विचारधारा के अंत के सिद्धांत का आलोचनात्मक मूल्यांकन करो।

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विचारधारा के अंत के सिद्धांत का आलोचनात्मक मूल्यांकन करो।

विचारधारा के अंत पर टिप्पणी

विचारधारा के अंत के सिद्धांत ने पश्चिमी तथा गैर-पश्चिमी दोनों प्रकार के विद्वानों से कड़ी आलोचना को आमंत्रित किया। वाम तथा दक्षिण, दोनों पंथों ने इस सिद्धांत की तीव्र आलोचना की। बहत-से विद्वानों ने, जो दक्षिण पंथ का विचारधारात्मक दृष्टिकोण रखते थे, वकालत की कि यह सिद्धांत अनुत्तरदायी बौद्धिक जल्दबाजी से अधिक कुछ भी नहीं है जो विश्व साम्यवाद के सामने विचारधारात्मक रूप से निःशस्त्र होने के कारण पश्चिम ने अपनाया है। हावर्ड में दर्शन-शास्त्र के प्राध्यापक हैनरी ऐकेन ने इसी दृष्टि से इस सिद्धांत का मूल्यांकन किया।

विचारधारा के मद्धिम प्रकाश के सिद्धांत की ठोस आलोचना बहुत-से पश्चिमी चिन्तकों ने भी की। इस सिद्धांत का तीव्र विरोध करने वालों में से एक पहला लेखक सी० राइट मिल्ज था। मिल्ज ने कहा कि समाजवादी विचारधारा ही एकमात्र विचारधारा है जो बेल, लिप्से तथा उन जैसे विचारकों के अनुसार समाप्त हो चुकी थी। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस के न्यूयार्क कार्यालय ने 1964 में सी० राइट मिल्ज को समर्पित 'The New Sociology' शीर्षक से एक संग्रह प्रकाशित किया। इसके सम्पादक आई० एल० हॉरोवेज तथा अन्य लेखकों ने 'विचारधारा के अन्त' के पक्षधर सिद्धांतशास्त्रियों को आड़े हाथों लिया। 'American Politics and the End of Ideology' में स्टीफन रौसीज तथा जेम्स फरगनिस ने यह तर्क दिया कि विचारधारा के अन्त के सिद्धांतशास्त्रियों द्वारा लिया गया मुख्य स्वरूप सामाजिक सुधारवाद था। "वे प्रचलित व्यवस्था के रक्षक बन गए।"

बेल ने तर्क दिया, "ब्रितानिया में नव वामपंथियों में भावनाएँ तो हैं लेकिन भविष्य की परिभाषा अथवा भविष्य दर्शन कम है, यह भी सच है कि संयुक्त राज्य के उदारवाद में भावनाओं को भी कोई स्थान प्राप्त नहीं है। इस देश में उदारवाद मर चुका है तथा विचारधारा का अन्त इसकी विरासत है।

जे० लॉ पेलोम्बरा (J. La Palombara) ने इस विषय की अस्थिरता की ओर ध्यान आकर्षित किया कि विचारधारा का पतन तब शुरू होता है जब समाज सामाजिक तथा आर्थिक आधुनिकीकरण के स्तर तक पहुँचता है। वह स्पष्ट रूप में कहता है, “इस प्रकार की लम्बी चलने वाली प्रवृत्तियों के विषय में मेरा अपना विचार यह है कि विचारधारा की लाक्षणिकता कुछ रुचिपूर्ण परिवर्तनों के बावजूद हम इसका ‘अन्त' देखने से बहुत दूर है।"

