथा जागरूक जनमत, जनाधिकार के प्रहरी हैं।

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