विचारधारा के अंत के सिद्धांत की आलोचना

विचारधारा के अंत के सिद्धांत के विरुद्ध आलोचना के मुख्य बिन्दु निम्नलिखित हैं -

  1. प्रथम, यह सिद्धांत अवास्तविक है। अगर हम जाति तथा निर्धरता के विषयों, नव वाम पंथ तथा मौलिक दक्षिण पंथ के उत्कर्ष आदि को देखें तो पता चलता है कि विचारधाराएं धनाढ्य पश्चिम में समाप्त नहीं हुई हैं। न ही विचारधाराएँ विकासशील देशों में लुप्त होने वाली हैं, वहाँ वे आगे बढ़ रही हैं।
  2. दूसरे, सिद्धांत के अंत के सिद्धांत का सम्बन्ध पक्षपाती हितों पर आधारित मूल्य मापदण्डों पर है तथा यथा स्थिति (Status quo), कल्याणकारी राज्य, 'विज्ञान-वाद' आदि के प्रति जतिबद्धता से है। यह ‘सन्तुष्टि के नारे' (A slogan of complacency) का प्रतिनिधित्व करता है. क्योंकि यह इसकी परिकल्पना करता है कि विवाद के महान् राजनीतिक विषय अब नहीं रहे हैं। यह इसकी परिकल्पना भी करता है कि इतिहास एक अन्तिम स्थिर सन्तुलन की ओर बढ़ रहा है जिसमें एक विशेष आर्थिक विकास करके विकासशील देश पश्चिमी देशों के निष्क्रिय (Sterile) स्तर में जा मिलेंगे। इस प्रकार विचारधारा का पतन भी अपने आप में एक विचारधारा है।
  3. तीसरे, यह सिद्धांत अनुभाववाद की पूजा' (A fetishism of empiricism) करता है तथा नैतिक तथा मानवीय आदर्शों के निरन्तर औचित्य से विमुखता को प्रदर्शित करता है।

इस विचारधारा के अन्त का सिद्धांत परंपरागत राजनीतिक विषयों के इर्द-गिर्द विचारधारात्मक दरार (Cleavage) के क्षेत्र में स्थान परिवर्तन के प्रति उलझाव में जकड़ा हुआ है। नए क्षेत्रों में विचारधारात्मक विवाद तेजी से बढ़ा है।

विचारधाराओं की उत्पत्ति के प्रति लोग जागरूक हैं तथा इन भयानक प्रवृत्तियों को बदलने का मार्ग ढूँढते रहे हैं। अन्ततः, एशिया, अफ्रीका तथा लेटिन अमरीका के विकासशील राज्यों ने राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक स्वतन्त्रता तथा राष्ट्रीय सम्पन्नता के लिए अपनी इच्छाओं को न्यायसंगत बनाने के प्रयास में अपनी ही विचारधारात्मक धारणाओं तथा सिद्धान्तों को प्रस्तुत किया है।

निष्कर्ष (Conclusion)- बेन्डिक्स (Bendix) कहता है, “जब हम नव-विचारधारात्मक विश्व विचार से मानवीय ज्ञान तथा शक्ति का अर्थात् विचारधारा के युग का अन्तर करते हैं तो इसका हम यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकते कि विचारधारा का अन्त निकट है।” इस महत्वपूर्ण दिशा में वास्तविक स्थिति यह है कि विचारधारा के बंधन (Shackles) कुछ ढीले पड़ गए हैं जिसका परिणाम यह है कि जहाँ उदारवादियों ने विभिन्न मत अपनाए हैं, जो प्रायः उन्हें विचारधारात्मक रूप से तटस्थ बना देते हैं, वहाँ समाजशास्त्रियों, साम्यवादियों ने उदारवादी लोकतान्त्रिक राजनीतिक मूल्यों की धीरे-धीरे स्वीकृति के प्रति सदैव की तरह अपना झुकाव दिखाया है। इस सब को विचारधारा के अन्त या पतन के रूप में नहीं लेना चाहिए अपितु इसे एक स्थिति से अन्य स्थिति में परिवर्तन समझा जाना चाहिए। यह सूचित करता है कि विश्व की ही तरह, विचारधारा भी उत्तेजित परिवर्तन (Flux) की स्थिति में है जिसके विषय में फ्रांस, इटली, जर्मनी तथा यहाँ तक कि सोवियत तथा साम्यवादी दलों के परिवर्तनशील व्यवहार में विचार देखा जा सकता है।

समकालीन समय में हम 'विचारधारा के अंत' के सिद्धांत को स्वीकार नहीं कर सकते। नया राजनीतिक-विचारधारात्मक संश्लेषण पिछले तीस वर्षों से आकार धारण कर रहा है। आज साम्यवाद के विरुद्ध एक क्रान्ति आ चुकी है। परन्तु इसका अर्थ 'सिद्धांत का अन्त' नहीं है। समाजवादी आदर्शी का महत्व अभी भी है। क्रान्ति साम्यवाद तथा इस द्वारा प्रयुक्त किये जा रहे सर्वसत्तावाद के विरुद्ध आई है, समाजवादी आदर्शों के विरुद्ध नहीं। आज लोकतान्त्रिक-उदारवादी-समाजवाद (Democratic-Liberal-Socialism) विचारधारा एक नई संश्लेषित विचारधारा के रूप में विकसित होता प्रतीत हो रहा है तथा यह समाजवादी उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए लोकतन्त्रीय व्यवस्था तथा आर्थिक उदारीकरण के साधनों को उचित माना है।

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